विश्लेषण | यूक्रेन युद्ध फ़्रांस की जीवन-यापन संकट तक कैसे पहुँचा?
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फ़्रांस में संकट
पार्सटुडे – पेरिस के केंद्र में सैकड़ों लोगों ने नाटो, यूरोपीय संघ और यूक्रेन युद्ध के प्रति फ़्रांस की नीति के खिलाफ़ प्रदर्शन किया।
प्रदर्शनकारियों ने फ़्रांस के नाटो और यूरोपीय संघ से बाहर निकलने, कीव को हथियार भेजना बंद करने और युद्ध के वित्तपोषण को समाप्त करने की माँग की। "मैक्रां, बाहर जाओ" के नारे के साथ "हम यूक्रेन के लिए नहीं मरेंगे" का नारा भी लगाया गया। इस प्रदर्शन का महत्व उस संबंध में है जो प्रदर्शनकारियों ने विदेशी युद्ध और फ़्रांस के भीतर जीवन-यापन की लागत के बीच स्थापित किया। राष्ट्रवादी पार्टी के नेता और फ़्रांस के अगले वर्ष के राष्ट्रपति चुनाव के उम्मीदवार फ़्लोरियन फ़िलिपो ने इसी संबंध को विरोध की धुरी बनाने का प्रयास किया। उनकी बात स्पष्ट थी: पेरिस जो संसाधन यूक्रेन के समर्थन में खर्च करता है, उनका उपयोग फ़्रांसीसियों पर आर्थिक दबाव कम करने के लिए किया जाना चाहिए। यह आख्यान एक भू-राजनीतिक विवाद को दैनिक मुद्दे में बदल देता है। बहस अब केवल नाटो और यूक्रेन की नहीं है। बहस यह है कि फ़्रांसीसी सरकार अपना पैसा कहाँ ख़र्च करती है और उसकी पहली प्राथमिकता क्या है।
यह तर्क बिला वजह नहीं बना है। युद्ध की शुरुआत से फ़्रांस ने यूक्रेन को अरबों यूरो के सैन्य उपकरण और वित्तीय सहायता प्रदान की है। फ़्रांस के रक्षा मंत्रालय ने 2023 के अंत तक दिए गए सैन्य उपकरणों का मूल्य 2.6 अरब यूरो बताया है और "यूरोपीय शांति सुविधा" को 1.2 अरब यूरो के भुगतान की सूचना दी है। इस मंत्रालय ने यह भी घोषणा की है कि 2024 के पहले चार महीनों में यूक्रेन के लिए 1.32 अरब यूरो से अधिक की नई सैन्य सहायता प्रदान की गई।
इन आँकड़ों का अनिवार्य रूप से यह अर्थ नहीं है कि फ़्रांस की सभी आर्थिक समस्याएँ यूक्रेन की सहायता से उत्पन्न हुई हैं। ऐसा दावा आर्थिक दृष्टि से टिकाऊ नहीं है। ऋण संकट, ऊर्जा लागत, मुद्रास्फीति, कमजोर विकास और सार्वजनिक बजट पर दबाव, इन सबके अलग-अलग कारण हैं लेकिन राजनीति में, लागतों को कैसे देखा जाता है यह निर्णायक महत्व रखता है। जब सरकार संसाधनों की सीमा की बात करती है और साथ ही अपनी विदेशी प्रतिबद्धताएँ बनाए रखती है, तो नागरिकों को बजटीय प्राथमिकताओं के बारे में सवाल करने का अधिकार है।
