शहीद जनरल सुलैमानी की बरसी पर विशेष कार्यक्रम (3)
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"मेरा आपसे एक सवाल है। आपके इस मजमे में जो सवाल मैं पूछना चाहता हूं यह वही सवाल है जो मैंने अपने शहीद हो चुके साथियों के जनाज़े के क़रीब उनके क़रीबियों से पूछा कि फ़लां साहब कैसे इंसान थे?
(last modified 2023-04-09T02:55:50+00:00 )
Dec ३०, २०२१ १३:२८ Asia/Kolkata
  • शहीद जनरल सुलैमानी की बरसी पर विशेष कार्यक्रम (3)

"मेरा आपसे एक सवाल है। आपके इस मजमे में जो सवाल मैं पूछना चाहता हूं यह वही सवाल है जो मैंने अपने शहीद हो चुके साथियों के जनाज़े के क़रीब उनके क़रीबियों से पूछा कि फ़लां साहब कैसे इंसान थे?

उन्होंने जवाब दिया कि अच्छे इंसान थे। मैं इस वक़्त आपसे जो गवाही दिलवाना चाहता हूं वह उस प्रतिष्ठा और सम्मान की वजह से है जो अल्लाह की नज़र में एक मोमिन इंसान की होती है। आप मोमिन हैं। आपके मजमे में निष्ठावान लोग बहुत सारे हैं। जो चीज़ मेरे लिए महत्वपूर्ण है वह आपका इक़रार है कि क्या मैं आपने मन में अच्छा आदमी हूं? मैं इसका जवाब चाहता हूं। मैं अल्लाह से दुआ मांगता हूं, चूंकि वह सारी चीज़ों को देखता है और सारी चीज़ें लिखी जाती हैं और एक दिन जब लोग जमा किए जाएंगे कि अपने कर्मों को देखें, मैं दुआ मांगता हूं कि अल्लाह आपकी इस गवाही को क़ुबूल कर ले। मुझे आशा है कि मेरे जनाज़े के क़रीब खड़े होकर दूसरों के साथ यह गवाही देंगे।"

यह बातें शहीद जनरल क़ासिम सुलैमानी की एक तक़रीर का हिस्सा हैं। ज़्यादा समय नहीं बीता था कि वह दिन आया जब करोड़ों लोग अपने नेता के साथ अपने प्यारे कमांडर की नमाज़े जनाज़ा पढ़ रहे थे और नमाज़ के एक हिस्से में अल्लाह से कह रहे थे कि परवरदिगार हमने इस इंसान से नेकी के अलावा कुछ नहीं देखा, हमने इनसे भलाई के अलावा कुछ नहीं देखा।

राष्ट्रों के इतिहास में एसे दिन भी आते हैं जब त्याग, बलिदान और बहुत अधिक क़ुरबानियों की मदद से ही ख़तरों को टालने में कामयाबी मिल पाती है और बड़े और महान लक्ष्यों की रक्षा होती है। इस तरह के अवसरों पर मोमिन और त्यागी स्वभाव के लोगों को मैदान में उतरना पड़ता है और अपना ख़ून देकर सत्य के मार्ग की रक्षा करनी होती है। इस्लामी भाषा में इस तरह के बलिदानी लोगों को शहीद कहा जाता है। कुछ लोगों ने शहीदों की उपमा जलते दीपक से दी है जो अपने इर्द गिर्द के माहौल से अंधेरा दूर करता है। शहीद की सेवा का भाव और अंदाज़ यह होता है कि वह ख़ुद मिट जाता है लेकिन अपने परिसर को आबाद कर जाता है, छाया का इंतेज़ाम कर जाता है ताकि दूसरों को इस छाया में सुकून से बैठने और विश्राम करने का मौक़ा मिल जाए। शहीद क़ासिम सुलैमानी की बात की जाए तो उनकी सेवा का अंदाज़ और उनका प्रकाश सुबह के समय उगने वाले सूरज की तरह था जो पूरे संसार को अपना प्रकाश देता है। इस्लामी क्रांति के सर्वोच्च नेता ने इस महान कमांडर की शहादत को इस अंदाज़ से बयान किया है, शहीद तो हमारें यहां बहुत से हैं, सिपाहे पासदारान के अंदर भी शहीद हैं, अवाम के अंदर भी शहीद हैं। लेकिन वह शहीद जो दुनिया के सबसे दुष्ट इंसानों यानी अमरीकियों के हाथों शहीद किया जाए और अमरीकी उसे शहीद करने के बाद गर्व करें कि वह उसे शहीद करने में कामयाब हो गए हैं, एसा शहीद जनरल क़ासिम सुलैमानी के अलावा मुझे कोई और याद नहीं आता। उनका जेहाद बहुत बड़ा था और अल्लाह ने उनकी शहादत को भी बहुत बड़ी शहादत क़रार दिया। हम उम्मीद करते हैं कि अल्लाह उनका दर्जा बुलंद करे। जो महान नेमत उन्हें मिली वह उन्हें मुकारब हो। वह इन नेमत के हक़दार थे।

