भारत में कोरोना से हाहाकार और मोदी सरकार की ललकार
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पाकिस्तान के अख़बार डान की वेबसाइट ने टीकाकार माहिर अली का एक लेख प्रकाशित किया है जिसमें टीकाकार का कहना है कि आंकड़े और अनुमान बताते हैं कि मई के मध्य तक कोरोना वायरस की महामारी की दूसरी लहर का चरम बिंदु देखने में आएगा जबकि उसके बाद इसकी तीव्रता में कमी आएगी या नहीं इसकी भविष्यवाणी किसी ने नहीं की है।
(last modified 2023-04-09T02:55:50+00:00 )
May ०८, २०२१ १४:०४ Asia/Kolkata
  • भारत में कोरोना से हाहाकार और मोदी सरकार की ललकार

पाकिस्तान के अख़बार डान की वेबसाइट ने टीकाकार माहिर अली का एक लेख प्रकाशित किया है जिसमें टीकाकार का कहना है कि आंकड़े और अनुमान बताते हैं कि मई के मध्य तक कोरोना वायरस की महामारी की दूसरी लहर का चरम बिंदु देखने में आएगा जबकि उसके बाद इसकी तीव्रता में कमी आएगी या नहीं इसकी भविष्यवाणी किसी ने नहीं की है।

आक्सीजन के लिए मारामारी से लेकर क़ब्रिस्तानों और शमशान घाट में जगह कम पड़ जाने तक भारत से उठने वाली दुख की कहानी सब को प्रभावित कर रही है। शायद सबसे ज़्यादा निराशाजनक बात अधिकारियों का आम नागरिकों के स्वास्थ्य के मामले में ग़ैर ज़िम्मेदाराना रवैया है।

इतने ख़राब हालात में भी भारत के केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री ने दावा ठोंक दिया कि भारत में मृत्यु दर अब भी दुनिया में सबसे कम है। कुछ महीने पहले उन्होंने कहा था कि भारत में कोरोना अपने अंत के क़रीब पहुंच गया है।

 

जनवरी में वर्ल्ड इकानामिक फ़ोरम में भारतीय प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था कि भारत ने प्रभावी तरीक़े से कोरोना पर नियंत्रण पाकर मानवता को एक बड़ी त्रासदी से बचा लिया है। इससे पहले मोदी ने बयान दिया था कि वह इस कठिन घड़ी में एक अरब तीस करोड़ भारतीयों के लिए विश्वास और आशा का पैग़ाम देने जा रहे हैं।

मोदी ने व्यंग भरे स्वर में कहा थाः "भविष्वाणी की जा रही थी कि भारत दुनिया में कोरोना से सबसे अधिक प्रभावित देश होगा। यह कहा गया कि यहां कोरोना की सोनामी आ जाएगी। किसी ने कहा कि सात आठ करोड़ भारतीय नागरिक इससे प्रभावित होंगे और दूसरों का कहना था कि बीस लाख भारतीय नागरिक इस वायरस से मारे जाएंगे!"

इस स्थिति में तो ज़ाहिर है कि घमंड जैसे शब्द ही दिमाग़ में आते हैं। हालात उस समय और ख़राब हो गए जब भाजपा ने बयान दिया कि योग्य और निर्णायक नेतृत्व के तहत भारत ने कोरोना को शिकस्त दे दी है।

 

यक़ीनन किसी भी सरकार को कोरोना की इस ख़तरनाक दूसरी लहर का मुक़ाबला करने में कठिनाई पेश आती लेकिन कम से कम उसे इस स्थिति में अपनी छवि सवांरने की चिंता तो नहीं होती। कोई भी सरकार समय से पहले उन फ़ील्ड हास्पिटल्ज़ को ख़त्म न करती जो कोरोना वायरस की पहली लहर के दौरान स्थापित किए गए थे। कोई भी सरकार इस तरह के वायरस के ख़िलाफ़ जंग जीतने का इतनी जल्दबाज़ी में एलान नहीं करती। अगर यह सारी चूक नहीं हुई होती तो शायद भारत को वायरस का इतना भयानक हाट स्पाट बनने से रोका जा सकता था।

यही चूक इससे पहले ब्राज़ील, ब्रिटेन और अमरका में भी देखी जा चुकी है और उसके ख़तरनाक परिणाम भी सामने आ चुके हैं।

भारत को यह क्रेडिट हासिल है कि वह दुनिया में वैक्सीन बनाने वाला सबसे बड़ा देश है मगर इस हैसियत का क्या फ़ायदा जब वहां अपने ही नागरिकों को वैक्सीन न मिल सके? शायद यह सवाल भारत के प्रिंस आफ़ वैक्सीन कहे जाने वाले सीरम इंस्टीट्यूट आफ़ इंडिया के बास उदार पूनावाला से किया जाना चाहिए जो देश में वैक्सीन की भारी क़िल्लत के बीच ख़ुद ब्रिटेन में जाकर सेल्फ़ आइसोलेट हो चुके हैं। पिछले साल उनके ख़ानदान की दौलत में कई अरब डालर की बढ़ोत्तरी हुई थी।

 

भारत में आज जो कुछ हो रहा है वह लगभग सौ साल पहले अंग्रेज़ शासन में हुई त्रासदी की याद दिलाता है जब स्पैनिश फ़्लू की महामारी फैलने से उपमहाद्वीप में मृत्यु दर सबसे ज़्यादा दर्ज की गई थी। यह स्थिति शायद सारी दुनिया के लिए एक सबक़ है।

नोटः लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं, इनसे पार्स टुडे हिंदी का सहमत होना ज़रूरी नहीं है।  

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