क्या सच में ईरान को हथियार ख़रीदने की ज़रूरत है?
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आईएईए में ईरान के ख़िलाफ़ प्रस्ताव, मानवाधिकार के हनन के लिए राष्ट्र संघ की मानवाधिकार परिषद की ओर से ईरान की आलोचना, सऊदी अरब के तेल रिफ़ाइनरी पर हमले में ईरान का हाथ होने का राष्ट्र संघ का दावा और ईरान के बारे में यूरोपीय तिकड़ी का बयान, क्या इन सबका एक ही समय में सामने आना संयोग है?
(last modified 2023-04-09T02:55:50+00:00 )
Jun २९, २०२० ०७:५६ Asia/Kolkata
  • क्या सच में ईरान को हथियार ख़रीदने की ज़रूरत है?

आईएईए में ईरान के ख़िलाफ़ प्रस्ताव, मानवाधिकार के हनन के लिए राष्ट्र संघ की मानवाधिकार परिषद की ओर से ईरान की आलोचना, सऊदी अरब के तेल रिफ़ाइनरी पर हमले में ईरान का हाथ होने का राष्ट्र संघ का दावा और ईरान के बारे में यूरोपीय तिकड़ी का बयान, क्या इन सबका एक ही समय में सामने आना संयोग है?

इन संगठनों और यूरोपीय ट्राॅयका के क़दमों के कारणों की समीक्षा करने से पहले इस अत्यंत अहम बात की तरफ़ इशारा करना ज़रूरी है ईरान के ख़िलाफ़ कुछ अत्याचारपूर्ण प्रतिबंधों के पीछे, जो बारह साल से ज़्यादा समय तक जारी रहने के बाद सन 2015 में परमाणु समझौते पर हस्ताक्षर के समय समाप्त हुए, आईएईए का हाथ था। अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी ने सन 2003 में घोषणा की थी कि उसे ईरान के एक परमाणु प्रतिष्ठान में एक मशीन संवर्धित यूरेनियम से दूषित मिली है जिससे यह शक पैदा होता है कि ईरान का परमाणु कार्यक्रम सैनिक आयाम की तरफ़ बढ़ रहा है।

 

क्या आप जानते हैं कि परमाणु समझौते के बाद आईएईए ने इस बारे में क्या कहा था? उसने कहा था कि उससे समीक्षा में ग़लती हुई थी और उसका शक सही नहीं था बल्कि यह ग़लत फ़हमी थी। दूसरे शब्दों में आईएईए ने उसके कारण लगाए गए अत्याचारपूर्ण प्रतिबंधों की वजह से दस साल से अधिक समय तक ईरानी राष्ट्र द्वारा झेली गई कठिनाइयों का औचित्य पेश करने की कोशिश की थी। यह इन संस्थाओं के पक्षपातपूर्ण रुख़ और तकनीकी मामलों के राजनीतिकरण की बस एक झलक है। इस आधार पर कुछ टीकाकार इन संस्थाओं को, बड़ी शक्तियों के हितों को पूरा करने का साधन बताते हैं और उनका कहना ग़लत नहीं है क्योंकि वे सच्चाई बयान करते हैं और कुछ ने तो इसके ठोस सुबूत भी दिए हैं।

 

अब अमरीका के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प ने ईरान पर हथियारों की ख़रीदारी व बिक्री पर प्रतिबंध संबंधी धारा की समय सीमा बढ़ाने की कोशिश शुरू कर दी है। यह प्रतिबंध अक्तूबर में समाप्त होने वाले हैं। हैरत की बात यह है कि यूरोपीय ट्राॅयका ने भी इस बारे में ट्रम्प का साथ दिया है। शायद इसकी वजह यह हो कि ट्रम्प ने उन्हें यह वचन दिया हो कि अगर ईरान के ख़िलाफ़ इस प्रतिबंध की समय सीमा बढ़ा दी जाए तो अमरीका, परमाणु समझौते में वापस लौट आएगा। अब सवाल यह पैदा होता है कि ईरान क्यों इस प्रतिबंध की समय सीमा बढ़ाए जाने का विरोध कर रह है जबकि वह हर कुछ समय बाद नए हथियारों का अनावरण कर रहा है?

