तकफ़ीरी आतंकवाद-13
राजनैतिक सलफ़ीवाद, सलफ़ीवाद की चौथी क़िस्म है।
राजनैतिक सलफ़ीवाद, सलफ़ीवाद की चौथी क़िस्म है। राजनैतिक सलफ़ीवाद की परिभाषा सलफ़ीवाद की अन्य क़िस्मों की तुलना में अधिक कठिन है। क्योंकि एक ओर अनेक सलफ़ी विचारधाराएं वैचारिक लक्ष्यों के साथ राजनैतिक लक्ष्य साधने की कोशिश में हैं तो दूसरी ओर पश्चिम हर उस इस्लामी आंदोलन को राजनैतिक सलफ़ीवाद का नाम देता है जिसमें धर्म और राजनीति को एक दूसरे का अभिन्न अंग माना जाता है। इस दृष्टिकोण के तहत, रूढ़ीवाद और राजनैतिक इस्लाम जैसे शब्द को इस अर्थ में पेश किया जाता है।
पश्चिम में मौदूदी की जमाअते इस्लामी पार्टी को राजनैतिक सलफ़ी पार्टी के रूप में पहचाना जाता है हालांकि उसमें सलफ़ीवाद के आम विचार मौजूद नहीं हैं। कभी ईरान की इस्लामी क्रान्ति को सलफ़ी क्रान्ति या राजनैतिक सलफ़ीवाद के समतुल्य रूढ़ीवादी क्रान्ति कहा जाता है।
कुल मिलाकर राजनैतिक सलफ़ीवाद की परिभाषा में यह कहा जा सकता है कि यह ऐसा सलफ़ीवाद है जो वैचारिक लक्ष्यों के साथ-साथ ज़्यादातर राजनैतिक हित साधने और सत्ता हासिल करने के प्रयास में है। इस अर्थ में राजनैतिक सलफ़ीवाद के अनेक उदाहरण मौजूद हैं। कुछ सलफ़ी गुट प्रजातांत्रिक शैलियों से अपने वैचारिक लक्ष्य साधना चाहते हैं। जैसे पाकिस्तान में जमईयते उलमाए इस्लाम पार्टी। यह पार्टी पाकिस्तान में महत्वपूर्ण केन्द्रों और चुनावों में उपस्थिति के ज़रिए अधिक से अधिक सीटें हासिल करना चाहती है ताकि इस प्रकार पाकिस्तान में अपनी पैठ बढ़ाए। कुछ दूसरी सलफ़ी विचारधाराएं जैसे नवीन वहाबियत धार्मिक उद्देश्य से ज़्यादा, सत्ता पर क़ब्ज़े की कोशिश में है। इसकी मिसाल सऊदी अरब की राजशाही व्यवस्था है कि जिसका पश्चिम के साथ संबंध है।
सुधारवादी सलफ़ीवाद, सलफ़ीवाद की पांचवीं क़िस्म है जो अर्थ और शैली की नज़र से सलफ़ीवाद के अन्य प्रकार से भिन्न है। सलफ़ीवाद की यह क़िस्म इस्लामी जगत और मुसलमानों की दयनीय स्थिति पर प्रतिक्रिया के रूप में वजूद में आयी। सुधारवादी सलफ़ीवाद इस सवाल के जवाब में वजूद में आया कि क्यों इस्लामी जगत पिछली शताब्दियों और मौजूदा दौर में पिछड़ गया व कमज़ोर हो गया है जबकि उसका अतीत बहुत उज्जवल था?
