11 रमज़ानः रमज़ान महीने में सबसे बेहतरीन अमल क्या है?
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इस सवाल का जवाब पैग़म्बरे इस्लाम स. ने क्या दिया है?
(last modified 2023-04-09T06:25:50+00:00 )
Apr १३, २०२२ १४:४८ Asia/Kolkata
  • 11 रमज़ानः रमज़ान महीने में सबसे बेहतरीन अमल क्या है?

इस सवाल का जवाब पैग़म्बरे इस्लाम स. ने क्या दिया है?

11वीं रमज़ान की दुआ और उसका अनुवाद सुनते हैं... अनुवादः प्रभुवर! आज के दिन भलाई को मेरे लिए प्रिय और पाप एवं अवज्ञा को अप्रिय बना दे और इस दिन अपनी सहायता से अपने क्रोध और नरक को मेरे लिए वर्जित कर दे, हे सहायता चाहने वालों के सहायक। 

 

दोस्तो पवित्र रमज़ान महीने के 10 दिन गुज़र गये। आज रमज़ान महीने की 11वीं तारीख़ है। 10 दिनों से अधिक का समय बीत रहा है जबसे हम ईश्वरीय नेअमतों से लाभ उठा कर अपनी आत्माओं को तृप्त कर रहे हैं। कहीं ऐसा न हो कि हम समुद्र की मछलियों की तरह हो जायें यानी जिस तरह से समुद्र की मछलियां पानी के महत्व को नहीं समझतीं उसी तरह हम भी रमज़ान महीने के मूल्यवान क्षणों की कीमत न समझें। रमज़ान का पवित्र महीना उस शीतल जल की भांति है जो समुद्र की मछलियों की भांति हमें घेरे हुए है और हम उसके अंदर हैं और इतना हमारे निकट है कि हम उसकी निकटता का आभास तक नहीं कर रहे हैं।

ऐसा बहुत होता है कि जब कोई नेअमत बहुत अधिक होती है या बहुत करीब होती है तो आम तौर पर लोग उसकी क़ीमत नहीं समझते हैं। जैसे हवा और उसमें मौजूद ऑक्सीजन। सूरज की रोशनी और पानी आदि। ये वह चीज़ें हैं जिनकी कीमत व महत्व के बारे में आम तौर पर कोई नहीं सोचता। इसी प्रकार जब इंसान का स्वास्थ्य बिल्कुल ठीक होता है तो वह कभी भी बीमारियों और बीमारियों से होने वाली तकलीफों के बारे में नहीं सोचता है। मगर जब इंसान बीमार हो जाता है और बीमारी के कारण उसे बहुत सारी समस्याओं का सामना करना पड़ता है तब इंसान की समझ में आता है कि स्वास्थ्य कितनी बड़ी नेअमत है। कहीं ऐसा न हो कि रमज़ान का पवित्र महीना और उसके मूल्यवान क्षण चले जायें और हम उनसे लाभ न उठा पायें।

पवित्र रमज़ान महीने के दो रूप हैं एक विदित दूसरे नीहित। रमज़ान महीने का ज़ाहिर यह है कि वह 29 या 30 दिन का होता है और उसमें लोग नमाज़ पढ़ते हैं, रोज़े रखते और दुआयें आदि करते हैं परंतु रमज़ान महीने का एक बातिन व नीहित है और वह एक अलग दुनिया है। रमज़ान वह महीना है जो हज़ार महीनों से बेहतर है। यह वह महीना है जिसमें महान ईश्वर ने कुरआन नाज़िल किया है। यह इबादत और पवित्र कुरआन की तिलावत का महीना है। हर चीज़ की एक बहार होती है और कुरआन की तिलावत की बहार रमज़ान का पवित्र महीना है।

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पवित्र रमज़ान, महान ईश्वर से बात करने का महीना है। वैसे इंसान हर समय अपने पालनहार से बात कर सकता है परंतु रमज़ान महीने की बात ही कुछ और है। रमज़ान का पवित्र महीना आत्म निर्माण का महीना है। यह दिलों को गुनाहों से पवित्र करने और बनाने का महीना है। यह वह महीना है जिसमें इंसान अपने पालनहार को अधिक याद करता और उसका सामाप्ति प्राप्त करने का प्रयास करता है। यह वह महीना है जिसमें रोज़ेदार इंसान की हर सांस तसबीह समझी जाती है। यह वह महीना है जिसमें इंसान अपने दिल को दुनिया की मोहमाया से दूर करता है।

