क्या वास्तव में वरिष्ठ कश्मीरी नेता प्रोफ़ेसर सैफ़ुद्दीन सोज़ नज़रबंद नहीं हैं?
भारत के सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व केंद्रीय मंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता प्रोफ़ेसर सैफ़ुद्दीन सोज़ की कथित नज़रबंदी को लेकर दायर याचिका आज़ाद कर दी।
जम्मू कश्मीर प्रशासन ने न्यायालय के समक्ष दावा किया था कि सोज़ कभी भी नज़रबंद नहीं थे।
जस्टिस अरुण मिश्रा, जस्टिस विनीत सरन और जस्टिस एमआर शाह की पीठ ने जम्मू कश्मीर प्रशासन के बयान को रिकॉर्ड में शामिल करके 83 वर्षीय सोज़ की पत्नी की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका का निस्तारण कर दिया।
प्रशासन ने अपने बयान में कहा कि सैफ़ुद्दीन सोज़ के आने जाने पर किसी प्रकार का प्रतिबंध नहीं है।
सोज़ की पत्नी मुमताज़ुन्निसा सोज़ की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक सिंघवी ने कहा कि अगस्त के महीने में एक दिन आप मुझे नज़रबंद करते हैं और अब अपने जवाबी हलफ़नामे में वे कहते हैं कि मैं आज़द व्यक्ति हूं।
इस पर पीठ ने कहा कि जिस अवधि में सोज़ के नज़रबंद होने की बात कही जा रही है, उस दरमियान उन्होंने बाहर भी यात्रा की है। सिंघवी ने कहा कि कांग्रेस के यह वरिष्ठ नेता बीमार थे और सिर्फ़ इलाज के सिलसिले में उन्होंने यात्रा की थी.
इस पर पीठ ने कहा कि जम्मू कश्मीर प्रशासन का कहना है कि सोज़ के लिए कभी भी कोई नज़रबंदी आदेश जारी ही नहीं किया गया और इसलिए जवाबी हलफ़नामे के मद्देनज़र इस याचिका पर विचार नहीं किया जा सकता।
सोज़ को पुलिसवालों ने श्रीनगर स्थित उनके आवास ने बाहर निकलने या मीडिया से बात करने की इजाज़त नहीं दी।
रिपोर्टर के पहुंचने पर बंद गेट और तार के बैरिकेड के पीछे से सोज़ पुलिसवाले पर चिल्लाते हुए कहते हैं, ‘जब मैं नज़रबंद हूं तो सुप्रीम कोर्ट में सरकार कैसे कह सकती है कि सोज़ मुक्त हैं।
उन्होंने कहा कि 5 अगस्त 2019 से जब भी मैं अपने परिसर से बाहर गया मुझे सरकार से अनुमति लेनी पड़ी। अब मैंने 5 अगस्त, 2019 से अपनी ग़ैरक़ानूनी नज़रबंदी के लिए सरकार पर मुकदमा चलाने का फैसला किया है। (AK)