तीन तलाक़ें
हालिया कुछ समय से तीन तलाक़ का विषय सुर्खियों में है और यह मुद्दा भारतीय सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है।
तलाक़ एक दुखद घटना होती है और इसे वह जायज़ क़दम कहा जाता है जो जायज़ होन के बावजूद अप्रिय है। तलाक़ के बहुत अधिक नकारात्मक परिणाम सामने आते रहे हैं अतः हमेशा यह कोशिश की जाती है कि तलाक़ के इच्छुक जोड़े को समझाया बुझाया जाए और तलाक़ के फ़ैसले को बदलवाया जाए। तलाक़ मजबूरी में ही दिया जाना चाहिए। तलाक़ की बहस में एक तीन तलाक़ों का विषय है। यदि किसी पति ने अपनी पत्नी को तीन तलाक़ें दे दीं तो अब वह महिला उस पुरुष के लिए हराम हो जाती है अर्थात पुनः उसकी पत्नी नहीं बन सकती। यदि वह पुरुष और महिला पुनः शादी करना चाहते हैं तो इसके लिए ज़रूरी होगा महिला पहले किसी अन्य पुरुष से शाही करे और उसके साथ रहे तथा बाद मे उससे तलाक़ लेकर अपने पूर्व पति से पुनः निकाह कर सकती है। अन्य पुरुष से शादी वाले प्रावधान को हलाला कहा जाता है।
यह स्थिति एक तलाक़ में नहीं होती। अर्थात यदि पहला तलाक़ दिया गया है तो पति और पत्नी निर्धारित समय के भीतर जिसे इद्दत कहा जाता है यदि चाहें तो पुनः अपना संयुक्त जीवन शुरू कर सकते हैं और उन्हें निकाह करने की भी ज़रूरत नहीं पड़ेगी और यदि वह अवधि बीत चुकी है तो संयुक्त जीवन में वापस आने के लिए उन्हें निकाह करना होगा। संयुक्त जीवन की बहाली में रुकावट तीन तलाक़ों के बाद उत्पन्न होती है। तीन तलाक़ें हो जातने के बाद हलाला ज़रूरी हो जाता है।
मुस्लिम मतों के बीच मतभेद इस विषय के बारे में है कि तीन तलाक़ें किस प्रकार होती हैं। शीया सुन्नी सुमदायों के बीच मतभेद के अलावा ख़ुद सुन्नी समुदाय में भी अलग अलग मतों के बीच मतभेद पाया जाता है। एक मत कहता है कि यदि किसी व्यक्ति ने एक ही बार में तीन बार तलाक़ तलाक़ तलाक़ कह दिया। उसने चाहे एसा काम ग़ुस्से में ही क्यों न किया हो तो तीन तलाकें हो गईं और अब हलाला के बिना पति पत्नि संयुक्त जीवन की ओर नहीं लौट सकते।