सऊदी अधिकारियों के अमरीका दौरे के बीच, अमरीका में ईरान विरोधी गतिविधियां
अमरीकी प्रतिनिधिसभा की विदेश संबंध समिति के प्रमुख एड रोएस ने शुक्रवार को इस देश के वित्त मंत्री जैक लो के नाम ख़त में उनसे मांग की कि ईरान का नाम उन देशों की सूचि में बाक़ी रखा जाए कि जिसका शीर्षक है ‘आतंकवाद की वित्तीय मदद व मनीलांडरिंग के संबंध में उल्लंघन व ख़तरनाक स्थल’
ईरान के ख़िलाफ़ यह बयान व गतिविधियां ऐसी स्थिति में सामने आयी हैं कि सऊदी शासक के उत्तराधिकारी मोहम्मद बिन सलमान ने अपने अमरीका दौरे में एक बयान में ईरान पर दबाव बढ़ाने की इच्छा जतायी।
जनमत को धोखा देने के लिए इस प्रकार के दावे व बयान ऐसी स्थिति में दिए जा रहे हैं कि 11 सितंबर 2001 की घटना के बाद 2002 में प्रकाशित रिपोर्ट में, सऊदी अरब को इस घटना के मुख्य ज़िम्मेदारों में बताया गया है। यही कारण है कि 11 सितंबर की रिपोर्ट के मुख्य 28 पेज को निकाल दिया गया है जबकि इन पेजों में इस घटना से संबंधित सुबूत हैं।
अमरीका ऐसी स्थिति में, ईरान के नाम को कथित रूप से वित्तीय दृष्टि से ख़तरनाक देशों की सूचि में बाक़ी रखने की कोशिश कर रहा है, कि अमरीकी कॉन्ग्रेस में ईरान में आतंकवादी गतविधियों के लिए बजट पास हुआ और वाइट हाउस ने एमकेओ नामक आतंकवादी गुट का खुल्लम खुल्ला समर्थन किया है। इस गुट और ईरान की इस्लामी व्यवस्था के अन्य विरोधियों के राजनैतिक व वित्तीय कार्यालय अमरीका में पूरी आज़ादी के साथ सक्रिय हैं। हालांकि ईरान 17000 शहीदों के बलिदान के साथ अमरीका और सऊदी अरब द्वारा समर्थित आतंकवाद की सबसे ज़्यादा बलि चढ़ा है।
अमरीका ने आतंकवादी गुटों की पैसों व हथियारों से मदद की और उन्हें हथकंडे के रूप में इस्तेमाल किया है। इसी प्रकार अमरीका ने ईरान में 1953 में सैन्य विद्रोह सहित अनेक देशों में सैन्य विद्रोह को संगठित किया।
अमरीका और सऊदी अरब के दृष्टिकोण में समानता वास्तव में सच्चाई को बदलने के लिए है। यह समानता दर्शाती है कि रियाज़ और वॉशिंग्टन एक ही सिक्के के दो रुख़ हैं हालांकि यह कहा जाता है कि उनके आपस में मतभेद हैं। इसी प्रकार अमरीका और सऊदी अरब ज़ायोनी शासन के साथ मिलकर, फूट डालने, संकट पैदा करने और ईरानोफ़ोबिया के परिप्रेक्ष्य में क्षेत्र में ईरान को ख़तरा दर्शा कर संयुक्त हित साधने की कोशिश में हैं। (MAQ/N)