अमेरिका ने "महसा अमीनी" क़ानून क्यों पारित किया?
ईरान के खिलाफ अमेरिका की शत्रुतापूर्ण कार्यवाहियां यथावत जारी हैं।
इसी सिलसिले में अमेरिकी सांसदों ने ईरान के खिलाफ एक प्रस्ताव पारित किया है जिसका नाम "महसा कानून" है। इस प्रस्ताव के पक्ष में 410 मत पड़े जबकि विरोध में केवल तीन मत पड़े। यह प्रस्ताव अमेरिकी सरकार को ईरान के खिलाफ मानवाधिकार के हनन के बहाने दबाव को अधिक करने को ज़रूरी करता है।
साथ ही ईरान के साथ हथियारों के आयात- निर्यात को भी सीमित किया जायेगा। अलबत्ता इस प्रस्ताव को कानून बनने के लिए ज़रूरी है कि वह अमेरिकी सिनेट से भी पारित हो और उस पर अमेरिकी राष्ट्रपति हस्ताक्षर करे।
इस प्रस्ताव को नौ महीने पहले एक अमेरिकी सांसद की ओर से पेश किया गया था तब से उस पर विचार- विमर्श किया जा रहा था। यह प्रस्ताव एसे समय में पारित हुआ है जब ईरान में उपद्रव की वर्षगांठ निकट है और इसी तरह उसका पारित होना उस समय से भी निकट है जब ईरान के खिलाफ हथियारों का प्रतिबंध पूरी तरह समाप्त होने वाला है। एसे समय में तेहरान विरोधी इस प्रस्ताव का पारित होना इस बात का सूचक है कि अमेरिका मानवाधिकारों के हनन जैसे विषय के बहाने ईरान पर अपने दबावों में वृद्धि की चेष्टा में है।
इस सिलसिले में अमेरिका का लक्ष्य मीसाइलों व ड्रोनों के उत्पाद और निर्यात को सीमित करने के लिए प्रयास करना और उन व्यक्तियों पर प्रतिबंध लगाना जिनकी इस संबंध में भूमिका है। इसी प्रकार अमेरिकी सरकार इस्लामी गणतंत्र ईरान के वरिष्ठ अधिकारियों पर मानवाधिकारों के हनन और आतंकवाद के समर्थन के बहाने प्रतिबंध लगाना चाहती है।
कुल मिलाकर अमेरिकी सरकार के क्रिया कलापों पर ध्यान इस बात का सूचक है कि वाशिंग्टन विभिन्न बहानों से तेहरान के खिलाफ अपने दबावों में वृद्धि करने की चेष्टा में है। अमेरिका की यह वह नीति है जो ईरान की इस्लामी क्रांति के सफल होने के बाद से जारी है। अमेरिका ईरान के खिलाफ लगभग 44 वर्षों से शत्रुतापूर्ण नीति अपनाये हुए है, कभी वह तेहरान के खिलाफ प्रतिबंधों का एलान करता है, कभी उसे सैनिक धमकियां देता था और कभी उसके खिलाफ राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक दबावों में वृद्धि करता है।
रोचक बात यह है कि ईरान के खिलाफ अमेरिका की शत्रुतापूर्ण कार्यवाहियों के विफल होने के बावजूद वह तेहरान के खिलाफ अपनी शत्रुतापूर्ण कार्यवाहियां जारी रखे हुए है और इस संबंध में जो बाइडेन के सत्ताकाल में और वृद्धि हो गयी है। अमेरिका द्वारा ईरान पर दबाव में वृद्धि का एक तरीका ईरान के उन आंतरिक मामलों को हवा देना है जिनसे संकट उत्पन्न किया जा सकता है।
महसा अमीनी के मामले को इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जा सकता है। पिछले वर्ष ईरान में महसा अमीनी की मौत को मानवाधिकारों के हनन का रूप देकर ईरान में हिंसा व उपद्रव की आग को खूब हवा दी गयी और मानवाधिकारों की रक्षा के दावेदार अमेरिका और फ्रांस सहित कई पश्चिमी देशों ने ईरान के आंतरिक मामलों में खूब हस्तक्षेप किया।
बहरहाल गत 44 वर्षों का इतिहास इस बात का गवाह है कि इस्लामी क्रांति को रोकने और इस्लामी मूल्यों पर आधारित ईरान की इस्लामी व्यवस्था को खत्म करने के लिए दुश्मनों की ओर से विभिन्न प्रकार के षडयंत्र किये जाते रहे हैं परंतु आज तक वे न तो अपने शैतानी लक्ष्यों को प्राप्त कर सकें हैं और न ही भविष्य में प्राप्त कर सकेंगे। MM
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