Jun १९, २०१६ ११:४४ Asia/Kolkata

आपको यह बताया था कि शहाबुद्दीन सोहरावर्दी बहुत बड़े दर्शनशास्त्री आत्मज्ञानी व इशराक़ी दर्शनशास्त्र के संस्थापक हैं।

आपको यह बताया था कि शहाबुद्दीन सोहरावर्दी बहुत बड़े दर्शनशास्त्री आत्मज्ञानी व इशराक़ी दर्शनशास्त्र के संस्थापक हैं। उनका जन्म 549 हिजरी क़मरी में ज़न्जान के निकट सोहरवर्द नामक गावं में हुआ था। इसी प्रकार यह भी आपको बताया कि उनकी ज़िन्दगी कम थी किन्तु उन्होंने इस छोटी सी ज़िन्दगी ज्ञान की प्राप्ति में बितायी। उन्होंने उस समय ज्ञान विज्ञान के केन्द्र के रूप में मशहूर मराग़ा, इस्फ़हान, अनातोली और हलब के मशहूर शिक्षकों से ज्ञान हासिल किया।

सोहरावर्दी अपनी किताब हिकमतुल इशराक़ और हलब के हंबली मत के धर्मशास्त्रियों से शास्त्रार्थ के ज़रिए मशहूर हुए। इस प्रकार वह सलजूक़ी शासन के दरबार तक पहुंचे। धर्मगुरुओं की उनसे दुश्मनी के कारण उनको धर्म से निकलने का दोषी ठहराया गया। तत्कालीन शासक सलाहुद्दीन अय्यूबी ने अपने बेटे मलिक ज़ाहिर को सोहरावर्दी को क़त्ल करने का आदेश दिया। किन्तु मलिक ज़ाहिर ने उन्हें क़त्ल करने में टाल मटोल की। हलब के धर्मगुरुओं ने जब देखा कि सोहरवार्दी के क़त्ल का आदेश लागू नहीं हो रहा है तो उन्होंने दोबारा सलाहुद्दीन अय्यूबी को ख़त लिखा कि “अगर मलिक ज़ाहिर ने शहाबुद्दीन को अपने पास रखा तो उनकी भी आस्था ख़राब हो जाएगी और अगर उनको निकाल दिया तो वह जहां जाएंगे वहां पथभ्रष्टता व गुमराही फैलाएंगे।”

दूसरी बार सलाहुद्दीन ने ख़त में अपने बेटे को धमकी दी कि अगर उसने शहाबुद्दीन के क़त्ल में टाल मटोल की तो हलब का अधिकार उससे छीन लिया जाएगा। सोहरावर्दी को 587 हिजरी क़मरी में क़त्ल कर दिया गया।

 

शहीद मुतह्हरी का मानना है कि सोहरावर्दी धर्मगुरुओं से शास्त्रार्थ में न सिर्फ़ यह कि असावधान रहते बल्कि लोगों को अपने ख़िलाफ़ दुश्मन बनाते। तत्वदर्शी रहस्यों को ज़ाहिर करते वक़्त भी सावधानी नहीं बरतते थे इसी कारण उनके ख़िलाफ़ षड्यंत्र रचे गए।        

 

सोहरावर्दी के सबसे निकटवर्ती शिष्य शहरज़ूरी के अनुसार, सोहरावर्दी के क़त्ल के बारे में अलग अलग बातें कही जाती हैं। कुछ लोगों का विचार है कि उन्हें जेल में बिना खाना पानी के इतने दिनों तक रखा गया कि उनकी मौत हो गयी। कुछ लोगों का विचार है कि उन्होंने ख़ुद से खाना पानी इतने दिनों तक छोड़ रखा था कि ख़ुद ही उनकी मौत हो गयी।

कुछ लोगों का मानना है कि गला घोंट कर उन्हें मारा गया। कुछ लोगों का मानना है कि उन्हें तलवार से क़त्ल किया गया। कुछ लोगों का यह मानना है कि उन्हें क़िले की छत से फेंक कर जला दिया गया। कहा जाता है कि मलिक ज़ाहिर सोहरावर्दी की हत्या कराने के बाद बहुत पछताया। उसने आदेश दिया कि जिन लोगों ने उनकी हत्या का फ़त्वा दिया था उन्हें देशनिकाला दिया जाए और उनकी संपत्ति ज़ब्त कर ली जाए।

 

शोधकर्ताओं का कहना है कि सोहरावर्दी की मौत भी उनकी ज़िन्दगी की तरह रहस्यमय है। कुछ किताबों के सिवा कोई दूसरी चीज़ नहीं है जिससे उनकी ज़िन्दगी के बारे में पता चले। शहरज़ूरी ने जो सोहरावर्दी के इशराक़ी मत के अनुयायी हैं, उनके बारे में लिखते हैं, “वह संतों की तरह रहते थे। अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण के लिए बहुत तपस्या करते थे। ऐसी तपस्या जिसे आम आदमी नहीं कर पाता था। वह हफ़्ते में एक बार खाना खाते वह भी बहुत कम मात्रा में। भूखे रहना, जागना और परलोक के बारे में चिंतन मनन ही उनकी उपासना थी। संगीत बहुत पसंद था। वह चमत्कारी व्यक्तित्व के स्वामी थे।”

