विश्लेषण | फ़्रांस; मानवाधिकार के दावे से दमन तक
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फ़्रांस में प्रदर्शन और देश की पुलिस हिंसा
पार्स टुडे – अख़बार गार्डियन ने लिखा, फ़्रांसीसी सरकार प्रदर्शनकारी स्कूली छात्रों के साथ "ऐसे आंतरिक दुश्मनों" जैसा व्यवहार कर रही है "जिन्हें बेअसर किया जाना चाहिए"।
गार्डियन का यह वर्णन पेरिस के रिकॉर्ड में एक गंभीर विरोधाभास से पर्दा उठाता है , ऐसी सरकार जो स्वयं को मानवाधिकारों का पालना और स्वतंत्रता की रक्षक बताती है, वह बेहतर शिक्षा और समान अवसर चाहने वाले किशोरों के सामने दमनकारी तरीक़े अपना रही है। फ़्रांस का संकट अब केवल शिक्षा का संकट नहीं है यह उस सरकार के मानवाधिकार दावों की विश्वसनीयता की परीक्षा है जो युवा पीढ़ी की मांगों का जवाब देने के बजाय प्रदर्शनकारियों को एक सुरक्षा मुद्दा बना देती है।
गार्डियन ने कई किशोरों की शारीरिक चोटों का विवरण देकर इस टकराव के आयामों को उजागर किया है। 14 वर्षीय एडेन के चेहरे पर आंसू गैस ग्रेनेड लगने से उसका जबड़ा टूट गया और उसके दाँत निकल गए। 16 वर्षीय माएल ने एक आँख की दृष्टि खो दी और 15 वर्षीय एवान ने पुलिस के शॉक ग्रेनेड से जुड़े एक विस्फोट में अपना हाथ खो दिया। ये ऐसी क़ीमतें नहीं हैं जो किशोरों को शिक्षा के अधिकार की मांग के लिए चुकानी चाहिए। इन घटनाओं की रिपोर्ट फ़्रांसीसी सरकार के सामने एक मूलभूत प्रश्न रखती है: मानवाधिकारों की बात कैसे की जा सकती है लेकिन प्रदर्शनकारी बच्चों को पहुँची गंभीर चोटों के बारे में जवाबदेही को कैसे दरकिनार किया जा सकता है?
स्कूली छात्रों के गुस्से की जड़ भी स्पष्ट है। गार्डियन की रिपोर्ट के अनुसार शैक्षणिक वर्ष 2024 से 2025 में फ़्रांस के सार्वजनिक माध्यमिक विद्यालयों में 20 मिलियन से अधिक शिक्षण घंटे प्रदान नहीं किए गए; यह लगभग हर दस पाठों में से एक पाठ के बराबर है। शिक्षकों की कमी, जर्जर इमारतें, अनुपयुक्त सुविधाएँ और शैक्षिक असमानता, विशेष रूप से वंचित क्षेत्रों में, हज़ारों छात्रों के शैक्षिक अवसरों को सीमित कर चुकी है। जब स्कूल शिक्षा की सबसे बुनियादी आवश्यकताओं को पूरा करने में असमर्थ हों, तो छात्रों के विरोध को केवल अव्यवस्था या सार्वजनिक व्यवस्था के विरुद्ध ख़तरा नहीं कहा जा सकता। यह विरोध सरकार के प्रदर्शन के बारे में जवाबदेही की मांग है।
तथापि पेरिस ने संकट को बातचीत और तत्काल सुधारों से प्रबंधित करने के बजाय सुरक्षा उपायों पर निर्भर किया है। फ़्रांस के गृह मंत्री ने घोषणा की है कि उन्होंने पुलिस बलों को संयम बरतने का आदेश नहीं दिया। गार्डियन ने यह भी रिपोर्ट किया कि 8 अक्टूबर तक 6,877 लोगों को हिरासत में लिया गया था और उनमें से लगभग 80 प्रतिशत बच्चे थे। किशोरों को लगी गंभीर चोटों से संबंधित रिपोर्टों के साथ ऐसे आँकड़े पुलिस के प्रदर्शन की स्वतंत्र जाँच की आवश्यकता को दोगुना कर देते हैं। सरकार सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने की ज़िम्मेदार है, लेकिन यह ज़िम्मेदारी बल के अनुपातहीन प्रयोग या विरोध के अधिकार की अवहेलना का आवरण नहीं बन सकती।
