इंसान प्रेम की उत्पत्ति हैः स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी
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इंसान और अल्लाह को जो चीज़ जोड़ती है वह प्राकृतिक प्रेम है जिसे अल्लाह ने इंसान के अस्तित्व में रखा है। क्योंकि अल्लाह इंसान को दोस्त रखता है और उसे पैदा करता है ताकि वह उससे बात करे, इंसानों को अल्लाह से बात करने के लिए पैदा किया जाता है।
(last modified 2024-03-27T00:55:31+00:00 )
Mar २५, २०२४ १६:१५ Asia/Kolkata
  • इंसान प्रेम की उत्पत्ति हैः स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी

इंसान और अल्लाह को जो चीज़ जोड़ती है वह प्राकृतिक प्रेम है जिसे अल्लाह ने इंसान के अस्तित्व में रखा है। क्योंकि अल्लाह इंसान को दोस्त रखता है और उसे पैदा करता है ताकि वह उससे बात करे, इंसानों को अल्लाह से बात करने के लिए पैदा किया जाता है।

हर चीज़ का एक अंत है परंतु यह अंत स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी के दृष्टिकोण से एक भिन्न विषय है। स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी के दृष्टिकोण में दृष्टि और अमल एक दूसरे से अलग नहीं हैं। स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी इंसान के अंजाम को ईश्वरीय गुणों व विशेषताओं का जलवा मानते थे। इंसान को इस चीज़ को समझना चाहिये कि वह कहां से आया है और कहां जा रहा है और उसे किस तरह जाना चाहिये। यह वह चीज़ है जो उसे दूसरी चीज़ों से भिन्न करती है।

इंसान की वास्तविकता इस तरह है कि वह समस्त ईश्वरीय विशेषताओं का प्रतिबिंबन बन सकता है और अपनी इच्छा व इरादे से आध्यात्मिक चरणों को तय कर सकता है। स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी इस संबंध में फरमाते हैं अगर कोई आध्यात्मिक प्रगति पर ध्यान दे और यह कार्य उसकी आत्ममुग्धता का कारण बने तो अपने आप पर यह ध्यान देना आध्यात्मिक पतन का कारण बनेगा क्योंकि उसने स्वयं को नहीं छोड़ा है।

जो लोग अल्लाह के प्रेम पर ध्यान देते और उसे समझते हैं वे हमेशा अल्लाह की रज़ा पर राज़ी होते हैं और उनका सारा ध्यान अल्लाह की ओर होता है। इसी वजह से वे दूसरों से जो प्रेम करते हैं वह भी अल्लाह ही के लिए होता है और इसके मुकाबले में वे दूसरों की जो सेवा करते हैं किसी प्रकार की अपेक्षा नहीं रखते हैं, वे आगे बढ़ने के लिए दूसरों का प्रयोग माध्यम व हथकंडे के रूप में नहीं करते हैं और समस्त चीज़ों से प्रेम करते हैं क्योंकि वे सबको अपने पालनहार की संतान व रचना समझते हैं।

प्रेम की आग और हक़ का प्रकाश स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी की विचारधारा में वह मार्ग है जो इंसान को परिपूर्णता तक पहुंचाता है वह इंसान इलाही रंग में रंग जाता है यानी सत्य व हक के प्रकाश से लाभांवित होता है और अपने दिल को उसके प्रेम से जोड़ लेता है। स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी की विधारधारा में न बुद्धि के बिना प्रेम, और न प्रेम के बिना बुद्धि इंसान को परिपूर्णता तक नहीं पहुंचा सकती है।

स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी फरमाते हैं कि इंसान, प्रेम की उत्पत्ति है। हर इंसान प्राकृतिक रूप से अल्लाह को जानने का जिज्ञासु होता है और अल्लाह से प्रेम करता है ऐसा प्रेम कि अगर परवान चढ़ जाये तो इंसान वही पसंद करेगा जो अल्लाह पसंद करता है।

जो चीज़ इंसान और अल्लाह को एक दूसरे से जोड़ती है वह प्राकृतिक प्रेम है जो अल्लाह ने इंसान के अस्तित्व में रखा है क्योंकि वह इंसान को दोस्त रखता है और उसे पैदा करता है ताकि उससे बात करे, इंसान उससे बात करने के लिए पैदा किये जाते हैं। इन चीज़ों के बाद वास्तविक प्रेम हासिल होता है और हक के प्रकाश और प्रेम की अग्नि में संबंध से ईमान हासिल होता है कि स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी रह. इस प्रतिबिंबन को ईमान का प्रकाश मानते हैं।

डाक्टर फ़ातेमा तबातबाई

यह विषयवस्तु डाक्टर फातेमा तबातबाई के संबोधन व भाषण का एक भाग है। डाक्टर फातेमा तबातबाई SCIENTIFIC  ASSOCIATION  OF ISLAMIC  MYSTICISM OF IRAN  AND THE DIRECTOR OF THE ISLAMIC MYSTICISM GROUP की संस्थापक हैं। MM

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