जार्डन, सरकारी आदेश के बाद नमाज़ियों का अनोखा विरोध! + वीडियो
जार्डन में एक मस्जिद के इमाम को अकेले ही " तरावीह" की नमाज़ पढ़नी पड़ी क्योंकि उनके पीछे नमाज़ पढ़ने वालों ने वक़्फ मंत्री के आदेश का विरोध करते हुए, मस्जिद से चले जाने का फैसला किया।
सुन्नी मुसलमान " तरावीह" की नमाज़, रमज़ान के महीने में पढ़ते हैं।
जार्डन में वक्फ मंत्री डाक्टर अब्दुन्नासिर अबुलबसल ने आदेश दिया है कि तरावीह की नमाज़ आठ रकअत के बजाए बीस रकअत पढ़ायी जाए जिसका पूरे जार्डन में नमाज़ियों ने विरोध किया और इसी लिए आठ रकअत खत्म होने के बाद वह नमाज़ पढ़ाने वाले इमाम के पीछे से हट गये लेकिन मंत्री के आदेश की वजह से मस्जिद के इमाम, बीस रकअत तक तरावीह पढ़ाते रहे।
शिया मुसलमान तरावीह की नमाज़ क्यों नहीं पढ़ते?
शिया और सुन्नी मुसलमानों की किताबों में रमज़ान के महीने में बहुत सी " मुस्तहब" नमाज़ों का उल्लेख है लेकिन शिया मुसलमानों का मानना है कि मुस्तहब नमाज़ों को इमाम के पीछे और जमाअत के साथ नहीं पढ़ा जा सकता लेकिन सुन्नी मुसलमान इसे जमाअत के साथ पढ़ते हैं।
कब से आरंभ हुई तरावीह की नमाज़?
सुन्नी मुसलमानो की प्रसिद्ध किताब " सहीह बुखारी" में स्पष्ट रूप से बताया गया है कि तरावीह नमाज़ का आरंभ, दूसरे खरीफा हज़रत उमर के ज़माने में हुआ। बुखारी के अनुसार अब्दुर्रहमान बिन अब्दुलक़ारी बताते हैं कि रमज़ान के महीने में एक रात हम हज़रत उमर के साथ मस्जिद गये तो वहां देखा लोग अलग अलग नमाज़ पढ़ रहे हैं तो हज़रत उमर ने कहा कि मेरे विचार में अगर यह लोग एक इमाम के पीछे नमाज़ पढ़ें तो बेहतर है। उसके बाद उन्हों ने आदेश दिया कि अबू बिन कअब नमाज़ पढ़ाएं। दूसरी रात जब वह मस्जिद गये तो देखा कि लोग जमाअत से मुस्तहब नमाज़ पढ़ रहे हैं तो उन्होंने कहा कि यह अच्छी "बिदअत" है। ( सहीह बुखारी, जिल्द 2 पेज, 308)
बिदअत उस काम को कहते हैं जो धर्म में न हो लेकिन कोई दूसरा उसे धर्म में शामिल कर दे। बिदअत, शिया और सुन्नी मुसलमानों में गलत है लेकिन चूंकि हज़रत उमर ने इस प्रकार के एक दो काम, धर्म में शामिल किये थे इस लिए बहुत से सुन्नी धर्मगुरु बिदअत को दो भागों में बांटते हैं, अच्छी बिदअत और बुरी बिदअत।
पैगम्बरे इस्लाम के पौत्र इमाम जाफर सादिक़ अलैहिस्सलाम ने कहा है कि जमाअत के साथ तरावीह पढ़ना जायज़ नहीं है।
एक अन्य रवायत में बताया गया है कि जब हज़रत अली अलैहिस्सलाम कूफा नगर में थे तो लोगों ने आकर उनसे तरावीह की नमाज़ पढ़ाने को कहा तो हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने इन्कार कर दिया और सब को रमज़ान की रातों में मुस्तहब नमाज़ जमाअत के साथ पढ़ने से रोका। (Q.A.)