आतंकवाद के ख़िलाफ़ संघर्ष में अमरीका का दोहरा मानदंड
ईरानी विदेश मंत्री जवाद ज़रीफ़ ने अमरीका के पेन्सिलवेनिया राज्य में स्थित वॉट्सन संस्था की रिपोर्ट की ओर इशारा करते हुए कि जिसमें आतंकवाद के ख़िलाफ़ अमरीका के कथित संघर्ष के नतीजे में जानी व माली नुक़सान का उल्लेख है, इस जंग को क्षेत्र में दाइश तथा अलक़ाएदा की शाखाओं के वजूद में आने का ज़िम्मेदार बताया है।
ऐसा लगता है कि ट्रम्प सरकार और अमरीका में इस्लाम विरोधी चरमपंथी विचारों का प्रचार करने वाली संस्थाएं दो लक्ष्य हासिल करना चाहती हैं।
एक पश्चिम एशिया में आतंकवाद के ख़िलाफ़ संघर्ष में अमरीका के घातक हस्तक्षेप का औचित्य दर्शाना और दूसरा आतंकवाद के ख़िलाफ़ संघर्ष में ईरान की कार्यवाही को मूल्यहीन दिखाना है, हालांकि ईरान के आतंकवाद के ख़िलाफ़ संघर्ष के मैदान में सीधे प्रवेश से दाइश का पतन व्यवहारिक हुआ।
अमरीका के आतंकवाद के ख़िलाफ़ कथित संघर्ष का नतीजा बेगुनाह लोगों के जनसंहार के सिवा कुछ और नहीं निकला। वॉट्सन संस्था के अनुसार, 11 सितंबर 2001 की घटना के बाद की जंगों में इराक़, अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान में 5 लाख लोग मारे गए।
मशहूर अमरीकी टीकाकार नोआम चाम्सकी आतंकवाद के ख़िलाफ़ संघर्ष में अमरीका के दोहरे मापदंड के बारे में कहते हैः "अगर आतंकवाद को ख़त्म करना चाहते हैं तो पहले इस सवाल का जवाब ढूंढना होगा कि आतंकवाद क्यों वजूद में आया और इसके पीछे मुख्य कारण क्या है?"
अमरीका के मद्देनज़र आतंकवाद और वास्तविक आतंकवाद के अर्थ में बहुत अंतर है।
जैसा कि ईरानी विदेश मंत्री ने इशारा किया कि अमरीकी कार्यवाहियों से इराक़, सीरिया, लीबिया और यमन में तबाही हुयी और दाइश तथा अलक़ाएदा से जुड़े अनेक गुट वजूद में आए हैं।
इन बदनामियों के बावजूद अमरीकी अधिकारी ख़ुद को आतंकवाद के ख़िलाफ़ संघर्ष का दावेदार समझते और ईरान पर आतंकवाद का समर्थन करने का इल्ज़ाम लगाते हैं। यह दोहरा मानदंड स्पष्ट है। अमरीका जितना दोहरे मापदंड पर बल देगा उतनी ज़्यादा उसकी बदनामी होगी। (MAQ/T)