यूरोपीय संघ से ब्रिटेन बाहर निकला
यूरोपीय संघ से ब्रिटेन के बाहर निकलने संबंधी जनमत संग्रह की मतगणना समाप्त होने के बाद यह निश्चित हो गया है कि अधिकतर अंग्रेज़ जनता यूरोपीय संघ से अपने देश के बाहर निकलने की इच्छुक है।
ब्रेक्सिट के नाम से कराए गए जनमत संग्रह के परिणामों के अनुसार ब्रिटेन के 52 प्रतिशत लोगों ने यूरोपीय संघ से निकलने और 48 प्रतिशत लोगो ने इस संघ में बने रहने के पक्ष में मतदान किया। इसका त्वरित परिणाम तो यह रहा कि ब्रिटेन की मुद्रा 1985 के बाद से अपने न्यूनतम स्तर पर पहुंच गई, प्रधानमंत्री डेविड कैमरून ने पद छोड़ने की घोषणा कर दी जबकि यूरोप सहित पूरे संसार में इस फ़ैसले के झटके महसूस किए गए। जनमत संग्रह के आगामी प्रभावों की अनदेखी की जाए तो प्रश्न यह उठता है कि ब्रिटेन की जनता ने यह निर्णय क्यों किया? वास्तविकता यह है कि यूरोपीय संघ, अमरीका का पिछलग्गू बन गया था और वह उसकी नीतियों पर आंख बंद करके अमल कर रहा था जिससे ब्रिटेन सहित संघ के अन्य सदस्य देशों की जनता भी अप्रसन्न है। इसी तरह मानवाधिकार और शरणार्थियों को जगह देने के संबंध में यूरोपीय संघ द्वारा सदस्य देशों पर थोपे जाने वाले निर्णय भी लोगों की अप्रसन्नता का कारण बन रहे हैं।
बहरहाल ब्रिटेन की जनता ने यूरोपीय संघ से अपने देश के बाहर निकलने के पक्ष में मतदान करके इस संघ से अपनी नाराज़गी की घोषणा कर दी है। इस फ़ैसले का न केवल ब्रिटेन व यूरोपीय संघ बल्कि पूरे पश्चिमी जगत पर गहरा प्रभाव पड़ेगा। शायद यही वजह थी कि यूरोपीय संसद के विदेश नीति आयोग के प्रमुख अलमार ब्रूक ने ब्रिटेन को चेतावनी दी थी कि अगर उसने संघ से बाहर निकलने का फ़ैसला किया तो उसके पास वापसी का कोई रास्ता नहीं होगा और संघ इस प्रकार का कोई उदाहरण क़ाएम नहीं करना चाहता कि कोई देश जब चाहे निकल जाए और फिर जब चाहे वापस आ जाए। (HN)