 

ईरान, हमलावरों को केवल धमकी नहीं देता बल्कि उसने इराक़ में अमरीका की ऐनुल असद छावनी पर मीज़ाइलों की बारिश करके न सिर्फ़ जनरल क़ासिम सुलैमानी की शहादत का बदला लिया बल्कि अमरीका के ग्लोबल हाॅक ड्रोन को मार कर यह भी सिद्ध कर दिया कि वह अपनी सीमाओं का उल्लंघन करने वाले किसी भी देश को बख़्शेगा नहीं। सीरिया के दैरुज़्ज़ूर में दाइश के और इराक़ी कुर्दिस्तान में पेजाक गुट के ठिकानों पर मीज़ाइल हमले भी हमलावरों को ईरान के ठोस जवाब के नमूने हैं।

 

जिसके पास भी सैन्य क्षेत्र का थोड़ा सा भी अनुभव होगा उसे पता होगा कि कोई भी देश सैकड़ों मील दूर ठिकानों को तब तक निशाना नहीं बना सकता जब तक उसके पास इसकी विकसित तकनीक न हो। ईरान ने न केवल मीज़ाइलों की तैयारी की उच्च तकनीक हासिल कर ली है बल्कि वह अंतरिक्ष के क्षेत्र में भी काफ़ी तरक़्क़ी कर चुका है और उसने अंतरिक्ष में अपना उपग्रह भी भेज दिया है। विभिन्न तरह के विकसित ड्रोनों की तैयारी और पनडुब्बियों, युद्धक नौकाओं और डिस्ट्रायरों की तैयारी में भी ईरान बहुत सफल रहा है। तो फिर उसे अपने ख़िलाफ़ हथियारों की ख़रीदारी के प्रतिबंध को समाप्त करवाने की क्या ज़रूरत है?

 

इस सवाल के जवाब में कुछ बातें अहम प्रतीत होती हैंः एक तो यही कि प्रतिबंधों की समय सीमा बढ़ाना अंतर्राष्ट्रीय क़ानूनों और परमाणु समझौते के ख़िलाफ़ है और ईरान कभी भी विश्व समुदाय में इस प्रकार की विध्वंसक प्रथा के चलन की अनुमति नहीं देगा। अगर वह इस मामले की अनदेखी कर दे तो ट्रम्प अपनी औक़ात से आगे बढ़ कर दूसरे मामलों में भी टांग अड़ाने लगेंगे।

दूसरे यह कि ईरान चाहता है कि विश्व समुदाय में उसकी स्थिति भी अन्य देशों की तरह हो और कोई भी अंतर्राष्ट्रीय प्रस्ताव अन्य देशों के साथ उसके सहयोग में रुकावट न डाले चाहे उसे हथियारों की ज़रूरत हो या न हो। दूसरे शब्दों में प्रतिबंधों के जारी रहने का अर्थ यह है कि विश्व समुदाय में ईरान की स्थिति सामान्य नहीं है।

तीसरे यह कि ईरान के ख़िलाफ़ प्रतिबंध सिर्फ़ हथियारों की ख़रीदारी तक सीमित नहीं है बल्कि ईरान की ओर से हथियारों व सैन्य उपकरणों की बिक्री पर भी प्रतिबंध है जबकि ईरान को हथियारों की मंडी में अपना भाग हासिल करने की ज़रूरत है। दूसरी ओर ईरान से हथियार और सैन्य उपकरण व तकनीक ख़रीदने की काफ़ी मांग है क्योंकि ईरान ने अनेक अवसरों पर अपनी क्षमता का लोहा मनवाया है।

चौथे यह कि ईरान को हथियार ख़रीदने की ज़रूरत नहीं है लेकिन उसके लिए अन्य देशों विशेष कर अपने दोस्तों के साथ सैन्य तकनीकों व सैन्य उद्योगों के विकास के लिए सहयोग और विचार-विमर्श करना ज़रूरी है। (HN)