Jun ११, २०१६ ०९:३२ Asia/Kolkata

शैख़ शहाबुद्दीन अबूलफत्ह यहिया बिन हबश वह ईरानी विद्वान हैं जिन्होंने दर्शनशास्त्र, हिकमत और परिज्ञान को विस्तृत किया और उन्होंने इस्लामी दर्शनशास्त्र की एक महत्वपूर्ण शाखा “इश्राक़” की बुनियाद रखी।

शैख़ शहाबुद्दीन अबूलफत्ह यहिया बिन हबश वह ईरानी विद्वान हैं जिन्होंने दर्शनशास्त्र, हिकमत और परिज्ञान को विस्तृत किया और उन्होंने इस्लामी दर्शनशास्त्र की एक महत्वपूर्ण शाखा “इश्राक़” की बुनियाद रखी। इस्लामी दर्शनशास्त्र इश्राक़ फलसफ़े इश्राक़ के नाम से प्रसिद्ध है। आशा है कि हमारा आज का प्रयास भी आपको पसंद आयेगा।

 

          

शहाबुद्दीन सोहरावर्दी दर्शनशास्त्री, आत्म ज्ञानी और इस्लामी दर्शनशास्त्र “इश्राक़” की आधारशिला रखने वाले हैं। वह ईरान के ज़न्जान प्रांत के सोहरावर्द नामक गांव में पैदा हुए थे। जीवनी लेखकों ने उनका पूरा नाम अबूल फुतूह शहाबुद्दीन यहिया बिन हबश बिन अमीरक और उनकी उपाधि शैख इश्राक़, शैख शहीद और शैख मक़तूल लिखा है जबकि कुछ जीवनी लेखकों ने उनका नाम उमर लिखा है। अध्ययनकर्ताओं का मानना है कि जिन लोगों ने उनका नाम उमर लिखा है वे शहाबुद्दीन अबूल हफ्स उमर सोहरावर्दी को शेख़ शहाबुद्दीन सोहरावर्दी समझ बैठे। यहां इस बात का उल्लेख आवश्यक है कि शहाबुद्दीन अबूल हफ्स उमर सोहरावर्दी सातवीं हिजरी क़मरी शताब्दी के आत्मज्ञानी और विद्वान और अवारिफुल मआरिफ़ किताब के लेखक हैं जबकि शेख़ शहाबुद्दीन सोहरावर्दी 6ठीं हिजरी क़मरी के आत्मज्ञानी, दर्शनशास्त्री और विद्वान हैं।

 

शहाबुद्दीन सोहरावर्दी के जन्म की तारीख़ के बारे में जीवनी लेखकों के मध्य मतभेद है। शैख़ शहाबुद्दीन सोहरावर्दी का जन्म लगभग 545 हिजरी क़मरी से 550 के मध्य होना चाहिये परंतु सैयद हुसैन नस्र और हेनरी कॉर्बिन जैसे अधिकांश समकालीन अध्ययनकर्ताओं ने उनके जन्म को लगभग 549 हिजरी क़मरी बताया है।

 

शैख़ शहाबुद्दीन सोहरावर्दी के संक्षिप्त जीवन को तीन भागों में बांटा जा सकता है। उनके जीवन का पहला दौर सोहरावर्द में रहने का समय है जिसमें उनके बचपने का समय भी शामिल है। जीवनी लिखने वालों ने शैख़ शहाबुद्दीन सोहरावर्दी के इस समय के जीवन के बारे में अधिक जानकारी नहीं दी है। इसी कारण यह स्पष्ट नहीं है कि वह अपने जन्म स्थान पर किस प्रकार पले- बढ़े और किस प्रकार शिक्षा ग्रहण की और हम केवल इतना जानते हैं कि आरंभिक शिक्षा उन्होंने सोहरावर्द में ही प्राप्त की और वहां के मदरसे के मालिक शैख़ अब्दुर्रहमान के समस्त ज्ञानों को उम्र कम होने के बावजूद वहीं अर्जित किया और वह अपने सहपाठियों में सबसे आगे थे।

 

 सोहरावर्दी, सोहरावर्द के बाद ज्ञान अर्जित करने के लिए मराग़े गये और मज्दुद्दीन जैली के पास तत्वदर्शिता और हिकमत का ज्ञान अर्जित करना आरंभ किया और मानो उसी समय था जब अपने दोस्तों और शिष्यों के कहने पर “अत्तन्क़ीहात फ़ी उसूलिल फ़िक़्ह” नामक किताब लिखी।

 

