क्या तालिबान ख़ुद अपनी ही धारणा से लड़ने में असमर्थ हैं?
तालिबान सरकार के गृह मंत्री ने इस गुट की ओर से जारी की गई आम माफ़ी का उल्लंघन करने वालों को कड़ी सज़ा देने की धमकी दी है।
पिछले साल अगस्त के महीने में काबुल की सत्ता पर क़ब्ज़ा करने वाले तालिबान ने अपनी छवि बदलने का प्रयास करते हुए देश में आम माफ़ी का एलान किया था। तालिबान का कहना था कि पूर्व सरकार में शामिल रहे नेताओं, अधिकारियों और सुरक्षाबलों के ख़िलाफ़ इंतक़ामी कार्यवाही नहीं की जाएगी। हालांकि तालिबान सुरक्षाकर्मियों ने इस वादे पर अमल नहीं किया और बड़े पैमाने पर पूर्व सरकार के अधिकारियों और कमांडरों को मौत के घाट उतार दिया। देश और विदेशों में तालिबान के इस क़दम की क़डी निंदा की गई और अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने बड़े पैमाने पर दी गई फांसियों की जांच की मांग भी की।
कहा जा सकता है कि अपनी घोषणाओं और वादों से पलटना ख़ुद तालिबान के हक़ में सही नहीं है। क्योंकि अफ़ग़ानिस्तान की सत्ता अब इस चरमपंथी गुट के हाथों में है, जो दुनिया के सामने अपनी थोड़ी उदार छवि पेश करना चाहता है, ताकि विश्व समुदाय उसकी सत्ता को औपचारिकता प्रदान कर दे। लेकिन इस तरह की कार्यवाहियों से इस गुट की छवि फिर से ख़राब होगी और लोगों के दिमाग़ में 90 के दशक वाली उनकी छवि फिर से ज़िंदा हो जाएगी। दूसरे यह कि तालिबान की कथनी और करनी में अंतर से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह मान लिया जाएगा कि यह गुट आज भी भरोसेमंद नहीं है और अफ़ग़ानिस्तान की सत्ता सुरक्षित हाथों में नहीं है।
अफ़ग़ानिस्तान मामलों के जानकार अली ख़ज़ाई का इस संदर्भ में कहना है कि तालिबान को एक धार्मिक गुट की पहचान के साथ यह साबित करना पड़ेगा कि उसके कहने और करने में कोई अंतर नहीं है। क्योंकि दूसरी स्थिति में न सिर्फ़ तालिबान, अफ़ग़ान जनता का भरोसा नहीं जीत सकेंगे, बल्कि विश्व समुदाय भी सहयोग के लिए उनकी ओर हाथ नहीं बढ़ाएगा और देश आर्थिक संकट से बाहर नहीं निकल सकेगा।
यही वजह है कि काबुल की सत्ता पर तालिबान के क़ब्ज़े को महीनों बीत चुके हैं, लेकिन देश की राजनीतिक और आर्थिक स्थिति में किसी तरह का कोई सुधार नहीं हुआ है। इस साल रमज़ान का महीना अफ़ग़ानिस्तान में सबसे ख़ूनी महीनों में से एक रहा है। हालांकि तालिबान ने अपने विरोधी गुटों को ख़ुद के मुक़ाबले में बहुत कमज़ोर क़रार दिया है, लेकिन इसके बावजूद वे देश में शांति व्यवस्था स्थापित नहीं कर सके हैं।
मस्जिदों समेत विभिन्न धार्मिक स्थलों और दिया है, लेकिन इसके बावजूद वे देश में शांति व्यवस्था स्थापित नहीं कर सके हैंबसे ख़ूनी महीक और आर्थिक ी। ांग भी की। माफ़ी कक्षेत्रों में हुए आतंकवादी हमलों और अफ़गान नागरिकों की हत्याओं को सुरक्षा प्रदान करने में तालिबान की अक्षमता के रूप में देखा जा रहा है, जिसके बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंताओं में वृद्धि हो गई है। दूसरी ओर तालिबान व्यापक राष्ट्रीय सरकार के गठन की मांग को नज़र अंदाज़ कर रहे हैं, जिससे देश में एक बार फिर गृह युद्ध छिड़ने और बड़े पैमाने पर अशांति उत्पन्न होने की आशंका पैदा हो गई है।