ट्रम्प का पाकिस्तान पर वार, दोस्त भी नहीं बने ग़मख़ार
37 सदस्यीय इंटर गवर्नमेंटल फ़ोरम फ़ाइनेन्शियल एक्शन टास्क फ़ोर्स एफ़एटीएफ़ की बैठक 18 से 23 फ़रवरी तक पेरिस में हुई जिसकी समाप्ति पर यह ख़बरें आईं कि पाकिस्तान को आतंकवादियों की आर्थिक सहायता रोकने में विफल रहने वाले देशों की वाच लिस्ट में डाल दिया गया है।
इस वाच लिस्ट को ग्रे लिस्ट भी कहा जाता है। वाच लिस्ट में डाले जाने की ख़बरों पर पाकिस्तानी अधिकारियों की प्रतिक्रिया वैसी ही भ्रामक रही जैसी उसकी विदेश नीति है।
पेरिस बैठक की समाप्ति पर प्रेस विज्ञाप्ति में पाकिस्तान को वाच लिस्ट में डालने का कहीं उल्लेख नहीं आया लेकिन ब्रिटिश समाचार एजेंसी ने पाकिस्तानी अधिकारियों के हवाले से रिपोर्ट दी कि पाकिस्तान का नाम वाच लिस्ट में शामिल कर दिया गया है। इससे भ्रांति और बढ़ गई। इस भ्रांति को वित्तीय सलाहकार मिफ़ताह इसमाईल ने और बढ़ा दिया। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान तो पहले से ही ग्रे लिस्ट में मौजूद है। अब पाकिस्तान को तीन महीने का समय दिया गया है कि वह आतंकवादियों के आर्थिक स्रोत समाप्त करने के लिए प्रभावी और स्वतंत्र क़दम उठाए वरना जून में उसे ब्लैक लिस्ट में शामिल कर दिया जाएगा।
पेरिस बैठक की समाप्ति से दो दिन पहले विदेश मंत्री ख़्वाजा आसिफ़ ने मास्को यात्रा के दौरान आधी रात के समय ट्वीट के माध्यम से इस बैठक की आरंभिक वोटिंग में मिलने वाली सफलता पर ख़ुशी मनाना शुरू कर दिया। पैरिस बैठक में 20 फ़रवरी को होने वाली आरंभिक बैठक में चीन, तुर्की, सऊदी अरब, और फ़ार्स खाड़ी सहयोग परिषद ने पाकिस्तान का समर्थन किया और आरंभिक वोटिंग में एसा लगा कि मुसीबत टल गई है।
मगर जब अंतिम वोटिंग होने लगी तो पाकिस्तान को सबसे बड़ा धचका तब लगा जब चीन ने अमरीका की ओर से पेश किए गए प्रस्ताव पर अपना विरोध वापस ले लिया जबकि सऊदी अरब और फ़ार्स खाड़ी सहयोग परिषद ने भी पाकिस्तान के विरुद्ध वोट दे दिया, केवल तुर्की था जो पाकिस्तान के साथ खड़ा रहा।
फ़ाइनैन्शियल एक्शन टास्क फ़ोर्स की वाच लिस्ट से पाकिस्तान ने आख़िरी बार 2015 में छुटकारा पाया था लेकिन 2015 के एफ़एटीएफ़ के घोषणा पत्र में कह दिया गया था कि पाकिस्तान को भविष्य में इस वाच लिस्ट से बचने के लिए मनी लांड्रिग क़ानूनों में सुधार करना होगा और आतंकी संगठनों के फ़ंड रोकने के लिए कठोर वित्तीय व्यवस्था बनानी होगी। इससे भी बढ़कर यह कि पाकिस्तान को संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 1267 पर अमल भी करना होगा और अपने इस अमल के बारे में टास्क फ़ोर्स को संतुष्ट भी करना होगा। सुरक्षा परिषद का यह प्रस्ताव हक़्क़ानी नेटवर्क और तालेबान सहित आतंकी संगठनों से संबंधित था।
इस साल पाकिस्तान के बारे में अमरीकी राष्ट्रपति के धमकीपूर्ण ट्वीट से स्पष्ट हो गया था कि केवल सहायता रोक कर अमरीका नहीं मानेगा बल्कि और भी क़दम उठाएगा। मगर पाकिस्तान की नीति निर्धारक आतंकवाद के खिलाफ़ लड़ाई में अपनी क़ुरबानियां ही गिनवाते रहे। अगर क़ुरबानियों से मुसीबत टलनी होती तो यह नौबत ही क्यों आती।
