शाह अब्बास डैम: दक्षिणी खुरासान में जल इंजीनियरिंग का बेहतरीन नमूना
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शाह अब्बास डैम: दक्षिणी खुरासान में जल इंजीनियरिंग का बेहतरीन नमूना
पार्स टुडे - तबस के निकट मुर्तज़ा अली की खूबसूरत घाटी में, शाह अब्बास डैम मध्यकालीन ईरान में जल इंजीनियरिंग की अद्भुत प्रतिभा का एक मूक लेकिन स्थायी स्मारक है।
शाह अब्बास डैम, जो चौदहवीं शताब्दी में इलखानी काल के दौरान एक मेहराब के रूप में बनाया गया था, नमकी नदी की एक सहायक नदी, सरदार नदी को 20 मीटर की ऊंचाई पर रोकता है। पार्स टुडे की रिपोर्ट के अनुसार, इस डैम का नाम सफ़वी काल से जुड़ा हुआ है, क्योंकि इसका व्यापक पुनर्निर्माण शाह अब्बास प्रथम या द्वितीय के शासनकाल में हुआ था और तब से यह इस महान शासक के नाम से जाना जाता है।
यह डैम ईंट, पत्थर और मोर्टार के मिश्रण से बनाया गया है और इसकी सबसे खास बात इसके आधार पर नुकीली मेहराब है। यह एक जटिल और सरल डिजाइन थी जिसका उद्देश्य पानी के प्रवाह का सटीक प्रबंधन करना था। हर दस साल में आने वाली सामान्य बाढ़ आसानी से मेहराब के नीचे से बह जाती थी, लेकिन भीषण बाढ़ के समय, डैम के पीछे कुछ पानी जमा हो जाता था, जिससे तबास शहर विनाश के खतरे से बच जाता था।
डैम के पीछे गाद जमा होने से रोकने और इसके कामकाज को हमेशा बनाए रखने के लिए इसके निर्माण स्थल को भी सावधानी से चुना गया था। मेहराब का निचला हिस्सा, जो संरचना का सबसे पुराना भाग है, सीधे घाटी की पत्थर की दीवारों में तराशा गया है और इसकी ईंटों को पहाड़ में रेडियल (त्रिज्यीय) ढंग से रखा गया है ताकि एक मजबूत और एकीकृत संरचना बन सके। डैम के ऊपरी हिस्से को बजरी से पूरा किया गया था।
इस रचनात्मक और मजबूत डिजाइन ने, बाढ़ पर उच्च नियंत्रण क्षमता के साथ मिलकर, शाह अब्बास डैम को बिना किसी मरम्मत या रखरखाव के सदियों तक खड़े रहने में सक्षम बनाया है।
डैम के पास, एक पत्थर पर बकरियों की नक्काशी की गई है, जो शायद इस क्षेत्र के बाद के निर्माताओं या निवासियों के दैनिक जीवन का संकेत है - इंजीनियरिंग की भव्यता के बगल में इतिहास की एक सूक्ष्म झलक।
इलखानी काल में जल क्रांति और ईरान में डैम निर्माण की विरासत
इलखानी काल में जल इंजीनियरिंग की महत्वाकांक्षाओं ने ईरान के पठार में एक प्रकार की 'जल क्रांति' का सूत्रपात किया, यह पुनर्निर्माण और नवाचार का युग था, जो तेरहवीं शताब्दी में मंगोल आक्रमण के विनाश के बाद उभरा और इसने बड़े पैमाने पर क़नातों (भूमिगत जलमार्गों), नहरों के पुनरुद्धार और नए बांधों के निर्माण को जन्म दिया। दक्षिणी खुरासान में स्थित शाह अब्बास डैम इस स्वर्ण युग का केवल एक उत्कृष्ट उदाहरण है।
इलखानी ने, जो फारसी संस्कृति में घुल-मिल गए थे, न केवल पुरानी जल प्रणालियों का जीर्णोद्धार किया, बल्कि ऐसे बांधों का निर्माण भी किया जो अपने समय में इंजीनियरिंग के चमत्कार माने जाते थे।
इन संरचनाओं में तबास के पास स्थित कोरित मेहराबदार डैम का नाम लिया जा सकता है, जो 56 मीटर की अपनी आश्चर्यजनक ऊंचाई के साथ, ईरान के ऐतिहासिक बांधों में सबसे ऊंचों में से एक है।
