रग़ाएब की रात को "इच्छाओं की रात" क्यों कहा जाता है?
इस्लामी परंपरा में मान्यता है कि रजब महीने के पहले गुरुवार की रात को एलाही दया के द्वार खुल जाते हैं और ईश्वर विशेष रूप से उदारता दिखाते हुए विश्वासियों की प्रार्थनाओं व इच्छाओं को क्षमा और स्वीकार करता है।
अरबी शब्द "रग़ाएब" का अर्थ "मूल्यवान और वांछित चीजें" है और इसीलिए इस रात का अनुवाद "इच्छाओं की रात" किया गया है। कुछ हदीसों में इस रात की इबादत को बड़े पुण्य और मनोकामनाओं की पूर्ति से जोड़ा गया है।
हालांकि यह उल्लेख करना आवश्यक है कि इस अवसर की ऐतिहासिक और हदीस-आधारित उत्पत्ति इस्लामी विद्वानों के बीच चर्चा का विषय है और कुछ इसे कमजोर मानते हैं।
इस रात को अत्यधिक पुण्य और महत्व का वर्णन किया गया है।
गुरुवार के दिन उपवास रखना और रात में विशेष नमाज पढ़ना जैसे विशेष कार्यों का उल्लेख किया गया है।
इस रात की नमाज़ के लिए पापों की क्षमा और सिफारिश जैसे कई सवाब बताए गए हैं।
हदीस के विद्वानों द्वारा "लैलतुल रग़ाइब" से संबंधित परंपराओं की व्यापक रूप से समीक्षा की गई है। कई प्रतिष्ठित विद्वानों का मानना है कि इस रात के विशिष्ट अनुष्ठानों और इसकी विशेष महिमा का वर्णन करने वाली हदीसें कमजोर निर्मित हैं। इसलिए जबकि कुछ मुस्लिम समुदाय इन प्रथाओं का पालन करते हैं, अन्य नहीं करते हैं। अधिक जानकारी के लिए किसी विश्वसनीय इस्लामी विद्वान या आधिकारिक धार्मिक मार्गदर्शन से परामर्श करना सबसे अच्छा है।
"लैलतुल रग़ाइब" अरबी महीने रजब के पहले गुरुवार की रात को कहा जाता है। कुछ इस्लामी परंपराओं के अनुसार यह एक बहुत पवित्र रात मानी जाती है और इस रात में अल्लाह की विशेष कृपा व क्षमा प्राप्त होती है।
मुख्य आमालः इस रात से पहले यानी रजब के पहले गुरुवार के दिन उपवास रखना अत्यधिक पुण्यकारी माना जाता है।
विशेष नमाज़: मगरिब और इशा की नमाज़ के बीच 12 रकात विशेष नमाज़ पढ़ने का विधान है। इस नमाज़ में सूरतुल कद्र और सूरतुल इख़लास को अधिक बार पढ़ा जाता है।
ज़िक्र व दुआ: नमाज़ के बाद अल्लाह की प्रशंसा, दरूद और क्षमा की दुआएं माँगी जाती हैं। ऐसी मान्यता है कि इससे पाप मिटते हैं और मनोकामनाएं पूरी होती हैं।
हालांकि कई मुस्लिम समुदाय इस रात को बहुत महत्व देते हैं और उपरोक्त इबादतें करते हैं परंतु इस विषय पर इस्लामी विद्वानों में मतभेद है।
एक पक्ष के अनुसार यह एक ऐसी पुण्यमय रात है जिसमें अतिरिक्त इबादत व रोज़े से अल्लाह की विशेष दया प्राप्त होती है।
आलोचनात्मक दृष्टिकोण: दूसरे पक्ष के कई प्रमुख हदीस विद्वानों का मानना है कि इस रात के विशेष नमाज़ व इबादतों का उल्लेख करने वाली हदीसें ऐतिहासिक रूप से कमज़ोर या गढ़ी श्रेणी में आती हैं। इसलिए वे इन्हें एक मज़बूत धार्मिक प्रमाण के रूप में नहीं मानते।
अगर कोई इस रात में अतिरिक्त इबादत, रोज़ा रखता या दुआ करता है तो उसका इरादा केवल अल्लाह की रज़ा और नज़दीकी प्राप्त करने का होना चाहिए न कि किसी विवादित प्रथा को बढ़ावा देने का।
सबसे महत्वपूर्ण यह है कि ऐसे किसी भी अतिरिक्त कृत्य को इस्लाम के मूलभूत और सर्वसम्मत फर्ज़ जैसे पाँच वक्त की नमाज़ से ऊपर नहीं समझना चाहिए।
इस मामले में गहन ज्ञान के लिए किसी विश्वसनीय और जानकार इस्लामी विद्वान से सलाह लेना हमेशा उत्तम रहता है।
हालाँकि यह जानकारी "मफातीहुल जिनान" जैसी किताबों में पाई जाती है और कुछ मुस्लिम समुदायों में इस पर अमल किया जाता है लेकिन इस विषय पर इस्लामी विद्वानों के बीच गहरा मतभेद है।
अहले हदीस के अधिकांश प्रमुख विद्वान और कई शिया मुहद्दिसीन का मानना है कि "लैलतुर रग़ाइब" की नमाज़ और उसके विशिष्ट सवाबों का उल्लेख करने वाली हदीसें "ज़ईफ़" या बिना किसी मज़बूत आधार के हैं। उनका तर्क है कि इतनी बड़ी पुण्यकारी घटना के लिए बेहद मज़बूत और प्रमाणित हदीसें होनी चाहिए जो इस मामले में मौजूद नहीं हैं।
वैकल्पिक दृष्टिकोण: कुछ विद्वान, हालाँकि साख की कमी को स्वीकार करते हुए इसे एक सामान्य नेक कर्म के रूप में, बिना इसके विशेष होने के दावे के, करने की इजाज़त देते हैं।
प्राथमिकता दें: अपनी इबादत का ज़्यादातर समय और ऊर्जा उन स्पष्ट और सिद्ध फर्ज़ एवं सुन्नत पर केंद्रित रखें जिनके बारे में कोई मतभेद नहीं है, जैसे पाँचों वक्त की नमाज़, रमज़ान के रोज़े, तहज्जुद की नमाज़, कुरआन तिलावत और सामान्य ज़िक्र-ओ-दुआ।
नियत साफ रखें: यदि आप रजब के इस पहले गुरुवार को कोई अतिरिक्त इबादत करते हैं (जैसे रोज़ा रखना या रात में नफ्ल नमाज़ पढ़ना), तो आपकी नियत सिर्फ़ अल्लाह की रज़ा और उसकी कृपा पाने की होनी चाहिए। इसे किसी विशेष रात के तौर पर मनाने या उसके लिए बताए गए विशिष्ट पुण्यों के पक्के यकीन के साथ न करें।
ज्ञानी लोगों से पूछें: किसी भी भ्रम की स्थिति में, किसी विश्वसनीय और जानकार इस्लामी विद्वान से इस मामले में विस्तृत मार्गदर्शन लेना सबसे बेहतर है।
एक सच्चे मुसलमान के लिए यही उचित है कि वह स्पष्ट और निर्विवाद धार्मिक मार्गदर्शन पर टिका रहे और विवादित मामलों में सतर्कता व संतुलन बरतें। MM