कहानी : इस्राईल में गुज़रा मेरा एक दिन
खैर अपनी नए ज़माने की लैला से धोखा खा चूका मैं मजनूं घुड़कियों और लम्बी बहसों के बाद अपने बिखरे हुए सामान के साथ ही बचे खुचे सपनों को समेट कर हांपते हड़बड़ाते हुए टैक्सी में बैठ कर अपने होटल पहुंचकर बिस्तर की एक तरफ़ किसी आज़ाद हुए क़ैदी की तरह टूटे बदन को जोड़ते हुए आधी मौत की दुनिया में चला गया..
लेखक : सय्यद इब्राहीम हुसैन (दानिश हुसैनी)
ये एक बेचैन रात है कि जब सुबह के चार बजे मेरी फ्लाई दुबई की उड़ान बेन गुरियान अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर उतर चुकी है..
मैं अपने सपनों की नगरी में आचुका हूँ और अब हवाई अड्डे की चमकदार टाइल्स पर पड़ रहे मेरे क़दम उठने के बजाए उड़ रहे हैं..!!
सच कहूँ तो मुझे पहली बार ससुराल पहुंचे नए नवेले दामाद जैसा एहसास हो रहा है और ऐसा लग रहा है कि इमीग्रेशन और टैक्सी स्टैंड से लेकर जेरुज़्लम की सड़कों और गलियों तक हर कोई बिछी हुई आँखों से बस मेरा ही इंतेज़ार कर रहा है..
और मैं ऐसा सोचूं भी क्यों ना क्यूंकि अब मैं दुनिया भर में सताए गये दबे कुचले लोगों को पनाह सुरक्षा और सम्मान देने वाले विकसित इस्राईल में था और इसी सोच में मैं मेरे क़दमों को घमंड के साथ इमीग्रेशन काउंटर की तरफ़ बढ़ा रहा था..
लेकिन ये क्या!! इमीग्रेशन काउंटर पे पहुँचने के पहले ही कुछ मिनटों की दूरियों के बाद मैं अपने सामान समेत हवाई अड्डे की एक तरफ़ को बने ख़ुफ़िया ठिकाने पर वर्दीधारियों के बीच अपने इस्राइल पहुँचने की सफ़ाई दे रहा था..!!
वैसे मुझे याद है कि मेरे देश से एग्जिट से पहले भी वहां पर इस्राईली इंटेलिजेंस विभाग के एक अफसर ने मुझसे पूछताछ की थी और मैं ये भी मानता हूँ कि ये कार्यवाही उच्च श्रेणी की सुरक्षा प्रणाली के अंतर्गत एक अहम किरदार निभाती है और ज़रूरी भी है लेकिन फ़िर भी इस्राईल का सबसे ज़्यादा साथ देने वाली अमेरिकन सरकार की तरफ़ से अवार्ड पा चुके और ख़ुद इस्राईल की एक सम्मानित संस्था के न्योते पर आए एक सम्मानित व्यक्ति के साथ ऐसा सुलूक किसी भी वजह को बेवजह करने के लिए काफ़ी था..
खैर अपनी नए ज़माने की लैला से धोखा खा चूका मैं मजनूं घुड़कियों और लम्बी बहसों के बाद अपने बिखरे हुए सामान के साथ ही बचे खुचे सपनों को समेट कर हांपते हड़बड़ाते हुए टैक्सी में बैठ कर अपने होटल पहुंचकर बिस्तर की एक तरफ़ किसी आज़ाद हुए क़ैदी की तरह टूटे बदन को जोड़ते हुए आधी मौत की दुनिया में चला गया..
शाम के लगभग पांच बज रहे होंगे कि एकाएक गैलरी में हो रहे शोर शराबे से मेरी आँख खुल जाती है तो आँखों और पेट की भूख मिटाने के लिए जेरुज़लम की गलियों की ख़ाक छानते हुए इंटरनेट पर मौजूद अपने देसी रेस्तराँ को गूगल मैप के सहारे ढूंढते हुए उस कैफ़े में एंट्री कर जाता हूँ..
और फिर जब वहां बैठ कर अपनी देसी डिश के बारे में पूछते हुए काउंटर पर बैठे मालिक को अपने राष्ट्र की नागरिकता के साथ पुकारता हूँ तो वो मोटा व्यक्ति मुझे अजीब सी निगाहों से घूर कर मेरी तरफ़ को लपकते हुए धक्का देकर बाहर जाने को चिल्लाता है..
ये दृश्य देख कर मैं खुली आँखों से अवाक रहते हुए स्तब्ध हो जाता हूँ कि आख़िर मैंने ऐसा भी क्या ग़लत कह दिया..!!
अहाँ!! कहीं ये मुझे पहचानता तो नहीं है..?? कहीं ये सरकार की नीतियों को घेरते मेरे लेख को तो नहीं पढ़ चुका..??
लेकिन मैंने तो उन लेखों के बाद धमकियों के डर और तरफ़दारी करने पर उससे कहीं ज़्यादा फ़ायदा मिलने की वजह से अब सरकार की तरफ़ से लिखना शुरू कर दिया है और इसीलिए मुझे इस्राईल की एक बड़ी शैक्षिक संस्था में काम करने का न्योता मिला है..!! तो फिर ऐसा बर्ताव क्यों..??
अहाँ!! कहीं मैंने उसकी नागरिकता ग़लत तो नहीं समझ ली लेकिन इसमें इतना भड़कने जैसी क्या बात है भला..??
