शीराज़ के बाग़: इतिहास, कविता और भव्यता के गवाह
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शीराज़ के बाग़: इतिहास, कविता और भव्यता के गवाह
पार्सटुडे: शीराज़ शहर, जो ईरान की समृद्ध विरासत की एक चमकदार मणि और कविता तथा साहित्य का प्रतीक है, अपने मनमोहक बाग़ों के लिए भी प्रसिद्ध है। ये बाग़ देशी पर्यटकों और विदेशी यात्रियों दोनों को समान रूप से आकर्षित करते हैं।
दक्षिणी ईरान में स्थित शीराज़ के कूचा-बाग़, नारंगी की कलियों की सुगंध, सरू के पेड़ों का सुव्यवस्थित शांतिपूर्ण सौंदर्य और रंग-बिरंगे फूलों की क्यारियों से सजे हैं, जो प्राचीन वास्तुकला की एक विरासत को दर्शाते हैं। पर्स टीवी के हवाले से पार्सटुडे की रिपोर्ट के अनुसार, शीराज़ के पासारगादे में सबसे स्थायी नवाचार पत्थर की नक्काशी में नहीं, बल्कि एक शाही बाग़ के डिजाइन में देखने को मिला, जो 'चारबाग़' (फ़ार्सी बाग़) का पहला ज्ञात उदाहरण था।
पहली सहस्राब्दी ईसा पूर्व से ही बाग़ ईरानी वास्तुकला का एक अभिन्न अंग रहा है। पुरातत्वविदों ने पासारगाद में पत्थर की नहरों और तालाबों का एक जाल खोजा है, जो दो जुड़े हुए आयत बनाते थे और बाग़ को सटीक रूप से चार हिस्सों में विभाजित करते थे।
यह डिजाइन संभवतः मेसोपोटामिया में साइरस (कुरुष) की उपाधि 'शाह-ए-चार कोने' (चार दुनिया के राजा) की एक स्थापत्य अभिव्यक्ति थी।
हख़ामनी शासकों को बाग़वानी और कृषि का बहुत शौक था और उन्होंने कृषि, वनीकरण और सिंचाई के नवाचारों को गंभीरता से प्रोत्साहित किया।
व्यावहारिक पहलुओं और इंद्रियों को सुख देने वाले आनंद से परे, शीराज़ के शाही बाग़ों में राजनीतिक, दार्शनिक और धार्मिक प्रतीकात्मकता भी निहित थी। यह उस शासक की सोच को दर्शाता था जो बंजर भूमि से एक उपजाऊ बाग़ खड़ा कर दे और अव्यवस्था से व्यवस्था और समरूपता की स्थापना करे।
शाही बाग़: शक्ति के प्रतीक से वैश्विक विरासत तक
हख़ामनी काल के दौरान, बाग़ पहली बार न केवल वास्तुकला का एक हिस्सा, बल्कि उसका केंद्र बिंदु बन गया - यह अधिकार, उर्वरता और वैधता का एक शक्तिशाली प्रतीक बन गया। पासारगाद में विकसित 'चारबाग़' डिजाइन बाद में बार-बार दोहराया और परिष्कृत किया गया और इसका प्रभाव निकट पूर्व से आगे बढ़कर इस्लामी दुनिया और उससे भी परे बाग़ डिजाइन की आधारशिला बन गया।
इस्लामी काल में, बाग़ आमतौर पर आयताकार परिसर होते थे जो एक दीवार से घिरे होते थे और जिनमें एक भव्य प्रवेश द्वार और अंदर कई मंडप होते थे। पानी की नहरें एक ज्यामितीय पैटर्न में बाग़ से होकर गुजरती थीं और छायादार, फलदार और सजावटी पेड़ों के साथ-साथ ऐसे फूल लगाए जाते थे जो बाग़ को साल भर खिला रहने देते थे।
औपचारिक बाग़ों को खरीदने, विकसित करने और बनाए रखने के लिए आवश्यक भारी खर्च, विशेष रूप से ईरान की शुष्क जलवायु में, उन्हें शक्ति और प्रतिष्ठा का प्रतीक बना देता था। यह एक परंपरा थी जिसे बुयीद, ग़ज़नवी, तैमूरी और सफ़वी जैसे राजवंशों ने जारी रखा।
तब से, बाग़ ईरानी संस्कृति का एक अटूट हिस्सा बन गए हैं और यूरोप और एशिया में शासकों और बाग़-प्रेमियों की पीढ़ियों ने ईरानी बाग़ डिजाइन को अपनाया और उसकी नकल की।
शीराज़ के बाग़ों का वैभव
शीराज़ शहर की आत्मा कवियों और लेखकों से गहराई से जुड़ी हुई है, और इसीलिए इसे 'कविता और साहित्य का शहर' कहा जाता है। यह विशेषता यहाँ के शांत और विचारशील बाग़ों में स्पष्ट रूप से झलकती है।
