परमाणु समझौते के भविष्य पर सवाल, जवाब की प्रतीक्षा में विश्व जनमत
अमरीकी कांग्रेस की ओर से ईरान और गुट पांच धन के बीच हुए समझौते की समीक्षा की समयसीमा 14 दिसंबर को समाप्त हो रही है।
इस बात की ख़बरें आ रही हैं कि इस समय सीमा की समाप्ति के बाद अमरीकी राष्ट्रपति, जेसीपीओए से निकल जाएंगे।
यह कहा जा रहा है कि डोनाल्ड ट्रम्प अब इस निर्णय पर पहुंचे हैं कि अमरीका, परमाणु समझौते या जेसीपीओए के प्रति कटिबद्ध नहीं रह सकता। अब ट्रम्प, उसी तरह से जेसीपीओए से निकल सकते हैं जैसे वे पैरिस जलवायु अन्तर्राष्ट्रीय समझौते से निकल गए। इससे पहले ईरान के विदेशमंत्री जवाद ज़रीफ़ ने न्यूयार्क टाइम्स में प्रकाशित अपने लेख में यूरोप को चेतावनी दी थी कि वह इतिहास से पाठ ले और अमरीका की वर्चस्ववादी नीति का शिकार न हो। ज़रीफ़ ने यूरोपियों को याद दिलाया कि एक दशक पहले भी वाशिग्टन के दबाव के कारण ईरान और यूरोप के बीच परमाणु समझौता नहीं हो सका था।
एेसा लगता है कि ईरान के विरुद्ध ट्रम्प के हालिया विवादित बयान, जेसीपीओए से निकलने की भूमिका थे। ट्रम्प के यह हालिया बयान, उसी तरह के हैं जिस प्रकार से अमरीकी दूतावास को बैतुल मुक़द्दस स्थानांतरित करने का उनका विवादित फैसला। यह एेसा फैसला है जिसका अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर खुलकर विरोध किया जा रहा है। इन बातों से पता चलता है कि वर्तमान अमरीकी राष्ट्रपति, एेसा व्यक्ति हैं जो अन्तर्राष्ट्रीय समझौतों के प्रति कटिबद्ध नहीं है। एेसे में लगता है कि कांग्रेस के मौन के कारण ट्रम्प, परमाणु समझौते का विरोध करते हुए इस बात का प्रयास करेंगे कि अपने यूरोपीय घटकों को अलग न होने दें।
इसी बीच ज़ायोनी शासन और कुछ अरब देशों को यह आशा है कि जेसीपीओए के निरस्त होते ही पश्चिमी संचार माध्यमों में ईरानोफ़ोबिया का वातावरण फिर पैदा किया जाएगा।
ईरान कई बार यह कह चुका है कि सामने वाले पक्ष के जेसीपीओए से निकलने की स्थिति में तेहरान की प्रतिक्रिया बहुत तीव्र होगी।
अब सवाल यह पैदा होता है कि जेसीपीओए के बारे में वाशिग्टन का फैसला क्या होगा और यूरोप, ज़रीफ़ की चेतावनी की ओर ध्यान देगा या फिर अमरीका की आग़ोश में चला जाएगा इसका जवाब, आने वाला समय देगा।