May १७, २०१६ १५:५३ Asia/Kolkata

शायद आपको याद होगा कि पिछले कार्यक्रम में हमने ईरान के राष्ट्रीय संग्रहालय के बारे में विस्तार से बताया था।

  ईरान का राष्ट्रीय संग्रहालय, न केवल ईरान का सबसे बड़ा संग्रहालय है बल्कि इसमे रखी वस्तुओं की दृष्टि से यह विश्व के बड़े संग्रहालयों में से एक है। इसकों 13 भागों में विभाजित किया गया है जिनमें इतिहास से पूर्व के काल से लेकर बाद वाले कालों से संबन्धित दस्तावेज़, सिक्के, शिलालेख, मोहरें, चित्र और इसी प्रकार की एसी बहुत सी वस्तुए हैं जिनसे प्राचीन इतिहास को सरलता से समझा जा सकता है। आजके कार्यक्रम में हम आपको राष्ट्रीय संग्रहालय के इस्लामी विभाग और कुछ अन्य विभागों के बारे में बताएंगे। 



ईरान में इस्लामी संस्कृति के विशेष महत्व के दृष्टिगत, लंबे समय से एक ऐसे संग्रहालय की आवश्यकता का आभास किया जा रहा था जिसमें इस्लामी काल से संबन्धित वस्तुएं हों जिनसे इस्लामी कला और संस्कृतिक के बारे में पता चल सके। इसी विषय के दृष्टिगत सन 1996 में ईरान के राष्ट्रीय संग्रहालय में इस्लामी काल से संबन्धित वस्तुओं का एक संग्रहालय बनाया गया। इसकी इमारत चार मंज़िला है। दो मंज़िलों में इस्लामी कला और संस्कृति से संबन्धित वस्तुए रखी हुई हैं जबकि दो अन्य मंज़िलों को सम्मेलनों और प्रदर्शनियों से विशेष किया गया है।

इस संग्रहालय में जो वस्तुएं रखी हुई हैं वे या तो खुदाई से प्राप्त हुई हैं या फिर इनमें से कुछ का संबन्ध शेख सफ़ीउद्दीन अर्दबेली कांप्लेक्स से है। इसकी एक मंज़िल पर वस्तुओं को वर्गीकृत करके रखा गया है जिनमें हाथ से लिखे पवित्र क़ुरआन और प्राचीनकाल की वैज्ञानिक, एतिहासिक एवं सांस्कृतिक पुस्तकें रखी हुई हैं। इसके अतिरक्त यहां पर पेंटिंग, हस्तलेख, चिकित्सा उपकरण, खगोल शास्त्र से संबन्धित प्राचीन उपकरण और कलाओं से संबन्ध रखने वाली चीज़ें मौजूद हैं।

ईरान के राष्ट्रीय संग्रहालय के विभिन्न भागों में से एक भाग, मिट्टी के बरतनों से संबन्धित है। इस भाग को बनाने का उद्देश्य केवल शोधकर्ताओं की जिज्ञासा को पूरा करना नहीं है बल्कि इसके माध्यम से लोगों को इस कला से अवगत कराना भी है।

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संग्रहालय के मिट्टी के बरतनों वाले भाग को दो भागों में विभाजित किया गया है। इनमे से एक में ईरान के विभिन्न क्षेत्रों के मिट्टी के बरतनों को प्ररदर्शित किया गया है। इन बरतनों को प्राचीन काल, अति प्राचीनकाल और बाद वाले काल के हिसाब से वर्गीकृत किया गया है। दूसरे भाग में जो बर्तन रखे हुए हैं उनके बारे में बहुत कुछ जानकारी, कम्पयूटर के माध्यम से प्राप्त की जा सकती है। यहां पर आने वाले लोग, साफ्ट वेयर के माध्यम से अपने दृष्टिगत विषय को प्राप्त करके उसका अध्धयन कर सकते हैं।


दूसरी हिजरी क़मरी के अन्त और तीसरी हिजरी क़मरी के आरंभ में ईरान पर राज करने वाली कुछ शासन श्रंखलाओं ने देश में इस्लामी कला को स्वरूप देने में महत्वूपर्ण भूमिका निभाई है। इन शताब्दियों के दौरान ईरान में नेशापूर, शूश, इस्तख़्र, गुरगान, सीराफ़ और रेय-शहर आदि कला के केन्द्र रहे हैं। यहां पर कला के साथ ही आर्थिक गतिविधियां भी होती थीं जिसके कारण ईरानी कला अन्य क्षेत्रों में स्थानांतिरित होती रही। इस्लामी कला से संबन्धित संग्रहालय के मिट्टी से बनी वस्तुओं वाले भाग में इस्लाम के उदय की पहली शताब्दी से लेकर क़ाज़ारिया शासन काल के अंत तक इस कला ने उत्थान और पतन का दौर देखा है उसे प्रदर्शित किया गया है।