यहीं यूक्रेन युद्ध जीवन-यापन का मुद्दा बन जाता है। मैक्रां सरकार कहती है कि यूक्रेन का समर्थन यूरोप की सुरक्षा की रक्षा का हिस्सा है। फ़्रांस का रक्षा मंत्रालय भी यूक्रेन के समर्थन को सीधे यूरोप की सुरक्षा और रूस के खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता से जोड़ता है। आलोचक लेकिन एक और सवाल उठाते हैं, यूरोप की सुरक्षा का फ़्रांसीसी नागरिक की आर्थिक सुरक्षा से क्या संबंध है? यदि इस रणनीति की लागत बढ़ती है, तो सरकार को विदेशी प्रतिबद्धताओं और घरेलू माँगों के बीच संतुलन कैसे बनाना चाहिए? इस दृष्टिकोण से पेरिस के प्रदर्शन को फ़्रांस के बहुमत की तत्काल स्थिति में बदलाव का संकेत नहीं माना जाना चाहिए। प्यू रिसर्च सेंटर के वसंत 2026 के आँकड़े दिखाते हैं कि 52 प्रतिशत फ़्रांसीसी यूरोपीय संघ के बारे में सकारात्मक दृष्टिकोण रखते हैं और 47 प्रतिशत नकारात्मक। जिन देशों की जाँच की गई उनमें फ़्रांस उन दो समाजों में से एक है जहाँ यूरोपीय संघ के बारे में जनमत लगभग दो हिस्सों में विभाजित है। इसलिए "फ़्रेक्सिट" अभी भी बहुमत की माँग नहीं है; लेकिन यूरोपीय संघ के प्रदर्शन से असंतोष भी एक ऐसी वास्तविकता है जिसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।
यही अंतर नाटो के बारे में भी महत्वपूर्ण है। फ़िलिपो फ़्रांस के नाटो से पूर्ण रूप से बाहर निकलने की माँग करते हैं। यह रुख फ़्रांस की दक्षिणपंथी मुख्यधारा के दृष्टिकोण के समान नहीं है। इसलिए पाले-रोयाल के नारों को पूरे दक्षिणपंथी शिविर या फ़्रांसीसी समाज पर लागू नहीं किया जा सकता। लेकिन फ़िलिपो जो विचार प्रस्तुत करते हैं, वह उनके व्यक्तिगत चुनावी वजन से अधिक महत्वपूर्ण है; इस अर्थ में कि क्या फ़्रांस की ट्रांस-अटलांटिक प्रतिबद्धताएँ उसके आर्थिक हितों और घरेलू प्राथमिकताओं के अनुरूप हैं?
यह प्रश्न युद्ध जारी रहने और आर्थिक दबाव बढ़ने की स्थिति में और अधिक महत्वपूर्ण हो सकता है। क्योंकि यूक्रेन युद्ध जितना लंबा होगा, विदेशी सहायता उतनी ही अधिक बजट का मुद्दा बनेगी। जितना अधिक जीवन-यापन का दबाव बढ़ेगा, विदेशी खर्चों और घरेलू जरूरतों के बीच तुलना उतनी ही अधिक राजनीतिक होगी। इस स्थिति में सरकार के विरोधी यूक्रेन युद्ध को एक विदेश नीति के मामले से सरकार की आर्थिक और सुरक्षा नीतियों के प्रतीक में बदल सकते हैं।
इसलिए पाले-रोयाल के प्रदर्शन को न तो "फ़्रांस की आवाज़" कहा जाना चाहिए और न ही केवल एक सीमांत विरोध माना जाना चाहिए। यह प्रदर्शन एक राजनीतिक संकेत है। एक संकेत कि यूक्रेन, नाटो और यूरोपीय संघ पर दरार जीवन-यापन और सरकारी खर्चों पर दरार से जुड़ रही है। यह वही बिंदु है जो एलिसी पैलेस के लिए महत्वपूर्ण है। युद्ध पर मतभेद तब सरकार के लिए अधिक राजनीतिक खतरा बन जाता है जब नागरिक इसे अपने ऊर्जा बिल, कर, क्रय शक्ति और सार्वजनिक सेवाओं से जुड़ा हुआ देखते हैं। मुख्य प्रश्न अब यह नहीं है कि पाले-रोयाल में कितने सौ लोग एकत्र हुए; प्रश्न यह है कि यदि युद्ध जारी रहा और घरेलू लागतें बढ़ीं, तो कितने फ़्रांसीसी मतदाता यह सवाल दोहराएंगे: फ़्रांस की विदेश नीति की लागत फ़्रांसीसी समाज की जेब से क्यों चुकाई जानी चाहिए? mm