ईरान की ओर से यूरेनियम संवर्घन में वृद्धि की संभावना
https://parstoday.ir/hi/news/iran-i68189-ईरान_की_ओर_से_यूरेनियम_संवर्घन_में_वृद्धि_की_संभावना
मुहम्मद जवाद ज़रीफ़ ने कहा है कि परमाणु समझौते से अमरीका के एकपक्षीय रूप में निकल जाने के संदर्भ में यूरोप के लचीले व्यवहार के परिणाम स्वरूप, ईरान की ओर से यूरेनियम संवर्धन में वृद्धि की संभावना पाई जाती है।
(last modified 2023-04-09T02:55:50+00:00 )
Sep १६, २०१८ १०:४४ Asia/Kolkata

मुहम्मद जवाद ज़रीफ़ ने कहा है कि परमाणु समझौते से अमरीका के एकपक्षीय रूप में निकल जाने के संदर्भ में यूरोप के लचीले व्यवहार के परिणाम स्वरूप, ईरान की ओर से यूरेनियम संवर्धन में वृद्धि की संभावना पाई जाती है।

ईरान के विदेशमंत्री ने जर्मनी पत्रिका श्पेगल के साथ वार्ता में कहा कि यूरोपीय संघ, परमाणु समझौते से अमरीका के निकल जाने की स्थिति में यदि इसी प्रकार से लचीला व्यवहार अपनाए रखेगा तो फिर उसे इस संबन्ध में ईरान की प्रतिक्रिया का सामना करना होगा क्योंकि जेसीपीओए के बारे में यूरोप के साथ वार्ता के लिए अब समय नहीं बचा है।  इसी बीच कमाल ख़र्राज़ी ने कहा है कि यूरोपियों के साथ वार्ता के कई चरण हुए हैं।  उन्होंने कहा कि अब केवल एेसी स्थिति में ही वार्ता आगे बढ़ेगी जब परमाणु समझौते में ईरान के अधिकारों का सम्मान किया जाएगा।

यूरोपीय पक्ष ने मई के महीने में ईरान को एक समर्थन पैकेज देने का प्रस्ताव दिया था।  यह वास्तव में एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव था जिसे अबतक व्यवहारिक हो जाना चाहिए था।  विदेश मंत्री जवाद ज़रीफ़ के अनुसार विशेष बात है कि यूरोप यह काम, ईरान के लिए नहीं बल्कि अपने हितों की पूर्ति तथा दीर्धकालीन आर्थिक हितों को पूरा करने के लिए कर रहा है।  इस बारे में तीन मुख्य बातें विचार योग्य हैं।  पहली बात तो यह है कि एक अन्तर्राष्ट्रीय समझौते के संदर्भ में यूरोप और जेसीपीओए के अन्य सदस्यों की नीति क्या है।  दूसरी बात यह है कि ईरान का परमाणु समझौता पूर्ण रूप में शांतिपूर्ण है।  तीसरी बात यह है कि अमरीका के दबाव के मुक़ाबले में यूरोप की दृढ़ता क्या है।  पहली बात के संदर्भ में यह कहा जा सकता है कि परमाणु समझौते को गैरेंटी देने वाली सुरक्षा परिषद है जिसके प्रति ईरान पूरी तरह से कटिबद्ध है।  दूसरे यह कि अमरीका की ओर से ईरान पर परमाणु शस्त्र तक पहुंच के प्रयास का आरोप पूरी तरह से निराधार है।  तीसरी बात यह है कि क्या यूरोप को अभी भी अमरीकी डिक्टेशन की ज़रूरत है।

यह बात स्पष्ट है कि वर्तमान परिस्थिति में किसी बहुपक्षीय अन्तर्राष्ट्रीय समझौते के बारे में एकपक्षीय नीति नहीं अपनाई जा सकती।  एेसे में यूरोपियों को यह निर्णय लेना होगा कि क्या वे अपनी बात को व्यवहारिक बनाएं या फिर नवंबर से पहले ही स्वयं को ट्रम्प के मुक़ाबले में पराजित मानलेंगे।