“अल्लामेअ फ़िश शक्लिर र्राबेअ” पुस्तक के लेखक मज्दुद्दीन जैली धर्मशास्त्र और दर्शनशास्त्र के महान विद्वान थे और इमाम फ़ख़्रे राज़ी और 6ठीं और 7वीं हिजरी क़मरी के पवित्र क़ुरआन के महान ईरानी व्याख्याकर्ता इमाम फ़ख्रे राज़ी के उस्ताद थे। इमाम फ़ख़्रे राज़ी ने काफी समय तक मज्दुद्दीन जैली के पास धर्मशास्त्र और तत्वदर्शिता की शिक्षा प्राप्त की और कहा जाता है कि शैख़ शहाबुद्दीन सोहरावर्दी जब मराग़े में थे तो इमाम फ़ख़्रे राज़ी उनके सहपाठी थे। किताबों में इस बात का उल्लेख किया गया है कि इमाम फ़ख़्रे राज़ी दर्शनशास्त्र के बड़े विरोधियों में थे और शैख़ शहाबुद्दीन सोहरावर्दी के साथ कुछ वर्षों तक शिक्षा ग्रहण करने और उनकी मृत्यु के बाद जब शैख़ शहाबुद्दीन सोहरावर्दी की पुस्तक तलवीहात को इमाम फ़ख्रे राज़ी को दी गयी तो उसे उन्होंने चूमा और अपने स्कूल के पुराने साथी की याद में रो पड़े।

 

शैख़ शहाबुद्दीन सोहरावर्दी अपनी शिक्षा को पूरी करने के लिए लगभग 574 हिजरी क़मरी में मराग़े से इस्फहान गये। उन्होंने उमर बिन सहलान सावी की पुस्तक अलबसाएर अन्नसरिया की शिक्षा प्रसिद्ध विद्वान ज़हीरुद्दीन फारसी से ग्रहण किया और यह पुस्तक इब्ने सीना की प्रसिद्ध किताब शिफ़ा का महत्वपूर्ण निचोड़ है। इसी शहर में शैख़ शहाबुद्दीन सोहरावर्दी शैखुर्रइस अबू अली सीना के विचारों से परिचित हुए। कहा जाता है कि शैख़ शहाबुद्दीन सोहरावर्दी ने इब्ने सीना की अत्तैर किताब का फारसी अनुवाद किया और इसी प्रकार बोस्तानुल क़ुलूब और क़िस्तुल ग़ुर्बह अलग़रीब़ा किताब को भी उन्होंने अपने इस्फहान प्रवास के दौरान लिखा।

 

शैख़ शहाबुद्दीन सोहरावर्दी के जीवन का दूसरा दौर दो या तीन वर्षों तक इस्फहान में रहने के बाद और 579 हिजरी क़मरी से पहले यात्रा से आरंभ होता है। वह यात्रा करना बहुत पसंद करते थे और इन्हीं यात्राओं के ज़रिए उन्होंने बहुत से विद्वानों, धर्मगुरूओं और दर्शनशास्त्रियों से भेंट की और उनसे ज्ञान व दर्शनशास्त्र की शिक्षा अर्जित की। कुछ समय तक उनका उठना- बैठना सूफी लोगों के साथ रहा और आत्म शुद्धि में व्यस्त हो गये। वर्ष के अधिकांश दिनों में वह रोज़ा रखते थे और जीवन को कठिनाई में व्यतीत करते थे। कहा जाता है कि आत्म शुद्धि से ही उन्होंने उच्च स्थान प्राप्त किया और असाधारण विशेषताओं के स्वामी बन गये।

 

शैख़ शहाबुद्दीन सोहरावर्दी अपने समय की दूसरी विचार धाराओं से अवगत होने के लिए तुर्की के आनातोली और आज के सीरिया क्षेत्र की यात्रा की। वह तुर्की के मारदीन शहर में फ़ख्रुद्दीन अबू अब्दुल्लाह मोहम्मद बिन अब्दुस्सलाम मारदीनी से परिचित हुए और यह परिचय दोनों में गहरी दोस्ती में बदला गया। शैख़ शहाबुद्दीन सोहरावर्दी मारदीनी के सामने पढ़ते और फिर दोनों में बहस शुरू हो जाती थी। मारदीनी दर्शनशास्त्र की कुछ किताबों को मश्शाई विचार धारा के पक्षधर ये मारदीनी सदैव शैख़ शहाबुद्दीन सोहरावर्दी के ज्ञान का लोहा मानते थे।

 

