क्या रूस मंगलवार को यूक्रेन पर हमला कर देगा
मॉस्को और कीव के बीच पूर्वी यूरोप में तनाव बढ़ने के साथ ही यूक्रेन पर संभावित रूसी हमले को लेकर कई चेतावनियां जारी की गई हैं। पेंटागन ने एक बयान में कहा है कि रक्षा सचिव लॉयड ऑस्टिन ने पोलैंड, जर्मनी, कनाडा, फ्रांस, रोमानिया और इटली में अपने समकक्षों के साथ संपर्क में चेतावनी दी है कि यूक्रेन पर रूस का आक्रमण किसी भी समय शुरू हो सकता है।
अमरीकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन ने भी शुक्रवार को दावा किया कि रूस, यूक्रेन की सीमा पर अधिक सैनिकों को इकट्ठा कर रहा है, और यह हमला बीजिंग शीतकालीन ओलंपिक के दौरान भी हो सकता है।
नाटो महासचिव जेन्स स्टोल्टेनबर्ग ने भी यूक्रेन पर रूसे के संभावित हमले के बारे में पश्चिमी नेताओं के दावों की पुष्टि की है। स्टोल्टेनबर्ग ने कहा है कि यूरोप को सबसे खराब स्थिति के लिए तैयार रहना चाहिए, क्योंकि संभावित हमले की चेतावनी का समय लगभग समाप्त हो रहा है।
हालांकि उन्होंने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि नाटो अपने सैन्य सहयोगियों के चयन में अपने मूल सिद्धांतों से समझौता नहीं करेगा।
पश्चिमी अधिकारी यूक्रेन संकट के कूटनीतिक समाधान का आह्वान ऐसी स्तिति में कर रहे हैं, कि जब अमरीका, ब्रिटेन और अन्य नाटो सदस्यों ने पिछले कुछ दिनों के दौरान रूस के पड़ोसी देशों में हज़ारों सैनिक तैनात किए हैं। नाटो के पूर्वी मोर्चे को मज़बूत बनाने के लिए केवल पोलैंड और रोमानिया में 3 हज़ार अमरीकी सैनिकों को तैनात किया गया है। पेंटागन का कहना है कि लॉयड ऑस्टिन ने अगले दो दिनों के भीतर अन्य 3 हज़ार अमरीकी सैनिकों को पोलैंड भेजने का आदेश दिया है। इसी के साथ कई एफ-16 लड़ाकू विमान रोमानिया में तैनात किए जाएंगे।
पश्चिमी मीडिया ने तो इससे दो क़दम आगे बढ़कर यह दावा किया है कि यूक्रेन पर रूस का हमला मंगलवार से शुरू हो सकता है। इसी के साथ यूक्रेन पर रूसी हमले की संभावना को देखते हुए कई पश्चिमी देशों ने अपने नागरिकों को यूक्रेन छोड़ने लिए कहा है। यहां तक कि एसोसिएटेड प्रेस ने शनिवार को अमरीकी अधिकारियों के हवाले से कहा कि बाइडन शासन यूक्रेन में अमरीकी दूतावास को बंद करने का इरादा रखता है।
राजनीतिक मामलों के विशेषज्ञ और पत्रकार व्लादिमिर ईसाचंकोफ़ का कहना है कि रूस, यूक्रेन सीमा पर अपने सैनिकों की संख्या बढ़ा रहा है, क्योंकि पश्चिम ने सिरे से मास्को की सुरक्षा चिंताओं को नज़र अंदाज़ कर दिया है। इसलिए ऐसा लगता है कि कूटनीति का द्वार अब बंद हो चुका है।