जेसीपीओए से अमरीका के बाहर निकलने को एक वर्ष पूरा...
ईरान के साथ परमाणु समझौता, अंतरराष्ट्रीय शांति व सुरक्षा के लिए अत्याधिक महत्वपूर्ण समझौता है लेकिन अमरीका 8 मई सन 2018 को इस समझौते से निकल गया।
अमरीका के इस क़दम का, चार धन एक गुट अर्थात, रूस, चीन, जर्मनी, फ्रांस और ब्रिटेन ने भी विरोध किया है। अब एक साल गुज़रने के बाद, अमरीका के इस ग़ैर क़ानूनी क़दम के परिणाम पूरी दुनिया देख रही है। ट्रम्प सरकार की इस गैर कानूनी कार्यवाही से अंतररष्ट्रीय समझौतों की विश्वस्नीयता ही कम नहीं हुई है बल्कि इस से क्षेत्रीय व अंतरराष्ट्रीय शांति पर भी गलत प्रभाव पड़ा है। ट्रम्प सरकार ने बार बार यह बहाना पेश किया है कि ईरान, परमाणु समझौते का पालन नहीं कर रहा है ट्रम्प सरकार ने तो ईरान पर परमाुण हथियारों की प्राप्ति के लिए प्रयास तक का आरोप लगाया है किंतु परमाणु ऊर्जा की अंतरराष्ट्रीय एजेन्सी ने निंरतर इस बात की पुष्टि की है कि ईरान ने परमाणु समझौते का पूर्ण रूप से पालन किया है। आईएईए ने अपनी 14 रिपोर्टों में ट्रम्प के दावे को झूठा कहा है। आईएईए के महानिदेशक यूकिया अमानो ने हालिया दिनों में सुरक्षा परिषद में अपने बयान में ईरान द्वारा जेसीपीओए के पालन की एक बार फिर पुष्टि की और कहा कि सन 2009 से अब तक ईरान की परमाणु गतिविधियों में किसी भी प्रकार का उल्लंघन नज़र नहीं आया है लेकिन एेसा लगता है कि अमरीका को आईएईए की रिपोर्टों से कोई मतलब नहीं है और वह बस इस संदर्भ में इस्राईल के दावों को ही ध्यान योग्य समझता है। दूसरी तरफ ट्रम्प ने ईरान से जो आशाएं लगायी हैं वह जेसीपीओए से बहुत अधिक हैं। अमरीकी विदेशमंत्री ने मई 2018 में ईरान के सामने 12 शर्तें पेश की जिनके पालन करने का मतलब यह है कि ईरान, पूरी तरह से अमरीका के सामने झुक जाए तो असंभव है। जेसीपीओए से अमरीका के निकलने के एक साल पूरे होने पर ईरान ने भी घोषणा की है कि वह जेसीपीओए के दायरे में कुछ वचनों के पालन का सिलसिला रोक रहा है। वास्तव में ईरान के बारे में अमरीका की नीति, केवल धमकी, ज़ोर ज़बरदस्ती पर आधारित है लेकिन अमरीका की इस प्रकार की नीति के सामने ईरान 40 वर्षों से डटा हुआ है और अब तक की अमरीका की हर साज़िश को नाकाम बनाया है। इसके साथ ही ईरान ने अब तक यह भी साबित किया है कि वह ट्रम्प सरकार के षडयंत्रों का मुक़ाबला करने की पूरी क्षमता रखता है। (Q.A.)