यहां एक बिन्दु का उल्लेख ज़रूरी है और वह यह है कि आत्म निर्माण और गुनाहों से दूरी आदि कोई सरल कार्य नहीं हैं। हर इंसान न तो गुनाहों से दूरी कर सकता है और न ही अपने दिल से दुनिया की मोहमाया निकाल सकता है किन्तु रमज़ान के पवित्र महीने में एक राज़ है और अगर इंसान उस राज़ को समझ जाये तो गुनाह जैसे कार्यों से दूरी करने में मदद मिलेगी और वह राज़ पवित्र कुरआन को नाज़िल करने के लिए इस महीने का चयन है। आखिर कोई रहस्य अवश्य है जिसकी वजह से महान ईश्वर ने पवित्र कुरआन को रमज़ान के महीने में नाज़िल किया। महान ईश्वर पवित्र कुरआन के सूरे बक़रा की आयत नंबर 129 और 151 और सूरे आले इमरान की आयत नंबर 164 और इसी प्रकार सूरे जुमा की दूसरी आयत में कहता है कि हमने पैग़म्बरों को भेजा है ताकि वे लोगों पर हमारी आयतों की तिलावत करें, उनका आत्म निर्माण करें और उसके बाद उन्हें हिकमत और किताब की शिक्षा दें। यहां एक ध्यान योग्य बिन्दु यह है कि कुरआन के नाज़िल होने, उसकी आयतों की लोगों पर तिलावत करने और लोगों को हिकमत व किताब की शिक्षा देने में संबंध अवश्य है।

रमज़ान के पवित्र महीने को कुरआन की बहार का नाम दिया गया है। इस महीने में बहुत से लोग पवित्र कुरआन की तिलावत को बहुत महत्व देते हैं जो अच्छी बात है परंतु जितना अधिक उसकी तिलावत पर बल दिया जाता है  परंतु उसका दसवां हिस्सा भी उसके अर्थों को समझने और उसमें चिंतन- मनन पर ध्यान नहीं दिया जाता है। अगर मुसलमान पवित्र कुरआन की आयतों में ग़ौर फिक्र करें तो उनके मध्य बहुत से मतभेद स्वतः समाप्त हो जायेंगे।

रोचक बात है कि पवित्र कुरआन में कुरआन की तिलावत करने से अधिक उसकी आयतों में चिंतन- मनन के लिए कहा गया है। महान ईश्वर ने पवित्र कुरआन में कहा है कि जिसने अपने को पाक कर लिया वह कामयाब हो गया। महान ईश्वर कभी भी अपने वादे की खिलाफर्ज़ी नहीं करेगा। यह केवल महान ईश्वर है जो हमारे गुनाहों को माफ कर सकता है। रमज़ान का पवित्र महीना ईश्वरीय रहमतों व नेअमतों के नाज़िल होने का महीना है। यह आत्मशुद्धि का महीना है, रमज़ान, अध्यात्मिक व नैतिक दृष्टि से खुद को सजाने- संवारने का महीना है। गुनाह वह चीज़ है जो दीमक की भांति इंसान की मूल प्रवृत्ति को खराब कर देता है पर महान ईश्वर ने समस्त इंसानों के लिए तौबा का दरवाज़ा खोल रखा है। जो इंसान सच्चे दिल से तौबा करता है वह उस इंसान की भांति हो जाता है जो अभी अपनी मां के पेट से पैदा हुआ हो।

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महान ईश्वर ने रमज़ान महीने में कुरआन नाज़िल करके हमें दे दिया यह खुद बहुत बड़ी नेअमत है। यह बिल्कुल ऐसा ही है जैसे महान ईश्वर ने हिदायत का चेराग़ हमारे हाथ में दे दिया। यहां एक बिन्दु को बयान करना ज़रूरी है और वह है कि कोई यह न सोचे कि अगर उसने रमज़ान महीने का रोज़ा रख लिया, कुरआन की तिलावत कर लिया और रमज़ान महीने में रोज़े रख लिया तो आत्मशुद्धि हो गयी बल्कि उसे प्रार्थना चाहिये कि महान ईश्वर उसके नेक कार्यों को कबूल करे और उसे अपनी असीम कृपा व दया का पात्र बनाये। किसी भी इंसान को अपनी इबादतों और नेकियों पर कभी भी घमंड व नाज़ नहीं करना चाहिये।

दोस्तो कार्यक्रम के इस भाग में हम रोज़ेदार इंसान की नीयत के बारे में चर्चा रहे हैं। आशा है कि कार्यक्रम के इस भाग पर भी आप ध्यान देंगे। इंसान जिस तरह से नमाज़ पढ़ने के लिए पहले नीयत करता है उसी तरह रोज़ा रखने से पहले रोज़े की नीयत करनी पड़ती है। यानी इंसान नीयत करे कि महान ईश्वर की प्रसन्नता के लिए रोज़ा रख रहा है और उन चीज़ों से परहेज़ करेगा जिनसे रोज़ा बातिल हो जाता है। अगर इंसान दिल में यह नीयत कर ले तो काफी है ज़बान से अदा करने की कोई ज़रूरत नहीं है। इंसान हर रात अगले दिन के रोज़े की नीयत कर सकता है परंतु अगर इंसान पूरे महीने के रोज़े की नीयत एक ही बार कर ले तो अधिक बेहतर है। अगर कोई व्यक्ति दिन को रोज़े की नीयत करे तो उसका रोज़ा बातिल है यानी उसका रोज़ा ही नहीं है परंतु उस व्यक्ति को चाहिये कि पूरे दिन उन चीज़ों से परहेज़ करे जिनसे रोज़ा बातिल हो जाता है और रमज़ान महीने के बीत जाने के बाद उसकी कज़ा करे।

