Jun ११, २०१६ ०९:०८ Asia/Kolkata

दसवीं शताब्दी के खगोलशास्त्री मोहम्मद बिन मोहम्मद यहिया अबुलवफ़ाय बूज़जानी का वर्तमान ख़ुरासान के तुरबत जाम शहर के निकट बूज़जान में जन्म हुआ।

दसवीं शताब्दी के खगोलशास्त्री मोहम्मद बिन मोहम्मद यहिया अबुलवफ़ाय बूज़जानी का वर्तमान ख़ुरासान के तुरबत जाम शहर के निकट बूज़जान में जन्म हुआ। बूज़जानी ने गणित की प्राथमिक शिक्षा बूज़जान में अपने चचा और मामू से हासिल की।

 

 20 वर्ष की आयु में उच्च शिक्षा की प्राप्ति के लिए वे बग़दाद गए और वहीं पर बस गए, मृत्यु के बाद उन्हें वहीं दफ़्न किया गया। वे अपने जीवनकाल में ही एक महत्वपूर्ण विद्वान के रूप में पहचाने जने लगे थे और अपने समकालीन विद्वानों जैसे कि अबू रेहान बेरूनी के साथ वैज्ञानिक विचारों का आदान प्रदान करते थे। जब अबू रेहान ख़्वारज़्म में थे और अबुलवफ़ा बग़दाद में थे, तो उन्होंने चांद ग्रहण का अध्ययन करके अपने अपने अध्ययनों के निष्कर्षों की तुलना की। अबुलवफ़ा ने अक़लीदस, ख़्वारेज़्मी, दयोफ़ान्ट और बतलीमूस जैसे विभिन्न ईरानी और यूनानी बुद्धिजीवियों की रचनाओं की व्याख्या की है और ख़ुद भी ज्यामिति में नए नए शोध किए हैं।

 

 

अबुलवफ़ा के प्रयासों के सम्मान के लिए चंद्रमा की एक सतह का नाम उनके नाम पर रखा गया है। 388 हिजरी क़मरी में बग़दाद में उनका निधन हो गया।

 

अबुल वफ़ा का जीवन गणित के विकास के तीसरे चरण में गुज़रा है। उनकी रचनाओं में इस दौर के गणित की साफ़ झलक देखी जा सकती है। गणित का विकास विभिन्न चरणों में बिना किसी निरंतरता के होता है। गणित के विकास का पहला चरण, छठी एवं पांचवी शताब्दी ईसा पूर्व से संबंधित है। इस काल को यूनान पूर्व का गणित या जागरूकता पूर्व का काल कहा जाता है। गणित का झुकाव प्रायौगिक की ओर होता है और इसी के साथ पहली परिभाषा सामने आती है। क़रीब समस्त राष्ट्रों ने गणित के इस चरण के विकास में भूमिका निभाई है। गणित के विकास का दूसरा चरण, लगभग 10 शताब्दियों तक जारी रहा और उसका केन्द्र यूनान और उसके बाद अलेक्ज़ेंड्रिया था।

 

 यह चरण सैद्धांतिक झुकाव के लिए जाना जाता है। दूसरे चरण में तार्किक तर्क-वितर्क और निष्कर्ष ने प्रयोग का स्थान ले लिया। गणित के विकास का तीसरा चरण, मध्य शताब्दियों से संबंधित है। वास्तव में गणित के दूसरे चरण का प्रायौगिक की ओर झुकाव ही तीसरा चरण है। यह चरण पहले चरण की तुलना में गणित के विकास के उच्च स्तर पर है। इसमें पूर्व की समस्त उपलब्धियों से लाभ उठाया गया है और तर्क-वितर्क की कमज़ोरियों को दूर किया गया है।

 

तीसरे चरण में सैद्धांतिक आयाम को समृद्ध बनाया गया है और सबसे ज़्यादा वर्तमान वैज्ञानिक विषयों के समाधान का प्रयास किया गया है। इस चरण में गणित के अध्ययन का असली भार ईरान के मुस्लिम गणितज्ञों के कांधों पर है। यह सिलसिला बनू मूसा और ख़्वारज़मी से शुरू होकर ग़यासुद्दीन जमशेद काशानी पर समाप्त होता है। इससे गणित के विकास के चौथे चरण के लिए भूमि प्रशस्त होती है। इस चरण का झुकाव भी सिद्धांत की ओर है। इस चरण का अधिक विकास यूरोप में हुआ है।

 

ईरान के गणितज्ञ केवल यूनानी गणितज्ञों के अनुवादक और व्याख्याकार नहीं हैं, बल्कि उन्होंने ख़ुद गणित के एक संपूर्ण चरण की स्थापना की है और गणित के सैद्धांतिक आयाम को समृद्ध बनाया है। ईरानी गणितज्ञों ने नई शाख़ाओं और शैलियों की बुनियाद रखी। उन्होंने व्यवहारिक रूझान के साथ अन्य विषयों का भी विकास किया और गणित के अगले चरण के लिए भूमि प्रशस्त की।

 

