परमाणु समझौते से अमरीका का निकलना, क्या हाथ लगा???
ईरान के विरुद्ध अमरीकी प्रतिबंधों का पहला भाग सोमवार से लौट आएगा। यह एेसे कमरतोड़ प्रतिबंध हैं जिनका ईरान पहले अनुभव कर चुका है किन्तु इससे ईरान की आंतरिक स्थिति मज़बूत होने के अतिरिक्त कोई और परिणाम सामने नहीं आया और इसने ईरान को इस परिणाम पर पहुंचा दिया कि कड़े दबावों की छत्रछाया में बाक़ी रहने और प्रगति करने के अलावा कोई और रास्ता नहीं है, विदेशी से अपेक्षा किए बिना अपनी सीमाओं की रक्षा करें और अंत में अपने आंतरिक आधारों को मज़बूत करें।
वास्तविकता यह है कि परमाणु समझौते के बारे में ईरान को अच्छी और बुरी दो नज़रों से देखा गया। ईरान के सैन्य अधिकारियों की रणनीति यह थी कि उन्होंने हमेशा से दुश्मन को दुश्मन ही समझा और यह उनकी दक्षता थी कि उन्होंने परमाणु समझौते पर हस्ताक्षर के आरंभिक दिनों से ही अपनी सैन्य क्षमताओं में वृद्धि और सैन्य क्षेत्र में विकास पर आग्रह करते रहे। इन अधिकारियों का यह मानना था कि परमाणु समझौते से पहले जिस प्रकार से सैन्य क्षेत्र में प्रगति जारी थी उसी तरह समझौते के बाद भी जारी रहे बल्कि इसको बढ़ाना ही अच्छा होगा।

इसी के साथ ईरान की राजनैतिक हस्तियों ने अंतर्राष्ट्रीय नियमों और क़ानूनों पर भरोसा करते हुए हमेशा से क़ानून के दायरे में परमाणु समझौते के समस्त पक्षों विशेषकर अमरीका के साथ बर्ताव करने पर बल दिया था और उनका यह मानना था कि इन क्षेत्रों में विकास के लिए अभी समय है किन्तु समय बीतने के साथ ही पहले गुट की बात की पुष्टि हुई और दूसरा गुट इस परिणाम पर पहुंचा कि पिछली कमियों की भरपाई के लिए और अधिक मज़बूत इरादों की आवश्यकता है।

वर्तमान समय में देश की सैन्य शक्ति में वृद्धि विशेषकर मीज़ाइल क्षमताओं और क्षेत्र में ईरान की उपस्थिति देश के अधिकारियों की प्राथमिकता का विषय बन गये और आर्थिक सुधार तथा कुछ कमियों के सुधार का मुद्दा एक ओर रख दिया गया।

ईरानी नागरिकों का यह मानना है कि दुश्मनों की प्रतिबंधों की शैली से यद्यपि देश को बहुत अधिक नुक़सान पहुंचता है किन्तु अच्छे प्रबंधन और मेहनत करके उनकी भरपाई की जा सकती है। ईरान के आंतरिक मामलों के जानकार लोगों का मानना है कि देश में एक ओर विदेशी मुद्रा और सोने के भंडारों तथा दूसरी ओर ईरान व दूसरे देशों के बीच होने वाले लेनदेन के स्तर, ट्रम्प प्रशासन की ओर से लगाए गये प्रतिबंधों को विफल तो बनाया जा सकता है। यह लोग परिणाम पर पहुंचे कि पिछले वर्ष अमरीका, यूरोप और दक्षिणपूर्वी एशिया के संकटों सहित वैश्विक संकटों का यदि ईरान के आर्थिक संकट और देश में विदेशी मुद्रा के मूल्य में वृद्धि की तुलना की जाए तो ईरान का आर्थिक संकट नियंत्रण योग्य है।

ईरान की वर्तमान आर्थिक स्थिति, इस प्रकार के संकटों से मुक़ाबले पर ईरान के इतिहास पर नज़र डालने से सिद्ध हो जाता है कि थोड़ा सा सुधार करने के बाद इसको नियंत्रित किया जा सकता है किन्तु इन परिस्थितियों में क्या ट्रम्प की ओर से लगाए जाने वाले प्रतिबंधों का उनके अनुसार परिणाम निकलेगा? साक्ष्यों को देखने के बाद इसका जवाब न में नज़र आया। अमरीका का अनुसरण न करते हुए यूरोप, रूस और चीन का परमाणु समझौते से न निकलना, ईरान के विरुद्ध प्रतिबंधों को फिर से लागू किए जाने के ट्रम्प के फ़ैसले का दुनिया का स्वागत न करना, यह सब चीज़ें इस बात का चिन्ह है कि ईरान के विरुद्ध दुनिया को एकमंच पर लाने में अमरीका बुरी तरह विफल हो गया है।

ईसाई पादरी की गिरफ़्तारी के बहाने ट्रम्प ने तुर्की को निशाने पर लिया, नितिनयाहू, बिन सलमान, और बिन ज़ाएद को बाबुल मंदब स्ट्रेट के लिए ईरान के ख़तरे का बहाना बनाकर गठबंधन के लिए लिए ट्रम्प ने तैयार तो कर लिया किन्तु बाक़ी दुनिया का क्या करेंगे? ट्रम्प यद्यपि विरोधाभासी बयान देते रहते हैं। धमकियों के बीच में ही उन्होंने बिना पूर्व शर्त ईरान से वार्ता की इच्छा भी प्रकट कर दी जो पूर्व नियोजित था और इसके दो महत्वपूर्ण लक्ष्य थे।
पहला यह है कि परमाणु समझौते से ग़ैर क़ानूनी ढंग से निकलने के बाद से ईरान में बाज़ार में आई उथल पुथल को जनता के लिए औचित्य पेश करना चाहते हैं और अपनी छवि को बेहतर ढंग से पेश करके जनता और सरकार के बीच खाई बनाने के प्रयास में हैं।
दूसरा यह कि इन दिनों विदेशमंत्री मुहम्मद जवाद ज़रीफ़ और अमरीकी विदेशमंत्री माइक पोम्पियो के बीच वार्ता की भूमि समतल करने, और संयुक्त राष्ट्र संघ की आगामी बैठक के अवसर पर अपनी और राष्ट्रपति रूहानी की मुलाक़ात के लिए भूमि समतल करने का प्रयास एेसी स्थिति में कर रहे हैं कि ईरान ने इस नशेड़ी व्यापारी से खुलकर कह दिया है वार्ता के लिए वार्ता और प्रतिबंधों की छाया में वार्ता कभी भी स्वीकार्य नहीं है और इसका मतबल यह है कि सोमवार का दिन ट्रम्प के लिए कोई ख़ास नहीं होगा। (AK)