इसी तरह अगर किसी व्यक्ति पर रोज़े की कज़ा वाजिब है और वह कज़ा रमज़ान महीने के वाजिब रोज़े की न हो जैसे कफ्फारे के रोज़े और इंसान ने दोपहर के निकट तक रोज़े की नीयत नहीं की है और इस दौरान उसने किसी एसी चीज़ का इस्तेमाल भी नहीं किया है जिससे रोज़ा टूटता है तो वह रोज़े की नीयत कर सकता है और उसका रोज़ा सही है। अगर कोई व्यक्ति बीमार हो और वह रोज़ा नहीं रख सकता तो कोई बात नहीं है। हां अगर वह रमज़ान महीने के मध्य में बीमारी से ठीक हो जाये तो उसके लिए रोज़ा रखना और रोज़े की नीयत करना अनिवार्य नहीं है परंतु अगर दोपहर से पहले हो और वह कोई चीज़ एसी अंजाम भी न दिया हो जिससे रोज़ा टूट जाता है तो एहतियाते वाजिब यह है कि उस दिन रोज़े की नीयत करे और रोज़ा रखे और रमज़ान का महीना बीत जाने के बाद उसकी कज़ा भी करे।

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एक दिन एक व्यक्ति पैग़म्बरे इस्लाम की सेवा में आया और उसने पूछा हे ईश्वरीय दूत! क्या ईश्वर हमसे समीप है और हम उससे धीरे धीर प्रार्थना कर सकते हैं? या वह दूर है और उसे ऊंची आवाज़ में बुलाना चाहिये? पैग़म्बरे इस्लाम ने अभी ज़बान भी नहीं खोली थी कि हज़रत जीब्रईल आयत लेकर उतरे और समस्त कालों में महान ईश्वर की उपासना करने वालों का जवाब दे दिया। महान ईश्वर पवित्र कुरआन के सूरे बकरा की आयत नंबर 186 में कहता है हे पैग़म्बर अगर मेरे बंदे मेरे बारे में सवाल करें तो कह दीजिये कि मैं बहुत करीब हूं और जब दुआ करने वाला मुझे बुलाता है तो मैं उसकी दुआओं का जवाब देता हूं। 

दोस्तो यह रमज़ान का पवित्र महीना है। इस महीने में हम सबके पालनहार ने हमें अपना मेहमान बनाया है। मासूमों और महान धार्मिक हस्तियों की जीवनी के अध्ययन से यह बात स्पष्ट होती है कि वे इस महीने में रोज़ा रखते और इसका बहुत अधिक सम्मान करते थे। जब रमज़ान महीने का चांद दिखाई देता था तो पैग़म्बरे इस्लाम किबले की ओर मुख करके खड़े हो जाते थे और महान ईश्वर से स्वास्थ्य व सुरक्षा की दुआ करते थे और नमाज़ पढ़ने, रोज़ा रखने और पवित्र कुरआन की तिलावत करने में उसकी सहायता मांगते थे।

इस पवित्र महीने में पैग़म्बरे इस्लाम दूसरे महीनों की अपेक्षा अधिक नेक अंजाम देते थे। पैग़म्बरे इस्लाम जो नेक कार्य करते थे उसमें से एक रोज़ेदारों का खाना खिलाना था। रिवायत में है कि जब रमज़ान का पवित्र महीना आ जाता था तो पैग़म्बरे इस्लाम पहले से अधिक ज़रूरतमंदों पर ध्यान देने लगते थे और लोगों से सिफारिश करते थे कि वे इस महीने में अधिक से अधिक पवित्र कुरआन की तिलावत करें। इसी प्रकार जब दो तिहाई रमज़ान महीना गुज़र जाता था तो पैग़म्बरे इस्लाम अपना बिस्तर लपेट देते थे और वे महान ईश्वर की अधिक उपासना करते थे।

एक दिन पैग़म्बरे इस्लाम स. से सवाल किया गया कि रमज़ान के महीने में बेहतरीन अमल व कार्य क्या है? तो आपने इसके जवाब में फरमायाः हराम कार्यों से परहेज़ इस महीने के बेहतरीन कार्य हैं।

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