इतिहासकारों ने दसवीं शताब्दी को इस्लाम का सुनहरा दौर क़रार दिया है। इसलिए कि इस काल में इराक़ और ईरान के बड़े भाग पर आले बूए का शासन था और इस दौर में ज्ञान एवं दर्शन ने काफ़ी प्रगति की। गणित और खगोलशास्त्र ने भी ध्यान योग्य विकास किया था। आले बूए के शासक अज़्दुद्दौलाह ने उच्च स्तर के मदरसों की स्थापना की और दर्शनशास्त्रियों एवं विद्वानों की समितियों का गठन किया।

 

उज़्दुद्दौलाह समस्त विद्वानों, दर्शनशास्त्रियों और धर्मगुरुओं का उनके कार्यों के लिए प्रोत्साहन किया करता था। अरबी भाषा में लिखने के लिए प्रेरित करने के साथ ही वह ईरानी संस्कृति में भी काफ़ी रूची रखता था। आल बूए द्वारा ज्ञान का वातावरण उत्पन्न करने के कारण, अबू सुलेमान मंतक़ी सजिस्तानी, अबू सुहैल कूही, अबुल वफ़ा बूज़जानी जैसे अनेक दर्शनशास्त्रियों ने बग़दाद का रुख़ किया। बग़दाद इस्लामी जगत का एक महत्वपूर्ण केन्द्र था, जिसने एक ईरानी शहर का रूप धारण कर लिया था।

 

आले बूए के सबसे प्रसिद्ध शासक अज़्दुद्दौलाह का आग्रह था कि ज्ञान से आम जीवन को बेहतर बनाने के लिए लाभ उठाया जाना चाहिए। यही कारण है कि इस काल में साइंस और गणित ने प्रगति की और यह प्रगति केवल खोज की जिज्ञासा की संतुष्टि के लिए नहीं थी, बल्कि समाज की स्थिति को बेहतर बनाने के लिए थी। इस काल में ज्ञान और शोध में रूची का अंदाज़ा उस काल के विद्वानों की किताबों की प्रस्तावनाओं से लगाया जा सकता है।

 

इस काल में बग़दाद ज्ञान का एक बड़ा केन्द्र था। बग़दाद में शोधकार्य करने वाले वैज्ञानिकों ने साइंस और व्यवहारिक विषयों पर अधिक ध्यान दिया और उनका विकास किया। कहा जाता है कि अज़्दुद्दौला के समकालीन गणितज्ञ अबुल वफ़ा ने इसी कारण गणित एवं ज्यामिति में दो महत्वपूर्ण किताबें लिखी हैं। अबुल वफ़ा की यह दो किताबें व्यवहारिक गणित के दो अच्छे नमूने हैं। अबुल वफ़ा ने इस क्षेत्र में अन्य लेख भी लिखे हैं। उनमें से एक में उन्होंने दो अलग अलग शैलियों द्वारा बग़दाद से मक्का तक की दूरी का निर्धारण किया है और उसके बाद इस शैली को अन्य शहरों की दूरियां जानने के लिए प्रयोग किया है। अबुल वफ़ा के अन्य लेखों की भांति यह लेख भी गणित के संबंध में इस महान ईरानी विद्वान की योग्यता को ज़ाहिर करता है।

 

अबुल वफ़ा की विभिन्न रचनाएं थीं, जिनमें से कुछ लुप्त हो चुकी हैं, लेकिन उनमें से कुछ का नाम इब्ने नदीम की अलफ़हरिस्त किताब में मौजूद है। इनमें से एक का नाम रंजुल कामिल है। इब्ने नदीम के अनुसार, इस किताब में तीन लेख हैं। पहला लेख उन चीज़ों के बारे में है, जिनका तारों की चाल से पहले ज्ञान प्राप्त करना उचित है, दूसरा लेख तारों की चालों के बारे में है और तीसरे लेख में तारों की चाल के प्रभाव का उल्लेख है।

 

अलमजस्ती गणित और खगोलशास्त्र की एक अन्य महत्वपूर्ण किताब है। उसकी एक प्रति का पैरिस में परिचिय हुआ है। कुछ लोगों का मानना है कि यह वही ज़ीजुल माज़ेह किताब है। यह किताब 360 हिजरी में बग़दाद में अबुल वफ़ा और उनके साथियों के अध्ययनों का परिणाम है। लेकिन अबू रेहान बेरूनी ने कई बार मजस्ती और ज़ीजुल वाज़ेह को एक साथ दो किताबें के रूप में पेश किया है। अबुल वफ़ा ने अलमजस्ती की प्रस्तावना में उल्लेख किया है कि उन्होंने ज्यामिति मामलों को साबित करने के लिए ज्यामिति शैली और अंकों के मामलों में अंकों के तर्क से लाभ उठाया है, ताकि जो लोग अन्य विषयों में दक्ष नहीं हैं, उन्हें कोई कठिनाई न हो। इस किताब के बारे में ध्यान योग्य बिंदु यह है कि यद्यपि अलमजस्ती विशेष किताब है, लेकिन अबुल वफ़ा ने उसे बहुत आसान भाषा में लिखा है।