बाग़-ए-दिलगुशा शीराज़ के सबसे पुराने और सुंदर बाग़ों में से एक है, जिसने तीन ऐतिहासिक कालों - सासानी, सफ़वी और क़ाजार - के दर्शन किए हैं। इसकी इमारत में आज भी सासानी वास्तुकला के नमूने देखे जा सकते हैं।
बाग़-ए-दिलगुशा की सुंदरता और अद्भुत छटा इतनी मनमोहक थी कि तैमूर लंग ने समरकंद में इसी तरह का एक बाग़ बनवाने का आदेश दिया था। यह बाग़ संतरे के घने पेड़ों के लिए प्रसिद्ध है, जो फरवरी-मार्च में खिलने वाली अपनी कलियों के साथ एक मादक और सुगंधित वातावरण बनाते हैं, जो बाग़ के अनुभव को और भी समृद्ध करता है।
बाग़-ए-एरम, जो यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल है, में संतरे, सरू और गुलाब के अद्वितीय संग्रह के साथ-साथ एक ऐतिहासिक और भव्य इमारत भी है। इसकी स्थापना सेल्जूक काल में हुई थी और बाद में ज़ंद काल में इसका जीर्णोद्धार किया गया। यह बाग़ खूबसूरत एरम स्ट्रीट पर स्थित है और पौधों की बहुलता के कारण इसे एक वनस्पति उद्यान (बॉटनिकल गार्डन) भी माना जाता है।
शीराज़ के ज़िंदा बाग़: प्रकृति, कला और आध्यात्म का मेल
नारंगेस्तान-ए-क़ेवाम, जिसे बाग़-ए-नारंग (संतरे का बाग़) भी कहा जाता है, का निर्माण क़ाजार काल में अली मोहम्मद खान गवाम के आदेश पर करवाया गया था। इस बाग़ का नाम यहाँ लगी कड़वे संतरे की असंख्य पेड़ों से पड़ा है। इसकी आंतरिक इमारत, जिसे ज़ीनत अल-मुल्क हाउस के नाम से जाना जाता है, शीशों की सजावट और बारीक नक्काशी से सजी हुई है, जो हर देखने वाले का मन मोह लेती है।
बाग़-ए-अफ़ीफ़ाबाद, जिसे पहले बाग़-ए-गुलशन (फूलों का बाग़) के नाम से जाना जाता था, अपने रंग-बिरंगे फूलों के कारण शीराज़ के सबसे पुराने बाग़ों में से एक है, जिसका इतिहास सफ़वी काल से जुड़ा है। यह बाग़ कभी बादशाहों के आमोद-प्रमोद का स्थान हुआ करता था।
बाग़-ए-जहाँ-नुमा, जिसे अपनी सुंदरता के कारण 'ज़ीनत अल-आलम' (दुनिया की शोभा) कहा जाता था, 700 साल से भी अधिक पुराना है। सफ़वी साम्राज्य के पतन और बाग़ के बर्बाद होने के बाद, करीम खान ज़ंद ने इसके पुनर्निर्माण का आदेश दिया और यहाँ एक अष्टकोणीय इमारत बनवाई।
बाग़-ए-हफ्त का निर्माण ज़ंद काल से पहले हुआ था, लेकिन करीम खान ज़ंद ने इसका विस्तार किया। इसका नाम बाग़ के अंदर दफन सात सूफी संतों की कब्रों से पड़ा है। करीम खान ने हर कब्र पर एक बड़ा पत्थर रखवाने का आदेश दिया, जिससे बाग़ की प्राकृतिक सुंदरता में आध्यात्मिकता का एक आयाम और जुड़ गया।
बाग़-ए-शापुरी और इसकी इमारत, आधुनिक वास्तुकला का एक उदाहरण है, जिसे वास्तुकार अबुलकासिम मेमार द्वारा 1930 से 1935 के बीच बनवाया गया था। एक बड़े हौज और लंबे पेड़ों से सजा यह बाग़ फोटोग्राफी और विश्राम के लिए एक आदर्श स्थान है। बाद में इसे सांस्कृतिक विरासत संगठन द्वारा खरीद कर संरक्षित कर लिया गया।
इन सभी बाग़ों में, पानी एक अनिवार्य और सदाबहार तत्व है। नहरों और फव्वारों का जाल, जैसा कि बाग़-ए-दिलगुशा के बीचों-बीच देखने को मिलता है, न सिर्फ सिंचाई का काम करता है बल्कि दृश्य और संवेदी शीतलता भी प्रदान करता है। मंडपों और इमारतों की सोची-समझी स्थिति इन दृश्यों के सौंदर्य पर चिंतन करने के लिए मनोरम दृश्यावली प्रस्तुत करती है।
शीराज़ के ये बाग़, अपने प्राचीन सरू के पेड़ों, संतरे की सुगंधित कलियों और सटीक ज्यामितीय डिजाइनों के साथ, न सिर्फ अतीत की यादगार हैं, बल्कि जीवंत और सक्रिय स्थान भी हैं, जो धरती पर एक प्रतीकात्मक स्वर्ग बनाने की ईरानियों की सदियों पुरानी आकांक्षा को साकार करते हैं। (AK)
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