जनरल सुलैमानी को सर्वोच्च नेता ने निशाने ज़ुलफ़ेक़वार पुरस्कार से नवाज़ा। निशाने ज़ुलफ़ेक़ार ईरान का सबसे बड़ा सैनिक एवार्ड है जो आर्म्ड फ़ोर्सेज़ के सुप्रीम कमांडर द्वारा उन लोगों को दिया जाता है जो सामरिक नेतृत्व में बड़ी सफलता और बहादुरी का प्रदर्शन करते हैं। सामरिक एवार्ड मनोबल बढ़ाने, आत्म विश्वास अधिक मज़बूत करने और उत्साह बढ़ाने के लिए दिए जाते हैं। इन एवार्डों में कारनामे की क़िस्म, महारत और उपयोगिता के आधार पर अंतर होता है। जब एक कार्यक्रम में सर्वोच्च नेता ने जनरल सुलैमानी को यह एवार्ड दिया तो उस समय कहा था कि अल्लाह की राह में जेहाद की इन चीज़ों से तुलना और बराबरी नहीं की जा सकती। अल्लाह कहता है कि अल्लाह ने मोमिन इंसानों की जान और माल ख़रीद ली और इसकी क़ीमत के तौर पर उन्हें जन्नत प्रदान कर दी। वह अल्लाह की राह में जेहाद करते हैं तो क़त्ल करते हैं और क़त्ल हो जाते हैं। अल्लाह के रास्ते में जेहाद का बदला जो अल्लाह ने रखा है वह जन्नत और अल्लाह की प्रसन्नता है। हमारे हाथ में और हमारे पास जो चीज़ें हैं चाहे ज़बानी शुक्रिया हो, अमली तौर पर किया जाने वाला शुक्रिया हो, दिया जाने वाला पुरस्कार हो या कोई पदवी हो, यह सारी चीज़ें दुनिया के हिसाब किताब में उल्लेखनीय मानी जाती हैं लेकिन आध्यात्मिक हिसाब किताब और अल्लाह के हिसाब किताब की बात की जाए तो फिर यह चीज़ें उल्लेखनीय नहीं रह जातीं। अल्लाह ने हमारे इस बेहद अज़ीज़ भाई जनाब सुलैमानी को बड़ी तौफ़ीक़ दी है। इन्होंने बार बार एसा हुआ कि अपनी जान ख़तरे में डालकर ख़ुद को वहां पहुंचा दिया जहां दुश्मन के भीषण हमले हो रहे थे। उन्होंने अल्लाह की राह में, अल्लाह के लिए पूरे ख़ुलूस से जेहाद किया। अल्लाह उन्हें इसका बदला दे, इन पर कृपा करे, इनके जीवन को सौभाग्यशाली बनाए और इनका अंजाम शहादत हो। अलबत्ता अभी नहीं। अभी तो इस्लामी गणराज्य को बर्सों इनकी ज़रूरत है। लेकिन इनका अंजाम इंशाअल्लाह शहादत हो। आपको बहुत बहुत मुबारक हो।

जनरल क़ासिम सुलैमानी और इराक़ की हश्दुश्शाबी फ़ोर्स के वरिष्ठ अधिकारी अबू महदी अलमुहंदिस दूसरे 8 लोगों के साथ तीन जनवरी 2020 की सुबह बग़दाद एयरपोर्ट के परिसर में अमरीका के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प के आदेश पर पेंटागोन के ड्रोन विमानों के आतंकी हमले में शहीद हो गए। इस शहादत के बाद जनरल सुलैमानी अमर नायक बन गए। वह इस अंदाज़ से शहीद हुए कि जिस तरह उन्होंने अपनी ज़िंदगी में दाइश की कमर तोड़ दी उसी तरह अपनी शहादत से उन्होंने अमरीकाऔर उसके घटकों के शासकों को हमेशा के लिए अपमानित कर दिया।