देश के पश्चिम में, क़ोम शहर के निकट, 26 मीटर ऊंचा, 55 मीटर लंबी चोटी वाला और 6 से 9 मीटर के परिवर्तनशील मोटाई वाला कोबर मेहराबदार डैम बनाया गया था, यह डैम अपने प्रकार का सबसे पुराना जीवित उदाहरण माना जाता है और इसने पश्चिम में इसी तरह के नमूनों से कई शताब्दियों पहले अस्तित्व में आया था।
इलखानियों की विकास योजना केवल मेहराबदार बांधों तक सीमित नहीं थी; उन्होंने सावेह और काशमर के पक्ष स्थित शेश-तराज़ जैसे बड़े गुरुत्वीय बांधों (वज़न से पानी रोकने वाले डैम) का भी निर्माण किया, जो उनके राज्य क्षेत्र में जल संसाधन प्रबंधन और कृषि विकास के लिए एक व्यापक और उन्नत दृष्टिकोण को दर्शाता है।
यह इंजीनियरिंग विरासत न केवल इलखानी युग में फारसी प्रतिभा का प्रतीक है, बल्कि इसने आने वाली शताब्दियों में कई जल संबंधी उपलब्धियों की नींव रखी।
वैश्विक इंजीनियरिंग में ईरान का स्थान
इलखानी बांधों, जिनमें शाह अब्बास डैम भी शामिल है, का वैश्विक महत्व उनकी इंजीनियरिंग में निहित है, ये ऐसी संरचनाएं हैं जिन्हें दुनिया के पहले वास्तविक मेहराबदार बांधों के रूप में मान्यता प्राप्त है और ये यूरोप में बने इसी तरह के बांधों से कई सदियों पहले बनाए गए थे।
हालांकि प्राचीन काल में, विशेष रूप से रोमनों द्वारा, मेहराबदार डैम बनाए गए थे, लेकिन उनकी डिजाइन अपेक्षाकृत बुनियादी थी। वालोन डी बोम, एस्पेरागैल्हो और डर्ब जैसे डैम अधिकतर मेहराब-गुरुत्व या बट्रेस (अवलंब स्तंभ) प्रकार के थे; इनकी योजना गोलाकार या बहुभुजाकार होती थी और ये अपनी स्थिरता के लिए मेहराब की शक्ति और अपने भारी वजन दोनों पर निर्भर करते थे। ये डिजाइन अधिक मोटे, छोटे (लगभग 12 मीटर तक) और इंजीनियरिंग की दृष्टि से कम कुशल थे।
लेकिन चौदहवीं शताब्दी में ईरान के इलखानी बांधों ने जल इंजीनियरिंय में गुणात्मक छलांग लगाई। ये डैम पत्थर की चिनाई वाले मेहराब-गुरुत्व प्रकार के थे, जिन्हें सिंचाई और जल आपूर्ति के उद्देश्य से बनाया गया था और इन्होंने अपनी अभूतपूर्व ऊंचाई और संकरी, सटीक मेहराबदार संरचना के साथ, पानी के दबाव का मुकाबला करने के लिए मेहराब के सिद्धांत का बहुत अधिक प्रभावी ढंग से उपयोग किया।
यूरोप में, मेहराबदार बांधों के साथ गंभीर प्रयोग दो शताब्दियों बाद तक शुरू नहीं हुए; स्पेन में अलमांसा डैम और एल टिबी डैम जैसी संरचनाओं के बावजूद, जो प्रभावशाली तो थे, फिर भी मोटे और छोटे (33 और 46 मीटर) मेहराब-गुरुत्व प्रकार के ही थे और फारसी मॉडल की इंजीनियरिंग सूक्ष्मता तक नहीं पहुंच पाए।
बीसवीं शताब्दी तक, कंक्रीट जैसी नई सामग्रियों और उन्नत संरचनात्मक गणनाओं के उदय के साथ, पश्चिमी डैम आयाम और ऊंचाई में फारसी नमूनों से आगे निकलने में सक्षम हो पाए। फिर भी, इलखानी इंजीनियरों की विरासत आधुनिक मेहराबदार बांधों के असली अग्रदूतों के रूप में विश्व इंजीनियरिंग के इतिहास में बनी हुई है। (AK)
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