केन्द्र सरकार की नीतियों से नाराज़ कश्मीरी पंडितों की भूख हड़ताल
कश्मीरी पंडियों ने सरकार की नीतियों का विरोध करते हुए आमरण अनशन शुरु कर दिया है।
यह आमरण अनशन सोमवार से 300 साल पुराने एक मंदिर परिसर में शुरु हुआ है।
1990 के दशक में अलगाववाद की शुरुआत के दौरान हत्या और धमकियों के बीच अनुमानित तौर पर 76,000 कश्मीरी पंडित कश्मीर छोड़कर चले गए थे जबकि बहुत से परिवारों ने वहीं रहने का फ़ैसला किया था।
घाटी में रहने वाले कश्मीरी हिंदुओं के लिए काम करने वाली कश्मीरी पंडित संघर्ष समिति के अनुसार, अलगाववाद के दौरान हत्याओं और नरसंहारों में 850 कश्मीरी पंडितों की मौत हो गई।
आज भी कश्मीरी पंडितों के बाकी बचे हुए 808 परिवार अभी भी घाटी में 242 स्थानों पर रह रहे हैं और कश्मीर की आबादी का एक छोटा हिस्सा हैं लेकिन इन परिवारों के पास रोज़गार के अवसरों की कमी है।
जिन लोगों के पास अवसर हैं, वे बेहतर रोजगार की संभावनाओं के लिए अपने परिवार के साथ घाटी छोड़ रहे हैं जबकि बाकी निराशा के गर्त में जी रहे हैं।
केंद्र सरकार ने कश्मीर में रह रहे 808 कश्मीरी पंडित परिवारों को एक नौकरी देने का वादा किया था लेकिन प्रशासन को बार-बार याद दिलाए जाने के बाद भी रोज़गार नहीं मिला। इसी वजह से कश्मीरी पंडित नाराज़ हैं और उन्होंने भूख हड़ताल शुरू कर दी है।
2007 में केपीएसएस के एक प्रतिनिधिमंडल ने तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मुलाकात कर एक बार रोज़गार और वित्तीय पैकेज के लाभों के विस्तार की मांग की थी, आख़िरकार जिनकी घोषणा 2009 में हुई थी। (AK)
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