सुधारवादी सलफ़ीवाद के अनुयायी इस सवाल के जवाब में, इस्लामी जगत के पिछड़ेपन का कारण इस्लामी शिक्षाओं पर अमल न करना और इस्लामी धरोहर को भुलाना बताते हैं। इस गुट का उद्देश्य मतभेद और सांप्रदायिकता को हवा देना नहीं है बल्कि मुसलमानों के विभिन्न पंथों को एक दूसरे के क़रीब लाना है। इस प्रकार इस गुट को सुधारवादी भी कहा जाता है। सलफ़ियों के इस गुट का उद्देश्य सहाबियों और सहाबियों के अनुयाइयों का पालन नहीं बल्कि इस्लामी आदेश व नियमों का पालन है और साथ ही अपने दौर के हालात के मद्देनज़र बुद्धि का इस्तेमाल करना है।
इसकी मिसाल प्रसिद्ध कवि अल्लामा इक़्बाल है जिन्होंने मुसलमानों से इस्लामी उसूलों का अनुसरण और पश्चिमी संस्कृति से दूरी की अनुशंसा की है। सय्यद जमालुद्दीन असदाबादी ने अनेक इस्लामी देशों का दौरा किया जिसके दौरान विभिन्न इस्लामी पंथों के प्रतिनिधियों से बातचीत की ताकि वे आपस में मतभेद को दूर करें और साम्राज्य के ख़िलाफ़ एकजुट हो जाएं। उनके छात्र मोहम्मद अब्दोह ने इस्लामी समाज के मार्गदर्शन और इस्लामी समाज के भीतर एकजुटता लाने की शैली अपनायी। उनका मुसलमानों का एक दूसरे को काफ़िर कहने के बारे में यह विचार था कि अगर किसी मुसलमान के काफ़िर होने के बारे में 100 तर्क हों और इसके विपरीत उसके मुसलमान होने के बारे में एक तर्क हो तब भी उसे काफ़िर नहीं कहना चाहिए।
अलअज़हर विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति शैख़ महमूद शलतूत ने इस यूनिवर्सिटी में शीया धर्म को आधिकारिक रूप से पढ़ाए जाने की इजाज़त दिलायी और सुन्नी धर्म के अनुयाइयों के लिए शीया धर्म के अनुसरण को सही बताया।
इन सब सुधारवादियों ने न सिर्फ़ यह कि आम सलफ़ीवाद की तरह मुसलमानों में सांप्रदायिकता और मुसलमान को एक दूसरे मुसलमान की हत्या के लिए उकसाने जैसा काम नहीं बल्कि इस बात की कोशिश की उनके दर्द की दवा और उन्हें उनके संयुक्त दुश्मन अर्थात साम्राज्य के ख़िलाफ़ एकजुट करें। इस बात में शक नहीं कि सलफ़ीवाद का सही अर्थ इस प्रकार के सलफ़ीवाद पर चरितार्थ होता है न कि तकफ़ीरी व सांप्रदायिक विचारधाराओं पर।
सलफ़ीवाद की कोई ठोस व निर्धारित परिभाषा नहीं है और इसके विभिन्न प्रकार हैं जिनमें विरोधाभास मौजूद है। इन विरोधाभासों को साफ़ तौर पर पेश करने की ज़रूरत है ताकि इस्लामी जगत के सामने संगठित दुश्मनी के बारे में भ्रान्ति को दूर किया जा सके। सलफ़ीवाद के वैचारिक आधार के बारे में दूसरा निष्कर्श यह निकाला जा सकता है कि अनेक विचारधाराओं को सलफ़ीवाद के रूप में पहचाना जाता है लेकिन ये सब वैचारिक दृष्टि से आम सलफ़ीवाद की सूचि में नहीं आतीं।
