मोदी सरकार का लहजा कुछ बदला बदला सा नज़र आ रहा है
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पहली नज़र में, धर्म के आधार पर भारत में तीन मुस्लिम बहुल पड़ोसी देशों के अल्पसंख्यकों को नागरिकता देने का नया क़ानून उचित लग सकता है। लेकिन मुसलमानों समेत देश की एक बड़ी आबादी को यह आइडिया कुछ पसंद नहीं आ रहा है।
(last modified 2023-04-09T02:55:50+00:00 )
Dec २१, २०१९ १४:३१ Asia/Kolkata
  • मोदी सरकार का लहजा कुछ बदला बदला सा नज़र आ रहा है

पहली नज़र में, धर्म के आधार पर भारत में तीन मुस्लिम बहुल पड़ोसी देशों के अल्पसंख्यकों को नागरिकता देने का नया क़ानून उचित लग सकता है। लेकिन मुसलमानों समेत देश की एक बड़ी आबादी को यह आइडिया कुछ पसंद नहीं आ रहा है।

भारत में मुसलमानों की आबादी कुल आबादी का 14 फ़ीसद से अधिक है। पिछले हफ़्ते प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी की हिंदू राष्ट्रवादी भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने यह क़ानून पारित किया था। जिसका देश और देश से बाहर बड़े पैमाने पर विरोध हो रहा है।

इस नए क़ानून का बिल तैयार करने में काफ़ी चालाकी से काम लिया गया है। मुसलमानों को छोड़कर हिंदू, ईसाई, बौद्ध, सिख, पारसी और जैन धर्म के मानने वालों को त्वरित नागरिकता की पेशकश की गई है। इसके अलावा, क़ानून में पड़ोसी देशों में से केवल पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफ़गानिस्तान का नाम लिया गया है, जो सभी मुस्लिम बहुल देश हैं। म्यांमार, से लेकर चीन तक जिस देश में भी मुसलमान बहुसंख्यक नहीं हैं, उनका उल्लेख नहीं किया गया है।

इसमें एक यह संदेश है कि मुस्लिम बहुल देशों में हिंदुओं और अन्य अल्पसंख्यकों को प्रताड़ित किया जा रहा है, इसलिए ऐसे देशों के मुसलमान शरणार्थी नहीं हो सकते हैं। - यहां तक कि म्यांमार में अभूतपूर्व अत्याचार और जातीय सफ़ाए से बचकर भागने वाले रोहिंग्या भी नहीं।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह क़ानून, मुसलमानों को हाशिए पर रखने, उन्हें दूसरे दर्जे का नागरिक बनाने और भारत को हिंदू राष्ट्र में बदल देने की मोदी और उनके गृह मंत्री अमित शाह की योजना का सबसे अहम भाग है।  

अगस्त में मोदी सरकार ने पहले एकमात्र मुस्लिम बहुल राज्य जम्मू-कश्मीर की स्वायत्ता ख़त्म करने के लिए संविधान की धारा 370 को हटाया और वहां की इंटरनेट सर्विस को बंद करने के साथ ही नेताओं को जेलों में डाल दिया।

उसके बाद, मोदी सरकार ने असम में नागरिकता का पहला टेस्ट किया, जिसमें क़रीब 20 लाख लोगों की नागरिकता छीन ली गई और उन्हें स्टेटलैस कर दिया गया। लेकिन इनमें से क़रीब 14 लाख हिंदुओं को नागरिकता देने के लिए संसंद से नागरिकता संशोधन क़ानून पारित करवा लिया। उसके बाद अमित शाह ने पूरे भारत में इस प्रक्रिया को लागू करने का एलान कर दिया, जिसके तहत भारतीय नागरिकों को यह साबित करना होगा कि वे भारतीय ही हैं। जो लोग यह साबित नहीं कर सकेंगे, उन्हें डिटेंशन कैम्पों में डाल दिया जाएगा, जिनके निर्माण का आदेश दिया जा चुका है।

मोदी सरकार की शुरुआती चालों का सीमित पैमाने पर विरोध हुआ। लेकिन इसके विपरीत, नागरिकता क़ानून ने पूरे भारत में विरोध की आग को भड़का दिया और अब यह एक आंदोलन का रूप धारण कर चुका है। पुलिस के हाथों छात्रों और शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के दमन ने आग पर घी डालने का काम किया है। सरकार ने कई क्षेत्रों में इंटरनेट सेवाएं बंद कर दी हैं। मोदी सरकार लोगों की आवाज़ दबाने के लिए इस रणनीति का दुनिया में किसी भी सरकार की तुलना में अधिक इस्तेमाल कर रही है। अगस्त के बाद से कश्मीर ऑफ़लाइन है और इंटरनेट बंद की सूची में भारत दुनिया में सबसे ऊपर है।

हालांकि, नागरिकता क़ानून पर लोगों की प्रतिक्रिया ने मोदी सरकार को हैरत में डाल दिया है और बहुत ही सख़्त लहजे में बात करने वाले अमित शाह का लहजा भी अब काफ़ी बदला बदला नज़र आ रहा है। msm