महिलाओं के बारे में इस्लाम का दृष्टिकोण तार्किक हैः वरिष्ठ नेता
सर्वोच्च नेता कहते हैं कि महिलाएं, परिवार की सुरक्षा और यौन आकर्षण के ख़तरों से बचते हुए सामाजिक गतिविधियों में भाग ले सकती हैं।
इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता कहते हैं कि इस्लाम में पुरूषों की ही भांति महिलाओं के लिए भी सामाजिक गतिविधियों में भाग लेने के लिए मार्ग खुला हुआ है। उन्होंने कहा कि दो शर्तों के साथ महिलाएं, हर सामाजिक गतिविधि में भाग ले सकती हैं पहली शर्त यह है कि परिवार की सुरक्षा और दूसरी शर्त यौन आकर्षण के ख़तरों से बचना।
हज़रत फ़ातेमा ज़हरा के शुभ जन्म दिवस के उपलक्ष्य में समाज के विभिन्न वर्गों की महिलाओं के साथ होने वाली भेंट में बुधवार को आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामेनेई ने महिलाओं की पहचान, उनके मूल्यों, अधिकारों, कर्तव्यों, स्वतंत्रता और सीमाओं को बहुत ही महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि इस अति महत्वपूर्ण विषय के बारे में विश्व में दो दृष्टिकोण पाए जाते हैं। एक इस्लामी और दूसरा पश्चिमी। यह दोनों एक दूसरे के मुक़ाबले में हैं।
महिलाओं और पुरूषों के बीच पाया जाने वाला शारीरिक अंतर, उन मुद्दों में से एक है जिसने समाज में महिलाओं की स्वतंत्रता और अधिकारों के बारे में संदेह पैदा किये हैं। यही विषय उनके मध्य क़ानूनी अधिकारों में मतभेदों का कारण बना हुआ है। इस बारे में इस्लाम और पश्चिम के दृष्टिकोणों में खुला विरोधाभास पाया जाता है। पश्चिम में महिलाओं की स्वतंत्रता को लेकर फेमिनिज़्म या नारीवादी विचारधारा ने जन्म लिया। इस विचारधारा के अन्तर्गत महिलाओं को न्याय दिलवाने के लिए यह, सभी सामाजिक संरचनाओं में बदलाव की इच्छुक है। हालांकि पश्चिम में इसके विपरीत बहुत कुछ देखा जा रहा है।
वहां पर इस समय भी महिलाओं को अन्याय तथा हिंसा का सामना है। पश्चिम में पाई जाने वाली पूंजीवादी व्यवस्था, पुरूष प्रधान संस्कृति की आड़ में फेमिनिज़्म को बढ़ावा देकर ख़ूब लाभ उठा रही है। पश्चिम की पूंजीवादी व्यवस्था अपने संचार माध्यमों और विज्ञापन उद्योग के माध्यम से कुछ विशेष प्रकार की सांस्कृतिक मान्यताओं को बढ़ावा देकर महिलाओं के मान-सम्मान का दुरूपयोग कर रही है। पश्चिम में महिलाओं ने हालांकि कुछ क्षेत्रों में स्वतंत्रता हासिल की है किंतु वहां पर वे अपनी प्रकृति से दूर होती जा रही हैं। यही विषय पश्चिम में महिलाओं की पहचान को लेकर चिंता का कारण बना हुआ है।
फैमिनिज़्म विचारधारा के एक आलोचक टोनी ग्रैंट मानते हैं कि वर्तमान समय में पश्चिम में महिलाएं स्वतंत्र तो दिखाई दे रही है किंतु भावनात्मक रूप से वे अपनी मां और दादी या नानी की तुलना में अधिक ज़रूरतमंद, अधिक असुरक्षित एवं अधिक अकेली तथा असहाय हो चुकी हैं। इस समय पश्चिम में नारीवाद की आड़ में महिलाओं के अधिकारों की समानता की जो बात की जाती है वह वास्तव में उसके अधिकारों को अनेदखा करने के अर्थ में है क्योंकि वहां पर वे भावनात्मक एवं मनोवैज्ञानिक रूप में अधिक दबाव सहन कर रही हैं।
इसी संदर्भ में इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता ने कहा है कि शारीरिक एवं मानसिक क्षमताओं के हिसाब से पुरूषों और महिलाओं के कर्तव्य भी अलग-अलग हैं। इस हिसाब से कुछ लोग जो निरपेक्ष रूप में लैंगिक समानता का नारा पेश करते हैं वह अनुचित है बल्कि जो बात सही है वह है लैंगिक न्याय।
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