ईदे मअबसः मानव जीवन में एक निर्णायक मोड़
https://parstoday.ir/hi/news/religion-i142422-ईदे_मअबसः_मानव_जीवन_में_एक_निर्णायक_मोड़
पार्स टुडे- इस्लाम के पैग़म्बर की घोषणा यानी नबूवत की आधिकारिक शुरुआत को इतिहास का एक निर्णायक मोड़ कहा जा सकता है। ऐसा घटनाक्रम जिसने तिलावत, तज़किया, शिक्षा और हिकमत पर आधारित होकर मानव की वैचारिक और सामाजिक संरचनाओं को बदल दिया।
(last modified 2026-01-19T11:13:52+00:00 )
Jan १९, २०२६ १६:४१ Asia/Kolkata
  • मदीना में मस्जिदे-नबी
    मदीना में मस्जिदे-नबी

पार्स टुडे- इस्लाम के पैग़म्बर की घोषणा यानी नबूवत की आधिकारिक शुरुआत को इतिहास का एक निर्णायक मोड़ कहा जा सकता है। ऐसा घटनाक्रम जिसने तिलावत, तज़किया, शिक्षा और हिकमत पर आधारित होकर मानव की वैचारिक और सामाजिक संरचनाओं को बदल दिया।

हिजरी क़मरी कैलेंडर में 27 रजब को इस्लाम के पैग़म्बर, हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा (स) की ईदे मअबस की वर्षगांठ दर्ज है। वह दिन जिसे विश्व इतिहास के चिंतकों के अनुसार मानव की आध्यात्मिक और सामाजिक इतिहास में एक नए अध्याय की शुरुआत माना जाता है। यह घटना न केवल पैग़म्बरे इस्लाम के संदेश-कार्य की शुरुआत है बल्कि मानव समाजों के बौद्धिक, नैतिक और सामाजिक परिवर्तन में भी एक महत्वपूर्ण मोड़ है।

 

मबअस के चार मूल उद्देश्य

 

क़ुरआन मजीद के सूरे आले-इमरान की आयत 164 में पैग़म्बरे इस्लाम की मबअस के चार मुख्य उद्देश्य बताए गए हैं:

“निस्संदेह अल्लाह ने मोमिनों पर बड़ा उपकार किया कि उनके बीच उन्हीं में से एक रसूल भेजा जो उन्हें उसकी आयतें पढ़कर सुनाता है उन्हें पाक करता है, उन्हें किताब और हिकमत सिखाता है; जबकि वे इससे पहले स्पष्ट गुमराही में थे।”

 

ईश्वरीय आयतों की तिलावत, नैतिक शुद्धि व आत्म-परिष्कार, किताब और ज्ञान की शिक्षा तथा हिकमत का प्रशिक्षण ये चारों मिलकर पैग़म्बर के मिशन का स्पष्ट ढांचा प्रस्तुत करते हैं ऐसा मिशन जिसका लक्ष्य मानव को गुमराही से निकालकर ज्ञान, विकास और इस दुनिया व परलोक की सफलता की ओर मार्गदर्शन करना है। ये चार उद्देश्य मानव जीवन में अनेक परिवर्तन लाते हैं। नीचे इनके कुछ उदाहरण दिए गए हैं:

 

1. व्यक्तिगत और सामाजिक मूल्यों का पुनर्जीवन

 

पैग़म्बरे इस्लाम की माबअसत ऐसे दौर में हुई जब अरब समाज कठोर जहिलीयत अज्ञानता की संरचनाओं में फंसा हुआ था; सब्र, क्षमा, उदारता और लज्जा जैसे गुण फीके पड़ चुके थे और क़बीलाई पक्षपात की छाया में मानवीय मूल्य भुला दिए गए थे। पैग़म्बर ने वह़्य की शिक्षाओं के सहारे इन मूल्यों को पुनर्जीवित किया और स्वतंत्रता, सामाजिक न्याय और मानवीय गरिमा जैसी अवधारणाओं को समाज में स्थापित किया जो आगे चलकर इस्लामी सभ्यता के स्तंभ बने।

 

2. अंधकार से मुक्ति

 

इमाम अली (अ), पैग़म्बरे इस्लाम के उत्तराधिकारी, नहजुल-बलाग़ा के ख़ुत्बा 89 में मबअस से पहले की सामाजिक और वैचारिक स्थिति का सटीक चित्रण करते हैं:

“अल्लाह ने मुहम्मद को ऐसे समय भेजा जब रसूलों का सिलसिला थमा हुआ था, लोग लंबी नींद में पड़े थे, फ़ित्ने भड़क चुके थे, कामकाज बिखर गया था, युद्धों की आग भड़क रही थी और दुनिया की रौशनी बुझ चुकी थी धोखे और छल का बोलबाला था जीवन-वृक्ष की पत्तियाँ पीली पड़ चुकी थीं और उसके फल की आशा टूट चुकी थी।

 

उनके अनुसार वह दौर ऐसा था जब कोई पैग़म्बर नहीं आया था, फ़ित्ने फैल चुके थे, युद्ध भड़क रहे थे और लोग लंबी नींद में डूबे थे। ऐसे वातावरण में पैग़म्बरे इस्लाम की माबअसत एक ऐसे नूर के समान थी जिसने अज्ञान, हिंसा और अन्याय के अंधकार को चीर दिया और मानवता के सामने एक नया मार्ग खोल दिया।

 

3. बुद्धि और चिंतन का जागरण

 

पैग़म्बरों के मूल उद्देश्यों में से एक मनुष्यों में चिंतन-शक्ति को जगाना है। अमीरुल-मोमिनीन (अ) नहजुल-बलाग़ा में ज़ोर देते हैं कि पैग़म्बर इसलिए आए कि मानव के भीतर छिपे बुद्धि के ख़ज़ानों को सक्रिय करें। इसी कारण पैग़म्बरे इस्लाम की माबअसत जिसका ज़ोर पढ़ने, हिकमत प्राप्त करने और आत्म-शुद्धि के माध्यम से ज्ञान-विस्तार पर है, को इस बौद्धिक जागरण की शुरुआत माना जाता है।

 

4. शांति और सुकून की स्थापना

 

सुरक्षा और शांति हर मानव समाज की बुनियादी ज़रूरत हैं और वास्तव में शांति के बिना विकास संभव नहीं। पैग़म्बरे इस्लाम ने दया और सहनशीलता का आदर्श प्रस्तुत कर मुसलमानों को शांति का मार्ग दिखाया। इस दृष्टिकोण का ऐतिहासिक उदाहरण मक्का की विजय का दिन है जब कुछ साथियों ने नारा लगाया आज बदले का दिन है तो पैग़म्बर ने दृढ़ता से कहा आज दया का दिन है। जिस समय मक्का के लोग प्रतिशोध की आशंका कर रहे थे, पैग़म्बर ने न केवल दंड से दरगुज़र किया बल्कि इस दिन को रहमत का दिन घोषित किया और यही रवैया आगे चलकर मक्का के लोगों के व्यापक रूप से इस्लाम की ओर झुकाव का कारण बना। MM