एफ़एटीएफ़ के प्रतिनिधिमंडल की कार्यकारी समिति की इस्लामाबाद यात्रा और कड़ी चेतावनी के बाद प्रतिबंधित संगठनों के ख़िलाफ़ जल्दबाज़ी में कुछ क़दम उठाए गए लेकिन समय की कमी के कारण यह अपर्याप्त थे और इनसे बात बनने के बजाए संदेह पैदा हो गए।
एफ़एटीएफ़ की चेतावनी में सऊदी अरब, चीन और फ़ार्स खाड़ी सहयोग परिषद के पक्के वोट भी पाकिस्तान के ख़िलाफ़ जाने की वजह पाकिस्तान के यही अधूरे क़दम थे।
पाकिस्तान ने सऊदी अरब का वोट पक्का करने के लिए जल्दबाज़ी में सैनिक दस्ते सऊदी अरब रवाना कर दिए जिस पर संसद में बहुत हंगामा भी हुआ मगर प्रधानमंत्री और रक्षा मंत्री स्पष्टीकरण देने से कतराते रहे। मगर खेद तो इस पर है कि सैनिक दस्ते सऊदी अरब भेजना भी काम न आया और सऊदी अरब की अपनी मजबूरी आड़े आ गई। क्योंकि सऊदी अरब एफ़एटीएफ़ की सदस्यता पाना चाहता है और वर्ष 2010 में अपने अपर्याप्त क़दमों की वजह से उसे एक बार इसमें विफलता भी हो चुकी है।
कहा जाता है कि कुछ महीना पहले सऊदी सरकार ने राजकुमारों की धरपकड़ भी इसी कोशिश के तहत की थी और पाकिस्तान के लिए सऊदी अरब इस सदस्यता से हाथ नहीं धोना चाहता। फ़ार्स खाड़ी सहयोग परिषद भी सऊदी अरब के इशारे पर चलती है जो एफ़एटीएफ़ की सदस्य है।
वाच लिस्ट में डाले जाने से पाकिस्तान को कूटनैतिक और आर्थिक दोनों मोर्चों पर समान परिणामों का सामना करना पड़ेगा।
इस लिस्ट में डाले जाने के बाद सबसे पहला असर अंतर्राष्ट्रीय लेनदेन और बैंकिंग पर पड़ता है। पाकिस्तान से लेनदेन के सारे चैनल कड़ी निगरानी में आ जाएंगे जिससे पाकिस्तान में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश प्रभावित होगा क्योंकि निवेशक एसी निगरानी से दूर भागते हैं।
पाकिस्तान को 300 अरब डालर क़र्ज़े का ब्याज इसी साल जून में अदा करना है लेकिन पाकिस्तान का विदेशी मुद्रा भंडार इस समय बहुत निचली सतह पर है। इस स्थिति में ब्याज अदा करने के लिए और क़र्ज़ की ज़रूरत होगी उस समय अमरीका पाकिस्तान पर एक और वार कर सकता है।
वाच लिस्ट में डाले जाने से आईएमएफ़, वर्ल्ड बैंक और अन्य वित्तीय संस्थाओं को पहले ही एक संदेश जा चुका है अतः जब पाकिस्तान विश्व वित्तीय बाज़ार में फ़ंड और क़र्ज़े की तलाश में निकलेगा तो अमरीका कड़ी शर्तें लगाएगा।
अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प पिछले साले दिसम्बर में उज़्बेक राष्ट्रपति शौकत मिर्जायोफ़ और इस साल जनवरी में क़ज़्ज़ाक़ राष्ट्रपति नूर सुलतान नज़रबायोफ़ की वाइट हाउस में मेज़बानी कर चुके हैं। यह मुलाक़ातें अमरीका की ओर से अफ़ग़ानिस्तान के लिए वैकल्पिक सप्लाई मार्ग की तलाश का स्पष्ट संकेत हैं। वैकल्पिक मार्ग मिलने पर पाकिस्तान को मिला ग़ैर नैटो घटक का दर्जा गवांना पड़ सकता है।
पाकिस्तान को अमरीकी राष्ट्रपति की नीति से निपटने के लिए एक समग्र योजना की ज़रूरत है। केवल क़ुरबानियों का बखान करने से कुछ हासिल होने वाला नहीं है।
डाक्टर आसिफ़ शाहिद
पाकिस्तान के सीनियर पत्रकार व लेखक
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