क्या हमेशा वही नतीजा निकलेगा जो दंगाई और उनके संरक्षक चाहते हैं?
दिल्ली में मेट्रो स्टेशन पर कुछ लड़कों के एक ग्रुप ने "देश के इन ग़द्दारों को गोली मारो..." के नारे लगाए और नारे लगाते समय वह पूरी तरह निश्चिंत थे कि उनके ख़िलाफ़ किसी तरह की कोई कार्यवाही नहीं होगी।
बिल्कुल उसी तरह जैसे 23 फ़रवरी से भड़कने वाले मुस्लिम विरोधी दंगों के दौरान दंगाई निश्चिंत होकर हमले कर रहे थे, क़त्ल कर रहे थे, संपत्ति को नुक़सान पहुंचा रहे थे।
यह कोई नया मामला नहीं है इससे पहले गुजरात दंगों में भी यही तांडव हो चुका है और उस दौरान बेहद गंभीर आरोपों में गिरफ़तार किए जाने वाले पुलिस अधिकारी को इतना सम्मानित किया गया कि दूसरे पुलिस अफ़सरों के मन में भी यह चाहत पैदा हो कि काश उन्हें भी इस तरह सेवा का मौक़ा मिले तो वह भी अपनी ड्यूटी निभाएं।
सिस्टम जिस तरह दंगाइयों का साथ दे रहा है वह बहुत ख़तरनाक है। इसके उदाहरण अनेक हैं। युनिवर्स्टियों के भीतर भगवाधारी उपद्रवियों के हमले कभी कोर्ट परिसर में उपद्रवी वकीलों के ज़रिए कन्हैया कुमार पर हमले। इसी तरह की दूसरी घटनाएं और उनके बाद हमलावरों के ख़िलाफ़ कोई कार्यवाही न होना यह पैग़ाम देता हैं कि हम निपट लेंगे।
यही बात अब यूपी के मुख्यमंत्री बन चुके योगी आदित्यनाथ एक टीवी कार्यक्रम में कह चुके हैं कि वह एफ़आईआर जैसी कार्यवाहियों के चक्कर में पड़ने के बजाए मुसलमानों को सबक़ सिखाना जानते हैं। यही ज़बान कपिल मिश्रा ने दिल्ली दंगों के दौरान इस्तेमाल की थी कि “फिर हम आपकी भी नहीं सुनेंगे”।
सवाल यह है कि इस स्थिति का नतीजा क्या निकलेगा? क्या हमेशा इसका वही नतीजा निकलेगा जो दंगाई और उनके संरक्षक चाहते हैं? यानी मुसलमान डरते डरते बहुत डर जाएंगे और किसी भी अत्याचार और अन्याय को ख़ुशी ख़ुशी सहन करेंगे? अगर नतीजा इससे बिल्कुल अलग निकला तो क्या होगा?!
संस्थाओं के प्रति विश्वास और उनसे आशा बाक़ी रहना बहुत ज़रूरी है यदि संस्थाओं की ओर से आशा ख़त्म हो गई और विश्वास समाप्त हो गया तो यह निश्चत रूप से अच्छी स्थिति नहीं होगी।