इस महान कमांडर की शहादत के बाद अमरीका की साम्राज्यवादी सरकार के ख़िलाफ़ ईरान में व्यापक जनाक्रोश फैल गया। ईरान और इराक़ में जनरल क़ासिम सुलैमानी और शहीद अबू महदी अलमुहंदिस के अंतिम संस्कार में करोड़ों लोगों का शामिल होना और अपने चहेते कमांडरों के लिए आंसू बहाना शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता। ईरान और इराक़ और दूसरे देशों में करोड़ों लोगों ने शहीद सुलैमानी का शोक मनाया और उनकी राह पर सफ़र जारी रखने का संकल्प दोहराया। आयतुल्लाह ख़ामेनेई ने जनरल क़ासिम सुलैमानी की शहादत की बर्सी के अवसर पर अपने भाषण में कहा कि शहीद सुलैमानी ने अपनी ज़िंदगी में भी साम्राज्यवाद को शिकस्त दी और अपनी शहादत से भी साम्राज्यवादी को शिकस्त दी। ईरान में इन महान शहीदों का जो अंतिम संस्कार हुआ वह वाक़ई अजीब और अविस्मरणीय था। इसी तरह इराक़ में जो शव यात्रा निकली जिसमें दसियों लाख लोगों ने हिस्सा लिया, नजफ़ में, बग़दाद में शव यात्रा में दसियों लाख लोगों ने भाग लिया शहीद सुलैमानी और शहीद अबू महदी अलमुहंदिस की शव यात्रा एक साथ निकली। इन शव यात्राओं को देखकर साम्राज्यवादी शक्तियों के साफ़्ट वार के विशेषज्ञ हैरत में पड़ गए। साम्राज्यवादी शक्तियों की साफ़्ट वार के जो विशेषज्ञ हैं जो साफ़्ट वार को आगे ले जाते हैं वह हैरान रह गए कि यह क्या स्थिति हो गई, यह कौन हस्ती थी? यह कैसा माहौल बन गया कि जिससे उनके मंसूबे नाकाम हो गए।

शहीद सुलैमानी हमले में इस तरह शहीद हुए कि उनके शव का बहुत कम हिस्सा ही बचा था। उनका सिर नहीं था केवल कंधे का एक भाग, पैर का थोड़ा सा हिस्सा और हाथ का एक भाग बचा था। शहीदों के शवों को जंग के मैदानों से वापस लाने वाली कमेटी के कमांडर जनरल बाक़िरज़ादे शहीद सुलैमानी के शव की स्थिति को बयान करते हुए कहते हैं कि हमने शहीदों के पाकीज़ा शव को दफ़्न के लिए तैयार किया। उन्हें ग़ुस्ल नहीं दिया जा सकता था इसलिए तयम्मुम करवाया गया। इस पूरी प्रक्रिया के लिए संबंधित स्थान पर जवान तैयार खड़े थे। कफ़न, रूई, कपड़ा प्लास्टिक और दूसरे सामान सब कुछ मौजूद था लेकिन इन शवों को तैयार करने में हमें बड़ी मुश्किल हुई। क्योंकि इन शवों के छोटे छोटे टुकड़ों को जमा किया गया। गोश्त के टुकड़ों को जमा किया गया कि शव पूरा हो सके और फिर उसे ताबूत के भीतर रखा जाए। जनरल बाक़िर ज़ादे अपनी बात को जारी रखते हुए कहते हैं कि हमने बड़ी कठिनाई से इन शवों के टुकड़े जमा किए। हमें नहीं मालूम कि इमाम सज्जाद अलैहिस्सलाम ने किस तरह कर्बला में हमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के शव को दफ़्न के लिए तैयार किया होगा। जंग का शहीद फ़िक़ह में उसे कहा जाता है जो जंग के दौरान लड़ता हुआ शहीद हो जाए। आयतुल्लाह ख़ामेनेई की नज़र में जनरल क़ासिल सुलैमानी और उनके साथियों का बग़दाद एयरपोर्ट पर जाना और वहां उन पर अमरीका की ओर से कायरतापूर्ण हमला जंग के मैदान की तसवीर पेश करता है। इससे अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि जनरल क़ासिम सुलैमानी की कितनी महानता थी। उनकी शहादत अग्रिम पंक्ति में होने वाली शहादत थी। यहां हमें पैग़म्बरे इस्लाम का कथन याद आता है जिसमें उन्होंने कहा कि सबसे महान शहीद वे हैं जो अग्रिम पंक्ति में शहीद हों और शहीद होने तक जंग से पीछे न हटें। इस तरह के शहीद जन्नत में भव्य कक्षों में होंगे, अल्लाह उनसे ख़ुश और राज़ी होगा। जब अल्लाह किसी बंदे से ख़ुश हो तो उसका कोई हिसाब नहीं लिया जाएगा।