सांसों के लिए सिसकता भारत
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मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि मुझे कोरोना वायरस की दवा ख़रीदने के लिए ब्लैक मार्केट का रुख़ करना पड़ेगा लेकिन मेरी मां पुणे के अस्पताल में इस घातक बीमारी की चपेट में आकर कराह रहीं थीं और मुझ पर हताशा छायी हुई थी। मुझे पता था कि मेरी मां का इलाज तभी होगा जब मैं ख़ुद हाथ पांव मारूंगी।
(last modified 2023-04-09T06:25:50+00:00 )
May १५, २०२१ १८:३७ Asia/Kolkata
  • सांसों के लिए सिसकता भारत

मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि मुझे कोरोना वायरस की दवा ख़रीदने के लिए ब्लैक मार्केट का रुख़ करना पड़ेगा लेकिन मेरी मां पुणे के अस्पताल में इस घातक बीमारी की चपेट में आकर कराह रहीं थीं और मुझ पर हताशा छायी हुई थी। मुझे पता था कि मेरी मां का इलाज तभी होगा जब मैं ख़ुद हाथ पांव मारूंगी।

मैंने 9 अप्रैल को अपने भाई को जन्म दिन की बधाई देने के लिए फ़ोन किया तो वह बहुत घबराए हुए थे और उन्होंने बताया कि मां का कोरोना टेस्ट करवाया था और रेज़ल्ट पाज़िटिव आया है। मेरे पैरों के नीचे से ज़मीन निकल गई।

तब तक भारत में कोरोना वायरस की महामारी का भयानक तूफ़ान ज़ोर पकड़ चुका था। तेज़ी से संक्रमण के नए मामले आ रहे थे। अस्पतालों में हाहाकर मचा हुआ था। आक्सीजन की भारी कमी थी और बड़ी संख्या में लोगों को बिल्कुल आरंभिक दवाओं के लिए भी संघर्ष करना पड़ रहा था। सोशल मीडिया पर तूफ़ान था लोग मदद के लिए फ़रियाद कर रहे थे।

हमने डाक्टरों से फ़ोन पर बात की और घर ही पर अपनी मां की कंडीशन की निगरानी करने लगे। हमें उम्मीद थी कि वह कोरोना को शिकस्त दे देंगी, अस्पताल ले जाने की नौबत नहीं आएगी। लेकिन 12 अप्रैल को उनका आक्सीजन लेवल गिरने लगा और बुख़ार बढ़ता गया। डाक्टरों ने कह दिया कि अगर आक्सीजन लेवल 92 के नीचे आया तो उन्हें अस्पताल में एडमिट करना ज़रूरी होगा। हमने लेवल चेक किया तो वह 90 था। फिर हमने अस्पताल की खोज शुरू कर दी।

 

ख़ुशक़िस्मती से हमें जल्दी ही अस्पताल में एक बेड मिल गया। मगर अस्पताल के भीतर कोविड-19 की दवाओं की भारी क़िल्लत थी। इसलिए डाक्टर ने हमसे कहा कि हम बाहर से रेमडेसीवीर का बंदोबस्त करें ताकि उनकी हालत में सुधार हो। रेमडेसीवीर की यह हालत है कि पुणे क्या पूरे भारत में यह बेहद कठिनाई से मिलता है। कहने को तो भारत दुनिया की फ़ारमेसी है। मैंने ट्वीट कर दिया कि मुझे रेमडेसीवीर की ज़रूरत है। मेरा ट्वीट हज़ारों बार रीट्वीट किया गया जिसके बाद मुझे बहुत सारे आफ़र आने लगे मगर जो भी गाइडलाइन मिली उसके हिसाब से मैंने दवा खोजने की लाख कोशिश की मगर रेमडेसीवीर का इंजेक्शन नहीं मिल सका।

मैंने भारत के कोविड-19 ब्लैक मार्केट के बारे में सुन रखा था क्योंकि लोग सोशल मीडिया पर इसके बारे में खुल कर बातें करते थे।

फ़ोन पर मेरी मम्मी ने मुझसे कहा कि मैं मरना नहीं चाहती प्लीज़ मेरे लिए दुआ करो। वह पांच दिन से अस्पताल में थीं और उनकी हालत में कोई सुधार नहीं हो रहा था।

ब्लैक मार्केट से रेमडेसीवीर लेने के लिए मैंने दर्जनों लोगों को फ़ोन किया। कुछ ने इसकी बेहद ज़्यादा क़ीमत बताई कुछ ने कहा कि इसके लिए सैकड़ों किलोमीटर की यात्रा करनी पड़ेगी।

आम दिनों में रेमडेसीवीर का एक इंजेक्शन एक हज़ार रूपए तक मिल जाता था। मगर ब्लैक मार्केट में मुझसे एक इंजेक्शन के लिए 15 हज़ार रूपए मांगे जा रहे थे। छह इंजेक्शन की ज़रूरत थी जिसके लिए मुझे 90 हज़ार देने थे। यह मुंबई में मिलने वाली औसत तनख़्वाह की दुगनी रक़म है।

 

फ़ोन पर मेरे 12 घंटे इसी तरह गुज़र गए। फिर मेरे दोस्तों के कुछ दोस्त मेरी मदद के लिए आगे आए। अब मैं अपने आप को असहाय महसूस कर रही थी और मेरे आंसू छलके जा रहे थे।

मेरी मां अब उबर रही हैं और वह घर पर हैं लेकिन भारत में हालात और भी ख़राब हो गए हैं। आक्सीजन, वेंटीलेटर, दवाओं और अस्पताल बेड की भारी क़िल्लत है। लोग मरते हैं और परिवार के लोग तड़प तड़प कर रोते हैं। मैंने भारत की यह हालत कभी नहीं देखी थी। मैंने अपने जीवन का अधिकतर भाग भारत में गुज़ारा है लेकिन अब यह मुझे पराया देश लगने लगा है।

इस अनुभव के बाद मैंने सोचा कि कुछ करना चाहिए। मैंने फ़ेसबुक पर अपने मित्र ज़ोरैज़ रियाज़ के साथ मिलकर कम्युनिटी ग्रुप बना लिया। ज़ोरैज़ ने इसी रास्ते से पाकिस्तान में बड़ी कामयाबी हासिल की है। इस ग्रुप में इस समय 5000 से ज़्यादा मेंबर हैं। हमें रोज़ाना तीस से चालीस हेल्प रिक्वेस्ट आती है। यह रिक्वेस्ट कोविड की दवा, आक्सीजन सिलेंडर और हास्पिटल बेड के लिए होती हैं।

छोटे शहरों और क़स्बों से बेहद परेशान लोगों की रिक्वेस्ट आती हैं। इन जगहों पर संसाधन की भारी क़िल्लत है। हाल ही में बरेली से एक रिक्वेस्ट कोविड-19 की बिल्कुल आरंभिक दवाओं के बारे में थी। इन जगहों पर हेल्प करने वाले बड़ी मुश्किल से मिलते हैं।

रिचा सानवाल

पत्रकार और फ़िल्म निर्माता मुंबई

स्रोत अलजज़ीरा डाट काम

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