मिट्टी के बरतन बनाने की कला का काल सलजूक़ी शासनकाल को माना जाता है। यहां पर शहरे-रे, काशान और गुरगान में बनाए गए तामचीनी पर चित्रकारी की कला के नमूनों को देखा जा सकता है। तमाचीनी पर बनी चित्रकारिता, ईरानी कहानियों से प्रभावित है। इनपर सामान्यतः फ़ारसी के शेर लिख हुए हैं। इस्लामी काल से संबन्धित संग्रहालय में कूफ़ी लीपि के शिलाखेल वाले नेशापूर के बने मिट्टी के सुन्दर प्याले रखे हैं जिनका संबन्ध तीसरी हिजरी क़मरी से है। इसी प्रकार से वहां पर पांचवी शताब्दी हिजरी क़मरी का सोने के पानी से लिखा पवित्र क़ुरआन भी मौजूद है। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि ईरान के राष्ट्रीय संग्रहालय के इस्लाम से संबन्धित विभाग में एसी बहुत सी कलाकृतिंया और वस्तुएं रखी हुई हैं जो अतीत में इस्लामी कला की वैभवता को बताती हैं।

विश्व के अन्य संग्रहालयों की ही भांति ईरान के राष्ट्रीय संग्रहालय में भी प्रचीन सिक्कों और मोहरों के लिए एक अलग भाग है जिसमें ईरान के प्रचीन सिक्के और मोहरें रखी हई हैं। किसी संस्कृतिक या सभ्यता को समझने में प्राचीन सिक्कों और मोहरों के महत्व के दृष्टिगत, संग्रहालय के इस भाग को विशेष महत्व प्राप्त है। शोधकर्ता यहां पर आकर प्राचीन ईरान के बारे में बहुत कुछ जान सकते हैं।

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यहां पर जो मोहरें रखी हुई हैं उनका संबन्ध, चौथी हिजरी शताब्दी से लेकर क़ाजारिया काल के अंत से है। इन मोहरों पर कूफी, सुल्स, नस्ख़ और नस्तालिक़ लीपियों में लिखा हुआ है। मोहरों के ऊपर जो कुछ भी लिखा गया है उससे प्राचीनकाल की राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और आस्था से संबन्धित जीवन को समझने में सहायता मिलती है।

वह भाग जहां पर सिक्के और मोहरें रखी हुई हैं वह संग्रहालय का बहुत ही समृद्ध भाग है। यहां पर जो सबसे पुरानी मोहर मौजूद है वह शूश में की गई खुदाई में मिली थी। इसका संबन्ध लगभग छह हज़ार वर्ष पूर्व से है। शूश में खुदाई के दौरान जिस स्थान पर यह प्राचीन मोहर मिली है उसके निकट कुछ प्राचीन टीले भी हैं जैसे हेसार टीला, सिल्क टीला और हफ़्त तपे अहवाज़ आदि।


संग्रहालय में रखी हुई प्राचीन मोहरों के बारे में यदि यह मालूम किया जाए कि इन्हे कोई व्यक्ति या समाज का कोई विशेष वर्ग प्रयोग किया करता था तो इसके बारे में इतिहास से पूर्व के काल में तो कुछ पता नहीं चलता किंतु जिस काल से इतिहास लिखा गया है अर्थात लगभग 5000 वर्ष पहले मोहरों को सामान्यतः राजा, व्यापारी, लेखक या वरिष्ठ धर्मगुरू प्रयोग किया करते थे। जब हम इस्लामी काल में आते हैं तो देखते हैं कि उस काल में अक़ीक़, फ़िरोज़े, याक़ूत, ज़मर्रुद, हाथी के दांत या हड्डियों की मोहरों का चलन था जिन्हें अधिक्तर राजा, उनके दरबार के मंत्री या वरिष्ठ धर्मगुरू प्रयोग किया करते थे।

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राष्ट्रीय संग्रहालय में सन 1998 में शिलालेखों से संबन्धित एक विभाग बनाया गया। इसका उद्देश्य, प्राचीन शिलालेखों को एकत्रित करना, और उनकी मरम्मत करना है। राष्ट्रीय संग्रहालय के इस भाग में शूश और तख़्ते जमशेद से मिलने वाले शिलालेखों को रखा गया है। बाद में हर शिलालेख की पूरी जानकारी के उद्देश्य से उनका संक्षिप्त विवरण तैयार किया गया है। यहां पर एक पुस्तकालय भी है जिसमें विभिन्न भाषाओं में तीस हज़ार से अधिक पुस्तकें और पत्रिकाए रखी हुई हैं। ईरान के राष्ट्रीय संग्रहालय का पुस्तकालय, देश में प्राचीन इतिहास को जानने का सबसे महत्वपूर्ण साधन है जिसे विश्व ख्याति प्राप्त है। बड़ी संख्या में शोधकर्ता यहां पर शोध करने के लिए आते हैं।