अरे आख़िर बात क्या है..
खैर मैं अपने सवालों को सँभालते हुए डरते हुए कहता हूँ कि ठीक है जाता हूँ लेकिन वजह तो बता दो..
इस बार उस मोटे व्यक्ति ने अपने हाथों को अपनी भरी हुई छाती पे मारते हुए कहा तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई उस घटिया देश से मुझे जोड़ते हुए..??
जब था तो था अब सिर्फ़ इसरायली हूँ..
लेकिन फिर तुमने अपने रेस्तराँ का नाम देश के नाम पर क्यूँ..? मेरा ये सवाल पूरा होता कि उस अजीब इंसान का मुक्का मेरे जबड़ों की तरफ़ बढ़ने लगा तो मैंने जान बचाने के लिए झट हाथ उठा कर बिना वजह माफ़ी मांगी और फिर देश को धंधे के लिए इस्तेमाल करने वाले देश के ग़द्दार पर खिसियाते हुए दूसरी दुकान की तरफ़ चल पड़ा..
मुझे रास्ते में पास ही में एक दूसरा कैफ़े दिखाई दिया तो मैं एक टेबल पर क़ब्ज़ा करके चाय और फ़ास्ट फ़ूड का आर्डर देते हुए अपना व्हाट्सएप चेक करने लगा कि एकाएक मुझे चीख़ कर रोने की आवाज़ से साथ ही काउंटर के सामने फटे कपड़ों और उजड़े बालों वाली एक बच्ची काउंटर की मालिक की तरफ़ रोते हुए अपनी भाषा में कुछ कहते दिखाई दी जिसे काली टोपी और काली सदरी पहने वो अधेड़ आदमी तमाचे जड़ रहा था..
मुझे लगा कि शायद बच्ची ने कुछ चोरी की होगी..
लेकिन अगर चोरी की भी होगी तो इतनी सी तो बच्ची है..!!
खैर मैंने तपाक से लपकते हुए बच्ची को गोद में उठा कर पुचकार कर उसे चुप कराने की कोशिश की तो उस आदमी ने मुझपे काउंटर के पास पड़ी अपनी लाठी की तरह की छड़ी से हमला कर दिया..
और फिर क्या हुआ ये नहीं जानता लेकिन जब आँख खुली तो ख़ुद को किसी अँधेरी जगह पर एक छोटे से तम्बू में फटे पुराने कपड़ों से पट्टियाँ करते एक बूढ़े और अपनें नन्हे से माथे के ज़ख्म पे पट्टी लगाये उसी नन्ही बच्ची के पास पाया!!
मुझे होश में आया देख उन्होंने मुस्कुराते हुए अपनी ज़बान में कुछ कहने की कोशिश की तो मैं समझ ना सका..
जिसपे वो बूढा व्यक्ति अंग्रेज़ी में पूछने लगा..
कहाँ से आए हो बेटा..??
क्या तुम्हारा भी सब कुछ लूट लिया..??
तुम्हारा परिवार ज़िन्दा है ना..??
क्या तुमने फ़िलिस्तीनियों के अधिकारों की बात कर दी थी..??
होश में आया मैं अब उस बूढ़े से काफ़ी बातें करना चाहता था लेकिन मुझे अपने दर्द के बीच ये भी याद था कि मैंने दो किताबें फिलिस्तीन को प्रोपगंडा साबित करने के लिए ही लिखी थी..
खैर मैंने जैसे तैसे हिम्मत करते हुए अपने दबे हुए शर्म भरे शब्दों में तीन सवाल किये कि “मैं कहाँ हूँ, आपने मुझे कहां पाया और वो आदमी इस नन्ही बच्ची को क्यों मार रहा था”
जेरुज़लम के रिफ्यूजी कैम्प में , यहीं पास के एक मलबे पे , ये बच्ची अपने बाप की दुकान पे गयी थी जो अब उस जानवर के नाजायज़ कब्ज़े में है..बूढ़े ने उदास लहजे में जवाब दिया..!!
और फिर..........!!
घड़ी की सुईयां दौड़ते हुए दोपहर के एक बजे की मंज़िल के पास थीं जबकि मेरा जहाज़ तपते हुए सूरज की आँखों में आँखें डाले हवाओं के सीने चीरता हुआ अपनी मंज़िल की तरफ़ छलांगें भर रहा था..
और मैं बूढ़े के दिए बिस्किट्स को कलेजे से चिपकाए अपने आंसुओं के साथ ऐश में डूबे सवा दो अरब बेख़बर मुसलमानों के साथ ही मक्कारी भरी इंसानियत के ढोंग को कोस रहा था..
आज पहली बार मुझे मेरे मुसलमान होने पर फ़ख्र था..
आज पहली बार इस्लाम के मज़लूम होने का एहसास हुआ था..
आज पहली बार करबला समझ आई थी..!!
आज पहली बार मैं असली आतंकवादियों से मिला था..
आज मुझे इस्राईलियों के बेशर्म होने की रिसर्च पर यक़ीन आ चुका था..
आज मुझे इस्राईल में रहने वाले और उसके हर सपोर्टर की असलियत का पता चल चुका था..
आज मैं दोबारा ज़िन्दा हुआ था..
नोट : इस कहानी के सभी पात्र और घटनाएँ काल्पनिक हैं जिन्हें कुछ सच्ची घटनाओं के आधार पर पिरोया गया है..
लेखक के विचारों से पार्स टुडे का सहमत होना अनिवार्य नहीं है।
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