भारत की ऐक्ट ईस्ट पॉलिसी में कहाँ गड़बड़ी हो गयीॽ
भारतीय कूटनैतिक तंत्र को अपनी दक्षिणपूर्वी एशिया नीति और उसके रास्ते में नाकाफ़ी आर्थिक प्रदर्शन तथा देश के भीतर सांप्रदायिकता से प्रेरित राजनीति की वजह से खड़ी की जा रही रुकावटों पर फिर से नज़र डालना होगी।
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल के कोविड-19 के सिंगापुर वेरिएन्ट वाले ताज़ा बयान और इससे जुड़ी दूसरी टिप्पणियों पर सिंगापुर के रिएक्शन पर, भारतीय नीति निर्धारकों और विदेश नीति विश्लेषकों को, दक्षिणएशिया में भारत की पोज़िशन के सामने मौजूद बड़ी चुनौतियों की ओर से सावधान हो जाना चाहिए। भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर ने जिन्हें सिंगापुर सहित क्षेत्र की अच्छी समझ और द्वीप वाले इस गणराज्य के बड़े नेताओं से उनका अच्छा संबंध है, विवाद को तूल पकड़ने से पहले ही दबा दिया। हालांकि इसे चीन के टी कप में आंधी या छोटे से मामले पर तीव्र प्रतिक्रिया मात्र समझना सही नहीं लगता।
सिंगापुर सरकार और इससे भी ज़्यादा अहम इसकी सिविल सोसायटी का रिएक्शन, कथित इन्डो-चाइना क्षेत्र में भारत के सामने मौजूद बड़ी समस्या की ओर ध्यान खींचता है। 1992 से जब तत्कालीन प्रधान मंत्री पी वी नरसिंह राव ने “लुक ईस्ट पॉलिसी” पेश की थी, भारत कूटनैतिक, सुरक्षा, आर्थिक और जनसंपर्क सहित सभी मोर्चों पर सक्रिय रहा। उसके बाद भूतपूर्व प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और पूर्व प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह ने भी नरसिंह राव की नीति को आगे बढ़ाते हुए आसियान देशों के साथ मज़बूत संबंध क़ायम किए। यह संबंध इतने मज़बूत हुए कि 2007 में सिंगापुर के निर्माता कहे जाने वाले ली कुआन यू ने जो लंबे समय तक भारत को शक की निगाह से देखते थे, भात और चीन को एशिया के आर्थिक विकास के दो इंजन का नाम दिया।
इस रवैये को आगे बढ़ाते हुए प्रधान मंत्री मोदी ने “लुक ईस्ट” का दर्जा बढ़ाते हुए ऐक्ट ईस्ट पॉलिसी का नाम दिया।
पिछले 5 बरसों से तीन बदलाव क्षेत्र में भारतीय कूटनीति को परख रहे हैं।
पहला, चीन की बेहतर होती छवि और साथ में भारत के साथ उसका तनाव, दूसरा, भारत के आर्थिक क्षेत्र में ख़राब प्रदर्शन की वजह से क्षेत्र में निराशा और तीसरे अपने अल्पसंख्यकों ख़ास तौर पर मुसलमानों और ईसाइयों के साथ भारत के रवैये पर क्षेत्र में बढ़ती चिंता।
भारत में हिन्दु बहुसंख्यकों को प्रधानता दिए जाने पर बढ़ती चिंता का इंडोनेशिया, मलेशिया, थाईलैंड और सिंगापुर जैसे देशों की सिविल सोसाइटी के रवैये पर असर पड़ा है। भारत ने “बौद्ध कूटनीति” अपनायी लेकिन यह भी क्षेत्र में बढ़ते अंतर-धार्मिक तनाव की वजह से ज़्यादा लोकप्रिय नहीं पो पायी। आसियान संगठन के ज़्यादातर देशों में, चीनी मूल के लोग इस्लाम, बौद्ध या ईसाई धर्म का पालन करते हैं। भारत के मौजूदा सत्ताधारी व्यवस्था की ओर से हिन्दुत्व पर बढ़ती ताकीद से, क्षेत्र सहित दुनिया में भारत की सॉफ़्ट पावर कमज़ोर हुयी।
इन सबसे ऊपर, कोरोना पैन्डेमिक के स्रोत और उससे निपटने की शैली ने, क्षेत्र के चीनी मूल के समुदाय में चीन के हित में भावना पैदा की क्योंकि बहुत से लोग यह देख रहे हैं कि चीन इस चुनौती से अच्छी तरह से निपटा जबकि भारत नाकाम दिखाई दे रहा है।
यह सब ट्रेन्ड्स बता रहे हैं कि भारतीय कूटनैतिक तंत्र को अपनी ऐक्ट ईस्ट पॉलिसी और इसके रास्ते में नाकाफ़ी आर्थिक प्रदर्शन तथा देश के भीतर सांप्रदायिकता से प्रेरित राजनीति की वजह से खड़ी की जा रही रुकावटों पर पुनर्विचार करना चाहिए। कूटनीतिज्ञ क्या कर सकते हैं जब किसी देश के नेता ऐसी नीतियां अपनाने लगें जिससे देश की विश्व स्तर पर पोज़ीशन बेहतर होने के बजाए, वह देश नीचा दिखने लगे। (साभारः इंडियन एक्सप्रेस)
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