क़ानूनी फ़ैक्ट्री जहां देशद्रोहियों की पैदावार होती है!
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वह जो किसी ने कहा था कि बदतरीन क़ानून भी बेहतरीन नीयत से बनाए जाते हैं। इसका एहसास क़दम क़दम पर होता है। सरकार भले ही लोकतांत्रिक हो या फ़ासीवादी अथवा तानाशाही जब भी कोई दंडात्मक कार्यवाही की जाती है तो एक जुमला ज़रूर कहा जाता है " यह क़ानून जनता की रक्षा के लिए बनाया गया है।" और फिर यही क़ानून हर गधे घोड़े को क़तार में रखने के काम आता है। बस उन्हीं पर लागू नहीं होता जिन्हें कुचलने का दावा किया जाता है।
(last modified 2023-04-09T02:55:50+00:00 )
Jun ०८, २०२१ १२:०५ Asia/Kolkata
  • क़ानूनी फ़ैक्ट्री जहां देशद्रोहियों की पैदावार होती है!

वह जो किसी ने कहा था कि बदतरीन क़ानून भी बेहतरीन नीयत से बनाए जाते हैं। इसका एहसास क़दम क़दम पर होता है। सरकार भले ही लोकतांत्रिक हो या फ़ासीवादी अथवा तानाशाही जब भी कोई दंडात्मक कार्यवाही की जाती है तो एक जुमला ज़रूर कहा जाता है " यह क़ानून जनता की रक्षा के लिए बनाया गया है।" और फिर यही क़ानून हर गधे घोड़े को क़तार में रखने के काम आता है। बस उन्हीं पर लागू नहीं होता जिन्हें कुचलने का दावा किया जाता है।

रवीन्द्रनाथ टैगोर ने कहा था कि ख़ौफ़ से आज़ादी ही असली आज़ादी है। जब अंग्रेज़ों ने इंडियन पीनल कोड में अब से एक सौ इकसठ साल पहले ग़द्दारी से निपटने के नाम पर आर्टिकल 124 ए का टीका लगाया तो इसका मक़सद यह था कि करोड़ों भारतीयों को अंग्रेज़ सरकार के ज़ुल्म के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने से रोका जाए।

अंग्रेज़ तो चले गए ख़ुद ब्रिटेन में भी इस प्रकार के क़ानून का वजूद नहीं है मगर भारत और पाकिस्तान के सांवले आक़ाओं ने गोरों के बनाए क़ानून को लगभग पौने दो सौ बरस पुराने औपनिवेशिक पीनल कोड के अंदर से दंडात्मक नियमों को चुन चुन कर अम्मा के दहेज में मिले लोटे की तरह सीने से लगा रखा है।

मसलन औपनिवेशक दौर की यादगार पीनल कोड का आर्टिकल 124 ए किसी भी नागरिक को देशद्रोही क़रार दे सकता है। अगर समय की सरकार की नज़र में नागरिक ने अपनी ज़बान या तहरीर से प्रत्यक्ष परोक्ष, इशारे में या किसी और तरह सरकार का अपमान किया है या उसके ख़िलाफ़ लोगों को भड़काने की कोशिश की है तो एसे ग़द्दार को तीन साल से लेकर उम्रक़ैद तक की सज़ा हो सकती है।

मज़े की बात यह है कि भारत और पाकिस्तान के संविधान के आर्टिकल 19 के तहत क़ानून के दायरे में अभिव्यक्ति की आज़ादी को बुनियादी अधिकारों में शुमार किया गया है मगर पीनल कोड के आर्टिकल 124 ए और ग़ैर क़ानूनी गतिविधियों को रोकने के एक्ट और उसी के दूसरे चचेरे ममेरे क़ानूनों के तहत दोनों देशों में संवैधानिक आज़ादी को बेड़ियां पहनाने का भी संतोषजनक इंतेज़ाम रखा गया है।

दंडात्मक धाराओं को कैसे मोम की नाक बनाकर उन्हीं के ख़िलाफ़ इस्तेमाल किया जाता है कि जिन की हिफ़ाज़त के नाम पर यह क़ानून लागू किए जाते हैं। इसकी एक मिसाल इमरजेंसी के तहत डिफ़ेन्स आफ़ पाकिस्तान रूल्ज़ का क़ानून था। जिसे न केवल अय्यूब और यहया के तानाशाही दौर बल्कि भुट्टो की सरकार में भी विरोधियों को कुचलने के लिए इस्तेमाल किया गया।

भारत में आर्टिकल 124 ए के तहत कैसे कैसे "ग़द्दार और आतंकवादी" पकड़े गए?! बाल गंगाधर तिलक गांधी जी को अंग्रेज शासन में और मोदी शासन में शशि थरूर, हार्दिक पटेल, अरुंधतिराय, कन्हैया कुमार, राजदीप सरदेसाई, विनोद दुआ, ज़फ़र आग़ा, असीम त्रिवेदी और न जाने किस-किस को इस क़ानून का निशाना बनाया गया।

2010 से 2020 तक दस साल में भारत में देशद्रोह के 816 मुक़द्दमे दर्ज किए गए। इनमें 65 फ़ीसद मामले मोदी सरकार बनने के बाद दर्ज किए गए। एसे एसे ग़द्दार पकड़े गए के असली ग़द्दारों ने दांतों तले उंगली दबा ली। मसलन गुजरात के एक पत्रकार पर इसलिए देशद्रोह का मुक़द्दमा कर दिया गया कि उसने भविष्यवाणी कर दी थी कि राज्य में नेतृत्व बदलने वाला है। यूपी में एक पत्रकार ने रेप की पीड़िता के घर जाकर सच्चाई जानने की कोशिश की तो वह भी आर्टिकल 124 ए के तहत धर लिया गया। मणिपुर में जब एक पत्रकार ने सोशल मीडिया पर भाजपा के नेता की पत्नी की पोस्ट का जवाब दे दिया तो उसे भी देशद्रोह के मामले में पकड़ लिया गया। एक व्यक्ति ने फ़ेसबुक पर मोदी की आलोचना करने वाला एक कार्टून शेयर कर दिया तो वह भी देशद्रोही हो गया।

सरकारें भी जानती हैं कि इस प्रकार के क़ानून फटीचर हो चुके हैं। कोई भी बड़ी अदालत उनके तहत बनाए मुक़द्दमों को एक सुनवाई के बाद ही ख़ारिज कर देती है। मगर ज़मानत होते होते आरोपी को कम से कम दबाव में तो रखा जा सकता है। उसकी नाक तो रगड़ी जा सकती है। इसी लिए इस तरह के क़ानून निरस्त करने का किसी भी सरकार का दिल नहीं चाहता। दिल बस तब चाहता है जो सरकारी पार्टी अपोज़ीशन की बेंचों पर जा बैठती है।

पाकिस्तान के जाने जाने टीकाकार वुसअतुल्लाह ख़ां के लेख के कुछ भाग  

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