इसी बहस और वार्ता का परिणाम था कि मारदीनी ने शैख़ शहाबुद्दीन सोहरावर्दी की हत्या की भविष्यवाणी की थी। मारदीनी विभिन्न ज्ञानों में अपने समय में विशेषकर दर्शनशास्त्र, शब्दकोष और चिकित्सा में प्रसिद्ध थे। मारदीनी अपने समय के मश्शाई विचारधारा के गिने- चुने दर्शनशास्त्री और शैख़ शहाबुद्दीन सोहरावर्दी के अंतिम गुरू थे। वह दर्शनशास्त्र में हकीम हमदानी और चिकित्सा में इब्ने तिलमिज़ बग़दादी के शिष्य थे। शैख़ शहाबुद्दीन सोहरावर्दी 578 हिजरी क़मरी तक मारदीन में फ़ख्रुद्दीन मारदीनी के साथ दोस्त थे और उसके पश्चात 579 में वर्तमान सीरिया के हलब क्षेत्र में पहुंचे। शैख़ शहाबुद्दीन सोहरावर्दी के हलब पहुंचने के बाद उनके जीवन का दूसरा दौर भी समाप्त हो गया। उस समय उनकी उम्र लगभग 30 वर्ष थी। उस समय उन्होंने “अलमुशारेअ  व अलमुतारेहात”नामक किताब लिखी और 582 हिजरी कमरी में उसी नगर में दर्शनशास्त्र के विषय में अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “हिकमतुल इश्राक़” को पूरा किया। शैख़ शहाबुद्दीन सोहरावर्दी इसी दौर में और 584- 585 में हिकमतुल इश्राक़ किताब लिखने के कारण जो ख्याति मिली थी उसके कारण उन्हें सलजूक़ी शासकों का समर्थन प्राप्त हो गया और उन्होंने तूक़ात और खिर्त- पिर्त क्षेत्रों की यात्रा की और सलजूकी शासकों के पास रहने के समय “परतूनामा” और अलवाहे एमादी नाम की दो किताबें लिखीं और पहली को रुक्नुद्दीन सुलैमान और दूसरी को एमादुद्दीन अबू बकर को भेंट की।

 

शैख़ शहाबुद्दीन सोहरावर्दी अपने जीवन के अंतिम समय में वर्तमान सीरिया के हलब नगर में पहुंचने के बाद पहले हलाविया मदरसे और उसके बाद नूरिया मदरसे में प्रविष्ट हुए और हंबली धर्मशास्त्रियों के साथ बहस की और उन सब पर हावी हो ।

उनके इस कार्य से उनकी ख्याति न सिर्फ़ नगर बल्कि  दरबार तक पहुंच गयी। सलाहुद्दीन अय्यूबी के बेटे मलिक ज़ाहिर ने उन्हें दरबार बुलाया और उन्हें अपने सलाहकारों की पहली पंक्ति में क़रार दिया।

 

शेख़ शहाबुद्दीन सोहरावर्दी बहुत ही बुद्धिमान, महान विद्वान, दर्शनशास्त्र में दूसरों के दृष्टिकोणों को स्वीकार करने और इसी प्रकार रहस्यों आदि ज्ञानों को जानने के लिए उनका रुझान, मलिक ज़ाहिर के दरबार के धर्मशास्त्रियों और विद्वानों की उनसे शत्रुता और ईर्ष्या का कारण बना। इन विद्वानों और धर्मशास्त्रियों ने शेख़ शहाबुद्दीन सोहरावर्दी को रास्ते से हटाने के लिए शस्त्रार्थ की सभायें की और शेख़ शहाबुद्दीन सोहरावर्दी पर काफिर होने का आरोप लगाया और मलिक ज़ाहिर से मांग की कि धर्म विरोधी आस्था होने के कारण शेख़ शहाबुद्दीन सोहरावर्दी की हत्या कर दी जाये। मलिक ज़ाहिर ने उन लोगों की यह मांग स्वीकार नहीं की। इसके बाद धर्मशास्त्रियों ने एक पत्र लिखा और उन सबने उस पर हस्ताक्षर करके उसे सलाहुद्दीन अय्यूबी के पास भेज दिया। सलाहुद्दीन ने उस समय वही ताज़ा सीरिया को सलीबियों के कब़्ज़े से मुक्त कराया था और अपने विश्वास व भरोसे की सुरक्षा के लिए उसे धर्मगुरूओं के समर्थन की आवश्यकता थी इसलिए उसने शेख़ शहाबुद्दीन सोहरावर्दी को मृत्यु दंड देने पर आधारित उनकी मांग को स्वीकार कर लिया और अपने बेटे मलिक ज़ाहिर को शेख़ शहाबुद्दीन सोहरावर्दी की हत्या का आदेश दिया। मलिक ज़ाहिर दिल से न चाहते हुए भी अपने बाप की बात स्वीकार कर ली। उसने 587 हिजरी कमरी में शेख़ शहाबुद्दीन सोहरावर्दी को जेल में डाल दिया। इब्ने शददाद के अनुसार 587 हिजरी क़मरी में ज़िलहिज्जा महीने के अंतिम शुक्रवार को नमाज़ के बाद शेख़ शहाबुद्दीन सोहरावर्दी के शव को जेल से बाहर निकाला गया।