क्या अमरीकी प्रतिबंधों से ईरान का निर्यात प्रभावित होगा?
अमरीका ने 5 नवंबर से इस्लामी गणतंत्र ईरान के ख़िलाफ़ दूसरे चरण के प्रतिबंधों को लागू कर देने की घोषणा की है।
वाइट हाउस का कहना है कि इन प्रतिबंधों से वह ईरान की अर्थ व्यवस्था को गंभीर आघात पहुंचाना चाहता है। ट्रम्प सरकार ने अपनी ब्लैक लिस्ट में ईरान की अन्य 700 कंपनियों का नाम शामिल कर लिया है। ट्रम्प ने प्रतिबंधों का पहला पैकेज अगस्त महीने में लागू कर दिया था।
अमरीका ने ईरान पर जो प्रतिबंध लगाए हैं उनसे केवल आठ देशों को सीमित समय के लिए छूट दी है। भविष्य में हो सकता है कि स्विफ़्ट सिस्टम और यूरोपीय कंपनियों को निशाना बनाया जाए जो ईरान के बाज़ार के साथ सहयोग जारी रखना चाहती हैं।
मास्को से प्रकाशित अख़बार कामरसैंट ने लिखा है कि अमरीका चाहता है कि ईरान के तेल निर्यात को शून्य तक पहुंचा दे मगर अमरीका की यह कामना पूरी होने की संभावना बहुत कम है।
ईरान ने अमरीका के इस क़दम पर अपनी आपत्ति दर्ज करा दी है और कहा कि ट्रम्प के इस क़दम का जवाब ज़रूर दिया जाएगा। यूरोपीय देशों ने ईरान से वित्तीय सहयोग के लिए नया मेकैनिज़्म बनाने की घोषणा की है जिससे अन्य देश भी लाभ उठा सकते हैं। ईरान के साथ यूरोप की वह छोटी कंपनियां काम कर सकती हैं जो अमरीकी प्रतिबंधों से खुद को सुरक्षित रखने में सक्षम हैं। यह कंपनियां अपना वित्तीय लेनदेन डालर के बजाए यूरो में करती हैं। इस प्रकार की कंपनियां 1990 के दशक से सक्रिय हैं जो क्यूबा के साथ यूरोप के व्यापार को आगे बढ़ाती हैं।
दूसरी बात यह है कि अमरीका ने जो प्रतिबंध ईरान पर लगाए हैं उनसे ईरान की व्यापारिक गतिविधियां कभी भी उतनी सीमित नहीं हो सकतीं जितनी सुरक्षा परिषद के प्रतिबंधों के कारण सीमित हो गई थीं।
एक बात यह भी है कि अमरीका ने रूस पर भी प्रतिबंध लगाए हैं अतः रूस और ईरान ने अमरीकी प्रतिबंधों से बचने के लिए स्थानीय करेन्सी में व्यापार करने का रास्ता चुना है। दोनों देशों ने 2014 में ही इस संदर्भ में समझौता कर लिया था जिस पर अब नए सिरे से काम हो रहा है।
रूस के ऊर्जा मंत्री एलेग्ज़न्डर नोवाक ने एक साक्षात्कार में इस नए मेकैनिज़्म के बारे में कहा कि तेल के बदले सामान का एक उपाय है इसके अलावा भी दोनों देश अपने सहयोग को विस्तार दे रहे हैं और नया मेकैनिज़्म तैयार कर रहे हैं जिसके तहत वित्तीय लेनदेन का रास्ता आसान हो जाएगा और दोनों देशों का व्यापार भी बढ़ेगा।
अमरीका के लिए सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि वह ईरान के तेल निर्यात को तो ज़ीरो कर देने की कोशिश में है लेकिन ईरान से जो तेल अन्य देशों को सप्लाई होता है उसकी भरपाई का रास्ता अमरीका के पास नहीं है। ऊर्जा क्षेत्र के विशेषज्ञों का कहना है कि तेल का उत्पादन एसा नहीं होता कि एक बटन दबा दिया तो उत्पादन बढ़ जाएगा बल्कि इसके लिए लंबी प्रक्रिया पूरी करनी होती है और उसके बाद भी तेल उत्पादन बढ़ाने में सफलता नहीं मिल पाती। यही कारण था कि जब अमरीका ने ईरान पर प्रतिबंध लगाने की घोषणा की तो तेल की क़ीमत 70 डालर से बढ़ कर 86 डालर प्रति बैरल तक पहुंच गई।
इस्लामी गणतंत्र ईरान के अधिकारियों को विश्वास है कि ईरान के तेल का विकल्प विश्व मंडियों को मिल पाना कठिन है अतः यदि ईरान के तेल निर्यात को सीमित करने की कोशिश की गई तो इसका सीधा असर तेल की क़ीमतों पर पड़ेगा और दुनिया के अनेक देशों की अर्थ व्यवस्थाओं पर दबाव बढ़ेगा। इसलिए यह तो संभव है कि अमरीका के दबाव के कारण ईरान का तेल निर्यात कुछ कम हो जाए लेकिन तेल निर्यात का समाप्त होना तो बहुत कठिन दिखाई देता है।
इस्लामी गणतंत्र ईरान ने कई साल पहले ही तेल की आय पर अपनी निर्भरता कम करने की योजना पर काम शुरू कर दिया था। इसके लिए ईरान ने संसद में क़ानून बना दिया कि तेल की आय का 20 प्रतिशत भाग राष्ट्रीय विकास कोष में डाला जाएगा और हर साल इस बचत में तीन प्रतिशत की वृद्धि की जाएगी। अर्थात यदि पहले साल में 20 प्रतिशत आमदनी इस कोष में जमा की गई तो दूसरे साल 23 प्रतिशत और उसके बाद वाले साल में 26 प्रतिशत आमदनी इस कोष में रखी जाएगा। ईरान इस नीति पर इसलिए अमल कर रहा है कि अपनी अर्थ व्यवस्था को तेल की आमदनी पर निर्भरता से बाहर निकाले। ईरान अपनी इस नीति में बहुत सफल रहा और कामयाबी से आगे बढ़ रहा है।
साभार तसनीम न्यूज़