फ़्रांसीसी सरकार का विरोधाभास ठीक इसी बिंदु पर स्पष्ट होता है। पेरिस के लिए मानवाधिकार ऐसा सिद्धांत नहीं हो सकता जिसकी वैधता केवल राजनयिक भाषणों और अन्य देशों के विरुद्ध रुख़ में हो। असली मापदंड सरकार का अपने उन नागरिकों के साथ व्यवहार है जो उसे अपनी सीमाओं के भीतर चुनौती देते हैं। जो सरकार किशोरों के शिक्षकों और शैक्षिक सुविधाओं की कमी के विरोध को "आंतरिक दुश्मन" की भाषा में ढालती है, वह समस्या का समाधान करने के बजाय समाज से अपनी दूरी बढ़ाती है। ऐसा दृष्टिकोण न केवल जनविश्वास को क्षीण करता है बल्कि फ़्रांस के मानवाधिकार दावों की विश्वसनीयता पर भी प्रश्नचिह्न लगाता है।
इस संकट के परिणाम फ़्रांस की सीमाओं तक सीमित नहीं रहे हैं। इटली और बेल्जियम में समान प्रदर्शन तथा अन्य यूरोपीय देशों में एकजुटता की गतिविधियाँ दर्शाती हैं कि युवा पीढ़ी का असंतोष राष्ट्रीय सीमाओं से आगे बढ़ सकता है। मांगें एक जैसी नहीं हैं लेकिन शैक्षिक सुविधाओं की कमी, शिक्षा की लागत, आवास संकट और आर्थिक भविष्य के बारे में चिंता यूरोप के कुछ हिस्सों में आपस में जुड़ गई हैं। यह एकसाथ होना यूरोपीय सरकारों के लिए चेतावनी है कि युवा पीढ़ी की आवश्यकताओं की अवहेलना बिखरे हुए असंतोष को राजनीतिक व्यवस्थाओं की कारगरता और आर्थिक प्राथमिकताओं के बारे में एक व्यापक संकट में बदल सकती है।
फ़्रांस इस परीक्षा के केंद्र में है। सरकार उच्च सार्वजनिक ऋण और बजटीय सीमाओं का सामना कर रही है लेकिन यह तथ्य उसके आर्थिक चुनावों को प्रश्न और आलोचना से मुक्त नहीं करता। गार्डियन ने एक प्रस्ताव का उल्लेख किया है जिसके अनुसार कर सुधार शिक्षा के लिए अधिक संसाधन प्रदान कर सकते हैं। इसलिए विवाद केवल संसाधनों की कमी पर नहीं है; यह सरकार की प्राथमिकताओं और सार्वजनिक ख़र्च के वितरण के तरीक़े पर भी है। जब स्कूल शिक्षकों की कमी से पीड़ित हों और छात्र सुविधाओं की मांग के लिए सड़कों पर आएँ, तो पेरिस को यह समझाना चाहिए कि सुरक्षा प्रतिक्रिया ने शैक्षिक सुधारों पर प्राथमिकता क्यों पाई है।
फ़्रांस का संकट अब एक आंतरिक विवाद से आगे बढ़कर यूरोप की मानवाधिकार विश्वसनीयता की कसौटी बन गया है। फ़्रांसीसी सरकार मानवाधिकारों की रक्षा में अपने ऐतिहासिक रिकॉर्ड के आधार पर पुलिस के आज के प्रदर्शन और अपने स्कूलों की स्थिति के बारे में जवाबदेही से नहीं बच सकती। दमन शिक्षकों की कमी की भरपाई नहीं करता; हिरासत शैक्षिक असमानता को समाप्त नहीं करती और धमकी खोया हुआ विश्वास वापस नहीं लाती। अगर फ़्रांस मानवाधिकारों की रक्षा का दावेदार है तो दूसरों को उपदेश देने से पहले उसे अपने स्कूली छात्रों के अधिकारों का पालन करना चाहिए। अन्यथा पेरिस के दावों और फ़्रांस की सड़कों की वास्तविकता के बीच की खाई एक सरकार की विश्वसनीयता से आगे बढ़कर यूरोपीय लोकतंत्र की विश्वसनीयता के लिए चुनौती बन जाएगी। mm