अमरीका और पश्चिम के विरोध के बावजूद यूएनएचआरसी में प्रस्ताव मंज़ूर
संयुक्त राष्ट्र संघ मानवाधिकार परिषद यूएनएचआरसी ने यूरोप में क़ुरआने मजीद जलाने और पवित्र चीज़ों के अनादर की घटनाओं को देखते हुए धार्मिक घृणा को रोकने के लिए देशों से और अधिक प्रयास करने का आह्वान करने वाले एक प्रस्ताव को बुधवार को मंज़ूरी दे दी।
स्वीडन में पवित्र क़ुरआन को जलाने के नापाक दुस्साहस के ख़िलाफ़ संयुक्त राष्ट्र संघ मानवाधिकार परिषद में पाकिस्तान और इस्लामी सहयोग संगठन की ओर से पेश किए गये प्रस्ताव को अमरीका और यूरोपीय यूनियन के विरोध के बावजूद बहुमत से पास कर लिया गया।
अमरीका और यूरोपीय संघ ने इस प्रस्ताव को मानवाधिकार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से संबंधित उनके दृष्टिकोण के विरुद्ध क़रार देते हुए विरोध किया था। ब्रिटेन, फ़्रांस, जर्मनी और फ़िनलैंड सहित अन्य 6 देशों ने भी अमरीका और यूरोपीय संघ के दृष्टिकोण की पुष्टि की।
इस्लामी देशों के अलावा भारत, चीन, अर्जेंटीना, बूलेविया,कैमरून, क्यूबा, गांबिया, आइवरी कोस्ट, दक्षिणी अफ़्रीक़ा, यूक्रेन और वियतनाम ने समर्थन किया जिस पर प्रस्ताव पारित हो गया।
इसके अलावा चिली, जार्जिया, होंडोरास, मैक्सिको, नेपाल और पैराग्वे ने मतदान में भाग नहीं लिया।
पश्चिमी देश इस पर आपत्ति जता रहे थे और उन्हें आशंका थी कि सरकारों के कड़े क़दम अभिव्यक्ति की आजादी को अवरुद्ध कर सकते हैं, जिनेवा में 47 सदस्यी संयुक्त राष्ट्र संघ मानवाधिकार परिषद ने पाकिस्तान और फ़िलिस्तीन के लाए गए एक प्रस्ताव को बुधवार को 12 के मुकाबले 28 वोट से मंजूर कर लिया। सात सदस्य वोटिंग में अनुपस्थित रहे.
भारत ने इस प्रस्ताव के पक्ष में मतदान किया जो पवित्र क़ुरआन के अपमान के हालिया सार्वजनिक और पूर्व-निर्धारित कृत्यों की निंदा करता है, साथ ही अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानून से उत्पन्न देशों के दायित्वों के अनुरूप धार्मिक घृणा के इन कृत्यों के अपराधियों को जिम्मेदार ठहराने की आवश्यकता को रेखांकित करता है.
प्रस्ताव पारित होते ही मानवाधिकार परिषद के सदन में तालियां बजने लगीं।
प्रस्ताव के विरोध में मतदान करने वाले देशों में बेल्जियम, फिनलैंड, फ्रांस, जर्मनी, ब्रिटेन और अमेरिका हैं। यूरोप के कुछ हिस्सों में क़ुरआने पाक को जलाये जाने की हालिया घटनाओं की पृष्ठभूमि में यह प्रस्ताव आया है। इस प्रस्ताव में देशों से भेदभाव, शत्रुता या हिंसा को उकसाने वाले धार्मिक घृणा के कृत्यों और उसकी हिमायत को रोकने तथा अभियोजन के लिए कदम उठाने का आह्वान किया गया है।
पाकिस्तान के राजदूत खलील हाशमी ने मतदान के बाद इस बात पर जोर दिया कि इस प्रस्ताव में बोलने की आजादी के अधिकार को अवरुद्ध करने की कोई बात नहीं है बल्कि यह अभिव्यक्ति की आजादी और विशेष जिम्मेदारियों के बीच विवेकपूर्ण संतुलन की कोशिश करता है। (AK)
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