 

सोहरावर्दी के दौर की यह परंपरा थी कि अगर किसी ने कोई नई बात पेश की तो उसे देशनिकाला या शहर निकाला दे दिया जाता या उसके नास्तिक होने का फ़त्वा दिया जाता। ईरान के ज़्यादातर बुद्धिजीवियों व दार्शनिकों के साथ ऐसा ही हुआ। इब्ने सीना को कुछ लोग नास्तिक व पथभ्रष्ट कहते थे। कुछ शोधकर्ताओं ने सोहरावर्दी की हत्या के कारण का पता लगाने की कोशिश की है। कुछ लोगों ने उन्हें एक प्रकार के राष्ट्रवाद का समर्थक कहते हुए उन्हें शऊबिया गुट का सदस्य कहा है और इसी रुझान को उनकी हत्या का कारण बताया है। इस दृष्टिकोण को बहुत से विचारकों ने रद्द किया है।

 

शहाबुद्दीन सोहरावर्दी के संबंध में एक महत्वपूर्ण बिन्दु यह है कि वह जिस दौर में थे वह दौर इस्माइली संप्रदाय की सक्रियता व प्रचार का दौर था। उस समय इस्माइली संप्रदाय के दो बहुत मशहूर व हंगामा खड़ा करने वाले शासक गुज़रे हैं। उनमें से एक का नाम हसन द्वितीय है जिसने इस्लामी शरीआ को रद्द करने का एलान किया था। दूसरे शासक का नाम नूरुद्दीन मोहम्मद द्वितीय है जिन्होंने दर्शनशास्त्र के आधार पर इस्माइलियों की आस्था की बुनियाद रखी थी।

 

कुछ शोधकर्ताओं ने यह संभावना जतायी है कि है कि सोहरावर्दी जैसे बुद्धिमान व जिज्ञासू जवान जिन्हें सत्य की खोज थी, मराग़े से क़ज़वीन, रय, इस्फ़हान, मारदीन और हलब शहरों के सफ़र में इस्माइली प्रचारकों से जान पहचान बना ली होगी क्योंकि ये सब शहर उस समय इस्माइलियों की गतिविधियों के केन्द्र थे।

 

सोहरवार्दी ने अपनी छोटी उम्र में लगभग 50 किताबें व लेख लिखे जिनमें से कुछ अभी भी नहीं छपे हैं। उनके बारे में सबसे अहम शोध कार्ल ब्रोकलमैन, प्रोफ़ेसर लुइस मसाइनन, हेनरी कॉर्बिन और सय्यद हुसैन नस्र ने अंजाम दिया। सोहरावर्दी की किताब के बारे में जो अहम व्याख्याएं लिखी गयीं वे दो हैं और दोनों ही व्याख्याएं हिकमतुल इशराक़ के बारे में लिखी गयीं। पहली व्याख्या उनके शिष्य शमसुद्दीन शहरज़ूरी ने और दूसरी व्याख्या क़ुतुबुद्दीन शीराज़ी ने लिखी जिस पर हाशिया सदरुद्दीन शीराज़ी ने लिखा। 

 

साहित्यकारों व लेखकों ने सोहरावर्दी की लेखन शैली की हमेशा तारीफ़ की है। फ़ारसी गद्य में अनोखी वाक्यशैली उनकी विशेषता है जबकि अरबी की भाषा परिपक्व है जिसकी शोभा आयतों व हदीसों के हवाले से और बढ़ जाती है। सोहरावर्दी की फ़ारसी किताबों में संशोधन करने वाले डॉक्टर सय्यद हसन नस्र का मानना है कि सोहरावर्दी की किताबें ईरानी साहित्य के इतिहास में दर्शनशास्त्र की गद्य रचनाओं का बेहतरीन नमूना हैं। डॉक्टर नस्र का मानना है,“शायद यह कह सकते हैं कि फ़ारसी गद्य के 1000 साल के इतिहास में किसी ने इतनी प्रवाहित भाषा में दार्शनिक विचारों को पेश नहीं किया है।”

 

सोहरावर्दी की फ़ारसी रचनाओं के विषय मिलते जुलते नहीं हैं। जैसे ‘परतोनामे’,‘हैकलुन नूर’ और ‘अलवाहे एमादी’ दर्शनशास्त्र के सिद्धांत के बारे में है और इसमें बू अली सीना के मशाई मत का ज़्यादातर अनुसरण किया गया है। जबकि आत्मा और ईश्वर के संदर्भ में सिर्फ़ और सिर्फ़ इशराक़ी मत पर चर्चा की है।

 

सोहरावर्दी ने आत्मज्ञान से संबंधित लघु कहानियां भी लिखी हैं। उनकी इन कहानियों का उद्देश्य आत्मज्ञान व दर्शनशास्त्र की शिक्षा देना नहीं है बल्कि पाठक का ध्यान कहानी में उस विशेष स्थिति की ओर खींचना हैं जिसके ज़रिए वह उस व्यक्ति के जीवन की सच्चाइयों के निकट हो सकता है जो इशराक़ी सिद्धांतों के अनुसार ज़िन्दगी गुज़ारता है।