ईरान चीन स्ट्रैटेजिक समझौते से क्यों सहमा हुआ है इस्राईल?
अगर हमें ईरान और चीन के बीच होने वाले 25 वर्षीय स्टैटेजिक समझौते के महत्व को समझना है जिसकी कुछ जानकारियां न्यूयार्क टाइम्ज़ ने प्रकाशित की हैं तो हमें इस्राईल की आक्रोश से भरी प्रतिक्रिया पर एक नज़र डाल लेनी चाहिए।
इस्राईल के सामरिक विशेषज्ञ अमीर यार शालोम ने कहा कि यह नए मध्यपूर्व की दिशा में उठने वाला क़दम है और इससे ईरान के ख़िलाफ़ अमरीका की नाकाबंदी ध्वस्त हो गई है।
इस समझौते के तहत जो बग़ैर किसी शोर शराबे के अंजाम पा गया है चीन ईरान में 400 अरब डालर का निवेश करेगा और इसके बदले में चीन को पच्चीस साल तक ईरान से किफ़ायती दामों पर तेल मिलता रहेगा।
ईरान के विदेश मंत्री जवाद ज़रीफ़ ने समझौते के बारे में कुछ बेबुनियाद अटकलों को ख़ारिज करते हुए कहा कि इस समझौते के तहत चीन को ईरान के कीश द्वीप में सैनिक छावनी देने की बात निराधार है।
यह समझौता वाक़ई चीन और ईरान दोनों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। ईरान को अमरीकी प्रतिबंधों से पूरी तरह आज़ादी मिल जाएगी और चीन ख़ुद को भी अमरीकी नाकाबंदी की कोशिशों से बहुत ऊपर पहुंचा देगा।
इस समझौते की महत्वपूर्ण बातों में इंटेलीजेन्स जानकारियां और सैटेलाइट चित्रों का लेनदेन भी शामिल है जबकि चीनी कंपनी हुआवी के लिए भी ईरान का बाज़ार खुल जाएगा।
इस समझौते से इस्राईल इसलिए तिलमिलाया हुआ है कि अमरीका के साथ मिलकर उसने ईरान के ख़िलाफ़ जो सपने देखे थे वह रेत की दीवार बन गए।
यह समझौता अमरीका की दुशमनी और व्यापारिक युद्ध का चीन की ओर से ज़ोरदार जवाब भी है। इससे ईरान की अर्थ व्यवस्था के स्तंभ और भी मज़बूत होंगे और ईरान के भीतर उत्पादन को बढ़ावा मिलेगा।
स्रोतः रायुल यौम
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