क्या अमरीका, अफ़ग़ानिस्तान को लीबियान बनाना चाहता है?
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अमरीकी सरकार ने अफ़ग़ानिस्तान की जनता और सरकार को ख़तरे में डाल कर इस देश को लीबिया बनाना और अफ़ग़ानिस्तान और पड़ोसदी देशों पर गृहयुद्ध के ख़र्चे थोपने की कोशिश में है।
(last modified 2023-04-09T06:25:50+00:00 )
Jun २६, २०२१ १७:२१ Asia/Kolkata
  • क्या अमरीका, अफ़ग़ानिस्तान को लीबियान बनाना चाहता है?

अमरीकी सरकार ने अफ़ग़ानिस्तान की जनता और सरकार को ख़तरे में डाल कर इस देश को लीबिया बनाना और अफ़ग़ानिस्तान और पड़ोसदी देशों पर गृहयुद्ध के ख़र्चे थोपने की कोशिश में है।

अमरीका की ओर से अफ़ग़ानिस्तान से निकलने की अप्रत्याशित घोषणा और उसके बाद तुर्की को छोड़ कर नेटो के सदस्य सभी देशों के अफ़ग़ानिस्तान से निकलने के बाद तालेबान ने इस देश में तेज़ी से विभिन्न इलाक़ों पर क़ब्ज़ा करना शुरू कर दिया है। इस प्रकार से कि कई इलाक़ों में लोग यहां तक कि महिलाएं भी तालेबान के विरुद्ध लामबंद हो गए हैं। इससे अफ़ग़ानिस्तान की नवगठित सेना के बिखरने और इस देश में गृहयुद्ध छिड़ जाने का ख़तरा पैदा हो गया है।

बाइडन जो सबसे अनैतिक काम कर सकते थे, वह अफ़ग़ान सरकार और जनता को ख़तरे में डालना और उन्हें तालेबान के हवाले करना था। बाइडन का यह कहना कि आतंकवाद से संघर्ष के लिए अफ़ग़ानिस्तान पर क़ब्ज़े के संबंध में अमरीका का उद्देश्य पूरा हो चुका है, एक झूठ से बढ़ कर कुछ नहीं है क्योंकि अगर अमरीका सच में नाइन इलेवन का बदला लेना चाहता था तो उसे अफ़ग़ानिस्तान पर नहीं बल्कि सऊदी अरब पर हमला करना चाहिए था क्योंकि नाइन इलेवन का हमला करने वाले 19 लोगों में से 15 का संबंध सऊदी अरब से था, अफ़ग़ानिस्तान से नहींं।

ऐसा लगता है कि अफ़ग़ानिस्तान के बारे में अमरीका की अघोषित नीति का एक पहलू, मुस्लिम ब्रदरहुड की विचारधारा को नए रूप में सामने लाना है जिसकी एक निशानी, इस नीति को आगे बढ़ाने के लिए तुर्की और क़तर का चयन है। तालेबान से बातचीत, क़तर को केंद्र बना कर ही शुरू की गई थी और इस समय जब नेटो के सभी सदस्य देश अफ़ग़ानिस्तान से निकल रहे हैं तो तै यह पाया है कि तुर्की वहां बना रहे और काबुल हवाई अड्डे का नियंत्रण अपने हाथ में रखे।

अमरीका ने अफ़ग़ानिस्तान में जो गंदा खेल शुरू किया है उसके तहत जहां वह अपने सैन्य ख़र्चों को कम करना चाहता है, वहीं इस देश में अपने हितों को भी बाक़ी रखना चाहता है और इसके लिए वह तालेबान को माध्यम बना रहा है। जो इलाक़े तालेबान के विरोधियों के नियंत्रण में थे, उन पर तालेबान तेज़ी से क़ब्ज़ा करते जा रहे हैं। इसका मतलब यही है कि इस गंदे खेल का ख़र्चा अब भी पहले चरण में अफ़ग़ान जनता को और दूसरे चरण में अफ़ग़ानिस्तान के पड़ोसी देशों को सहन करना पड़ेगा। अफ़ग़ानिस्तान की जनता और क्षेत्रीय सरकारों विशेष कर पड़ोसी देशों को अफ़ग़ानिस्तान को युगोस्लाविया और लीबिया बनने से रोकने के लिए बहुत ज़्यादा सतर्क रह कर काम करने की ज़रूरत है। (HN)

 

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