ग़रीब-आबादी: अंतरराष्ट्रीय क़ानून चयनात्मक नहीं होने चाहिए
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काज़िम ग़रीब-आबादी, ईरान के विदेश मंत्रालय के उप प्रमुख
पार्सटुडे – ईरान के विदेश मंत्रालय के उप प्रमुख ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय कानून, यदि शांति का रक्षक बनना है, तो वह चयनात्मक नियमों का एक समूह नहीं हो सकता जिसे कुछ सरकारों के मामले में गंभीरता से लागू किया जाए और कुछ अन्य के मामले में राजनीतिक विचारों के कारण नज़रअंदाज़ किया जाए।
पार्सटुडे की रिपोर्ट के अनुसार काज़िम ग़रीब-आबादी ने शुक्रवार रात संयुक्त राष्ट्र के अंतरराष्ट्रीय कानून की रक्षा पर उच्च स्तरीय बैठक में भाग लेते हुए कहा कि इस्लामिक गणराज्य ईरान का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय कानून, यदि वास्तव में शांति, न्याय और मानवीय गरिमा का रक्षक बनना है, तो वह चयनात्मक नियमों का एक समूह नहीं हो सकता जिसे कुछ सरकारों के मामले में गंभीरता से लागू किया जाए और कुछ अन्य के मामले में राजनीतिक विचारों और शक्ति के कारण नज़रअंदाज़ किया जाए।
ईरान के विदेश मंत्रालय के उप प्रमुख ने घोषणा की कि इस्लामिक गणराज्य ईरान को हाल के वर्षों में चार्टर के बुनियादी सिद्धांतों के स्पष्ट उल्लंघन का सामना करना पड़ा है। 28 फरवरी 2026 को, अमेरिका और ज़ायोनी शासन का ईरान के खिलाफ सैन्य आक्रमण का नया दौर 40-दिवसीय युद्ध के रूप में शुरू हुआ। युद्ध के पहले दिन, इस्लामिक गणराज्य ईरान के दिवंगत और उच्च पदस्थ नेता तथा दक्षिणी ईरान के मीनाब शहर में 168 छात्र और प्राथमिक विद्यालय के शिक्षक शहीद हो गए।
उन्होंने स्पष्ट किया कि इस्लामिक गणराज्य ईरान का रुख स्पष्ट है: सरकारों की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का उल्लंघन और सौदेबाजी नहीं की जा सकती। कोई भी सरकार केवल राजनीतिक दावों या खतरे की एकतरफा व्याख्या के आधार पर बल के प्रयोग के निषेध के सिद्धांत को अलग नहीं रख सकती। यदि चार्टर के अनुच्छेद 2 के खंड 4 का बुनियादी सिद्धांत कमजोर हो जाए तो कोई भी देश, बड़ा या छोटा, अपनी सुरक्षा और संप्रभुता के बारे में आश्वस्त नहीं हो सकता।
ग़रीब-आबादी ने कहा कि ईरान का यह भी मानना है कि सशस्त्र हमलों का सामना करने की स्थिति में चार्टर और अंतरराष्ट्रीय कानून के ढाँचे में आत्मरक्षा का अधिकार पीड़ित सरकार के लिए एक वैध और कानूनी अधिकार है। साथ ही, इस्लामिक गणराज्य ईरान अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून के पालन, नागरिकों की सुरक्षा और सैन्य तथा गैर-सैन्य लक्ष्यों के बीच अंतर की आवश्यकता पर जोर देता है। इन सिद्धांतों का पालन बिना किसी अपवाद के होना चाहिए, चाहे फ़िलिस्तीन में हो, ईरान में हो, लेबनान में हो, यमन में हो या दुनिया के किसी भी अन्य हिस्से में।
उन्होंने जोर देकर कहा कि यदि अंतरराष्ट्रीय कानून शक्तिशाली और कमजोर, सहयोगी और गैर-सहयोगी, पूर्व और पश्चिम, उत्तर और दक्षिण के लिए समान न हो, तो इसकी विश्वसनीयता क्षरण के संपर्क में आएगी। इस दृष्टिकोण से, अंतरराष्ट्रीय न्यायालय की भूमिका दोगुनी महत्वपूर्ण है। न्यायालय को संयुक्त राष्ट्र के मुख्य न्यायिक अंग के रूप में राजनीतिक दबावों से स्वतंत्र होकर, सरकारों के बीच विवादों की जाँच करने और सरकारों की कानूनी प्रतिबद्धताओं को स्पष्ट करने में सक्षम होना चाहिए। mm