इनमें से अनेक विचारधाराएं अपने वजूद के इतिहास के दौरान, अतिवादी विचारधाराएं बन चुकी हैं और वहाबी सलफ़ीवाद ने उन्हें धार्मिक व राजनैतिक अतिवाद के मार्ग पर लगा दिया है। हालांकि अतीत में कम से कम व्यवहार में ऐसा नहीं था। इसलिए जब सलफ़ीवाद से अभिप्राय कोई पंथ होता है तो इसका अर्थ ज़रूरी नहीं है कि वहाबी सलफ़ीवाद हो बल्कि वैचारिक दृष्टि से आम सलफ़ीवाद के निकट है।
इसी प्रकार सलफ़ी विचारधारा के बारे में अध्ययन से हम इस नतीजे पर पहुंचे कि सलफ़ी विचारधारा की कई शाखाएं हैं जो विभिन्न क्षेत्रों में एक दूसरे के विरुद्ध हैं। जैसा कि भारतीय उपमहाद्वीप और मिस्र में सलफ़ीवाद में यह अंतर पूरी तरह देखा जा सकता है। वहाबी सलफ़ीवाद की विभिन्न विचारधाराओं में आस्था और राजनीति के संबंध में गहरे मतभेद के बावजूद, इन विचारधाराओं को एक नेतृत्व के तहत लाने की कोशिश कर रहे हैं। आज वहाबियत ख़ुद को समकालीन सलफ़ीवाद की विभिन्न विचारधाराओं का अगुआ मानती है और वह प्रचारिक व वित्तीय क्षमताओं और काबे तथा मस्जिदुन नबी के संचालन को अपने हाथ में लेने जैसी स्थिति से फ़ायदा उठाते हुए सलफ़ीवाद की विचारधाराओं का नेतृत्व अपने हाथ में लेने की पूरी कोशिश कर रही है और इसे अपने हित साधने के लिए इस्तेमाल कर रही है। जबकि सलफ़ीवाद के नाम पर मौजूद अनेक विचारधाराओं का आधार, वहाबी सलफ़ीवाद से भिन्न है और उससे विरोधाभास रखता है।
अर्थात सलफ़ीवाद की भौगोलिक दृष्टि से अलग अलग क्षेत्रों में उसकी उत्पत्ति के मद्देनज़र उसके स्वरूप के बारे में बताने जा रहे हैं। इस बात में शक नहीं कि हर क्षेत्र की सामाजिक वैचारिक व राजनैतिक स्थिति का उस क्षेत्र में सलफ़ीवाद के वजूद लेने में प्रभावी रोल रहा है। इस भौगोलिक स्थिति के कारण सलफ़ीवाद का एक आम अर्थ व संगठित रूप नहीं है और जिस विशेष क्षेत्र में सलफ़ीवाद विकसित हुआ है उसके मद्देनज़र उसमें विभिन्न धाराएं हों। इस दृष्टि से जिन क्षेत्रों में सलफ़ीवाद सक्रिय है और विभिन्न शैलियों में वहां के वैचारिक, सामाजिक व राजनैतिक मंचों पर प्रभाव डालने की कोशिश कर रहा है, समीक्षा करेंगे। भारतीय उपमहाद्वीप इस्लामी जगत के वैचारिक व सामाजिक ध्रुवों में से एक है। अगर अतीत में मिस्र इस्लामी विचारों का पालना था तो भारतीय उपहाद्वीप भी लंबे समय से सुधारवादी या अतिवादी विचारों की उत्पत्ति एवं परिवर्तन का केन्द्र रहा है। भारतीय उपमहाद्वीप का राजनैतिक, सामाजिक व धार्मिक वातावरण और ख़ास तौर पर इसके विभाजन के बाद पाकिस्तान, इस्लाम धर्म के विभिन्न पंथों के आपस में टकराव का स्रोत बन गया है और टकरा की यह स्थिति इस हद तक ख़तरनाक हो गयी है कि विभिन्न पंथ एक दूसरे को अधर्मी क़रार देते हैं यही कारण है कि इस क्षेत्र को सलफ़ीवाद अपने लिए स्वर्ग समझते हैं। इस वातावरण से सबसे ज़्यादा सऊदी अरब के चरमपंथी सलफ़ीवाद ने फ़ायदा उठाया और वह इस क्षेत्र में मौजूद सलफ़ी विचारधाराओं को एक दूसरे के निकट लाने की कोशिश के साथ इसे हथकंडे के तौर पर इस्तेमाल कर रहा है।