चीन के मुक़ाबले में भारत क्यों नहीं जीत सकता?
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हिमालय में सैन्य टकराव को अक्सर दो परमाणु शक्तियों के बीच गतिरोध के रूप में देखा जाता है। लेकिन भारत, मौजूदा स्थित को सहन नहीं कर सकेगा।
(last modified 2023-04-09T02:55:50+00:00 )
Jan ०१, २०२१ १९:३७ Asia/Kolkata
  • चीन के मुक़ाबले में भारत क्यों नहीं जीत सकता?

हिमालय में सैन्य टकराव को अक्सर दो परमाणु शक्तियों के बीच गतिरोध के रूप में देखा जाता है। लेकिन भारत, मौजूदा स्थित को सहन नहीं कर सकेगा।

आजकल, कई वैश्विक घटनाओं ने दुनिया भर का ध्यान अपनी ओर खींच रखा है। अमरीकी निर्वाचित राष्ट्रपति जो बाइडन का आगामी शपथ ग्रहण समारोह, ब्रिटेन का यूरोपीय संघ से बाहर निकलना, अमरीकी सरकारी प्रणालियों की हैकिंग और दुनिया भर में कोरोना वायरस का वैक्सीन लगाने की होड़।

इन बड़ी न्यूज़ स्टीरीज़ के बीच, एशिया के दो बड़े देशों, भारत और चीन के बीच 8 महीने से जारी सैन्य गतिरोध, वैश्विक चिंता के रडार से ग़ायब नज़र आ रहा है। जबकि विशेषज्ञों का मानना है कि एशिया, वैश्विक शक्ति संतुलन में जारी बदलाव का केन्द्र है। इस बीच, इस बात पर बहुत कम ध्यान दिया जा रहा है कि नई दिल्ली अपनी सैन्य प्राथमिकताओं में किया बदलाव कर रहा है और दुनिया पर इसके दूरगामी राजनीतिक परिणाम क्या होंगे।

पिछले साल, भारत और चीन के बीच के टकराव को विशेषज्ञों ने एक गतिरोध क़रार दिया। किसी हद तक यह सही भी हो सकता है, लेकिन दो तर्क, इस धारणा को बदल सकते हैं। पहलाः चीन का ख़ज़ाना भरा हुआ है, ख़ासकर पिछले एक साल के दौरान, कोरोना वायरस महामारी की मार के बाद उसकी अर्थव्यवस्था ने एक बार भी उछाल लिया है, जबकि भारत मंदी की स्थिति में आ गया है। दूसराः बीजिंग ने नई दिल्ली को अपनी सीमाओं की सुरक्षा पर ध्यान केंद्रित करने के लिए मजबूर कर दिया है। इससे लम्बे समय में चीन को एक स्पष्ट लाभ मिलता नज़र आ रहा है।

पिछले साल मई में लद्दाख़ की सीमा पर दोनों देशों के बीच सैन्य गतिरोध की शुरूआत हुई, जून में स्थिति उस वक़्त और स्पष्ट हो गई, जब एक झड़प में भारत के 20 सैनिकों की मौत हो गई। उसके बाद विवादित क्षेत्रों में तनाव कम करने की कई कोशिशें हुईं, लेकिन वह सब बेनतीजा रहीं। चीन ने लद्दाख़ में मई के पूर्व की स्थिति को बहाल करने से इनकार कर दिया है, जहां वह अब 600 वर्ग मील के क्षेत्र पर क़ब्ज़ा किए हुए है।

नई दिल्ली ने यह स्वीकार करते हुए कि सैन्य शक्ति का संतुलन, बीजिंग के पक्ष में है, उसे आर्थिक नुक़सान पहुंचाना का एक रास्ता चुना। जैसे कि मोदी सरकार ने चीन के ऐप पर प्रतिबंध लगा दिया और सरकारी परियोजनाओं में चीनी भागीदारी को प्रतिबंधित कर दिया। लेकिन भारत से चीन को होने वाले सीमित आर्थिक लाभ ने, इन उपायों को अप्रभावी बना दिया है।

चीन के साथ युद्ध, भारत को रणनीतिक स्वायत्तता की अपनी दीर्घकालिक नीति को छोड़ने के लिए मजबूर कर देगा, इसलिए कि इस स्थिति में नई दिल्ली, काफ़ी हद तक वाशिंगटन पर निर्भर रहने के लिए मजबूर हो होगा।

युद्ध द्वारा किसी त्वरित समाधान की संभावना को ख़ारिज करने के बाद, भारत के पास सिर्फ़ एक ही व्यवहारिक उपाय बचता है कि वह चीन के साथ सीमा पर एक लम्बे गतिरोध के लिए तैयार रहे। नई दिल्ली द्वारा लद्दाख़ में भारी तैनाती का उद्देश्य, इस नुक़सान को देखते हुए भविष्य में अधिक इलाक़ों पर चीन को क़ब्ज़ा करने से रोकना है। हालांकि इस तैनाती से न तो चीनियों को कोई दंड मिल रहा है और न ही यह उन्हें उन इलाक़ों से पीछे हटने के लिए बाध्य कर सकती है, जिन पर उन्होंने हाल में क़ब्ज़ा किया है।

वहीं ऑफ़ रिकॉर्ड भारतीय अधिकारियों का कहना है कि लद्दाख़ संकट का कूटनीतिक समाधान निकलना मुश्किल है, क्योंकि यथास्थिति की दोनों देशों की समझ अलग-अलग है।

चीन का रक्षा बजट, भारत से चार गुना ज़्यादा है तो उसकी अर्थव्यवस्था 6 गुना बड़ी है और मौजूदा समय में यह फ़ासला बढ़ता ही जा रहा है। चीन के पास दुनिया की सबसे बड़ी स्थायी सेना है, जिसमें भारत की सेना की तुलना में 1.5 गुना अधिक सक्रिय सैन्यकर्मी हैं। अमरीकी रक्षा विभाग की रिपोर्ट के मुताबिक़, चीन ने पिछले दो दशकों के दौरान, लगभग हर लिहाज़ से अपनी सेना को मज़बूत बनाने और आधुनिकीकरण के लिए संसाधनों और तकनीक को बढ़ावा दिया है और राजनीतिक इच्छाशक्ति का परिचय दिया है। भारत के विपरीत, चीनी अर्थव्यवस्था, सैन्य और राजनीतिक नेतृत्व में लद्दाख़ की अत्यंत दुर्गम परिस्थितियों में लंबे समय तक भारी संख्या में सैनिकों की तैनाती और रखरखाव का बोझ उठाने की क्षमता है।

बीजिंग के लिए नई दिल्ली की वर्तमान स्थिति को समझना, मुश्किल नहीं होगा। वर्षों से, भारतीय प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार, पाकिस्तान के ख़िलाफ़ छोटा-मोटा ऑपरेशन करके चुनावी लाभ ले रही है, लेकिन चीन से निपटने के लिए उसके पास कोई भी प्रभावी योजना नहीं है।

भारत की अर्थव्यवस्था मंदी का शिकार हो चुकी है, इसले किसी बड़े सुधार या उलट-फेर की संभावना नहीं है। भारत के पास चीन समस्या का कोई समाधान नहीं है, जब तक कि नई दिल्ली की सोच में नाटकीय बदलाव नहीं आता है, तब तक लद्दाख़ संकट, किसी लाइलाज बीमारी से भी बदतर हो सकता है, और यही बीजिंग चाहता है। msm