परमाणु समझौता ट्रम्प प्रशासन की मजबूरी बन गया है
ईरान के विदेश मंत्री ने न्यूयॉर्क पहुंचने के बाद, परमाणु समझौते के सभी पक्षों से मांग की है कि वे समझौते की शर्तों का पालन करें।
शुक्रवार की सुबह ईरानी विदेश मंत्री मोहम्मद जवाद ज़रीफ़ स्थिर विकास के विषय पर संयुक्त राष्ट्र संघ की एक बैठक में भाग लेने न्यूयॉर्क पहुंचे हैं।
ज़रीफ़ ने न्यूयॉर्क में पत्रकारों से बात करते हुए परमाणु समझौते को लागू करने में असफल रहने पर अमरीका की तीखी आलोचना की और कहा कि अमरीका इस समझौते के तहत ईरान को पहुंचने वाले लाभ के मार्ग में भी रुकावटें खड़ी करता रहा है।
उन्होंने कहा कि परमाणु समझौता या जेसीपीओए वर्षों के दबाव का नतीजा है। जब ईरान पर प्रतिबंधों से दबाव बनाने में नाकाम रहे तो उनके पास वार्ता द्वारा इस मुद्दे का समाधान खोजने के अलावा कोई और विकल्प नहीं था।
ग़ौरतलब है कि परमाणु समझौते को पूरे दो साल हो चुके हैं, 14 जून 2015 को ईरान और विश्व की 6 बड़ी शक्तियों के बीच यह समझौता हुआ था। 16 जनवरी 2016 से इसे लागू किया गया। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद द्वारा इसके अनुमोदन के बाद से यह एक अंतरराष्ट्रीय समझौते में परिवर्तित हो गया, इसलिए यह अब किसी एक देश से विशेष नहीं है। इस समझौते पर हस्ताक्षर करने वाले समस्सत देश प्रतिबद्ध हैं कि वह इसे पूरी तरह लागू करें और कोई भी एक देश इसका एकपक्षीय रूप से उल्लंघन नहीं कर सकता।
हालांकि अमरीका में डोनल्ड ट्रम्प के सत्ता संभालने के बाद, परमाणु समझौते पर सवाल खड़े किए जाने लगे और इसे ख़त्म न कर पाने के कारण, इसकी नई व्याख्याएं खोजी जाने लगीं। ट्रम्प प्रशासन ने जब यह देखा कि इसे ख़त्म करने में असमर्थ है, तो उसने इसे कमज़ोर करना शुरू कर दिया है। ट्रम्प शासन ने यू-ट्रन लेकर ईरान पर ग़ैर परमाणु प्रतिबंध लगाने शुरू कर दिए हैं।
अब जब इस समझौते को दो साल पूरे हो गए हैं तो सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि ईरान द्वारा इस समझौते पर अमल करने के बारे में सोमवार को पेश की जाने वाली वाशिंग्टन की रिपोर्ट कैसी होगी। इसलिए कि अमरीकी विदेश मंत्रालय को हर 90 दिन में कांग्रेस के सामने यह रिपोर्ट पेश करना होती है कि ईरान परमाणु समझौते पर अमल कर रहा है या नहीं।
इस संदर्भ में अमरीकी पत्रिका वीकली स्टैंडर्ड ने गुरुवार को लिखा कि परमाणु समझौते के बारे में ट्रम्प के विचारों को देखते हुए कहा जा सकता है कि एक बार फिर वाशिंग्टन समझौते पर ईरान के अमल की पुष्टि कर देगा। इससे यही साबित होता है कि परमाणु समझौते को लेकर ट्रम्प के पास कुछ ज़्यादा विकल्प नहीं है और वह इस मामले में काफ़ी मजबूर है।