Jul १०, २०१६ ०५:३३ Asia/Kolkata

शैख़ शहाबुद्दीन अबुल फ़ूतूह यहिया बिन हबश सोहरवर्दी, शैख़ुल इशराक़ के नाम से प्रसिद्ध एक दर्शनशास्त्री, परिज्ञानी और तत्वदर्शी हैं।

उनका संबंध छठी शाब्दी हिजरी क़मरी अर्थात 12 वीं शताब्दी ईसवी से है। आज के कार्यक्रम में हम उनके दर्श, उनकी जीवनी, उनकी पुस्तकों और दर्शनशास्त्र के उनके दृष्टिकोणों से अवगत होंगे। सोहरेवर्दी ने इस्लामी परिज्ञान, दर्शनशास्त्र और तत्वदर्शिता को विस्तृत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। वह दर्शनशास्त्र के एक मत अर्थात फ़लसफ़ये इशराक़ के संस्थापक हैं।

 

हमने बताया कि प्रसिद्ध दर्शनशास्त्री, परिज्ञन और फ़लसफ़ये इशराक़ के संस्थापक शैख़ शहाबुद्दीन सोहरवर्दी का सन 549 हिजरी क़मरी में ईरान के ज़ंजान क्षेत्र के एक गांव सोहरवर्द में जन्म हुआ और 38 वर्ष की आयु में 587 हिजरी क़मरी में हलब के धर्मशास्त्रियों के षड्यंत्रों के कारण सलाहुद्दीन अय्यूबी के आदेश पर वे मार दिए गये। उन्होंने अपनी छोटी उम्र में बहुत महान कार्य किए।  उन्होंने इस अल्पावधि में 50 पुस्तक पुस्तिकाएं लीखे हैं जो यादगार स्वरूप अब भी बाक़ी हैं।

 

 उनकी पुस्तकों और रचनाओं में एक प्रकार की वाकपटुता और मज़बूत पद्य शामिल होता है और यह ईरान के साहित्यिक इतिहास के समस्त चरणों में दर्शनशास्त्र के बेहतरीन पद्य के नमूने समझे जाते हैं।  डाक्टर सैयद हुसैन नस्र के अनुसार, फ़ार्सी पद्य के हज़ार वर्षीय इतिहास में शायद ही किसी ने इतनी सूक्ष्मता और धारा प्रवाह भापा के साथ दर्शनशास्त्र के मुद्दे पर चर्चा की है। सोहरवर्दी की महत्वपूर्ण पुस्तकें इस प्रकार हैं। हिकमतुल इशराक़, तलवीहात, मुक़ावेमात, मशारेअ व मुतारेहात, परना नामे, हयाकेलुन्नूर, अलवाह एमादी, रेसालये तैर, आवाज़े परे जिब्राइल, अक़ले सुर्ख़, रूज़ी बा जमाअते सूफ़ियान, रिसाला फ़ी हालत तूफ़ूलिया, रेसाला फ़ी हक़ीक़तुल इश्क़ और वारेदात व तक़दीसात। इन पुस्तकों में से कुछ फ़ारसी भाषा में है जबकि कुछ को अरबी में लिखा गया है।

 

 

शैख़ शेहाबुद्दीन सोहरवर्दी को शैख़ुल इशराक़ भी कहा जाता है क्योंकि उन्होंने जिस शैली का आधार रखा वह इशराक़ की शैली थी और उनका दर्शन इशराक़ के दर्शन के रूप में प्रसिद्ध हो गया। फ़लसफ़ये इशराक़ में अस्तित्व या वजूद पर इस प्रकार चर्चा की जाती है जिसमें बुद्धि और तर्क की शक्ति पर भरोसा नहीं किया जाता बल्कि सिद्ध करने की शैली दिल के सैर व सलूक या अध्यात्मिकता की शैली के साथ होती है।

 

 

फ़लसफ़ये इशराक़ उस दर्शनशास्त्र को कहते हैं जिसे सोहरेवर्दी ने अबू अली सीना के फ़लसफ़ये मश्शाई, इस्लामी सूफ़ीवाद, प्राचीन ईरान व यूनान की दर्शनशास्त्र की विचारधाराओं से निकाला है। मुख्य रूप से फ़लसफ़े में तीन पंथ है फ़लसफ़ये इशराक़, फलसफ़ये मश्शाइया और हिकमते मुताआलिया। फ़लसफ़े इशराक़ में तर्क को आधार माना जाता है और बुद्धि की व्यवस्था तथा तर्क की शक्ति को, मांगने वाले व्यक्ति के लिए परिपूर्णता का पहला चरण बताया जाना है।

 

 वास्तव में फ़लसफ़ये इशराक़, वाद शास्त्र और सूफ़ीमत के बीच की चीज़ है। सोहरवर्दी का मानना है कि इशराक़ी दर्शनशास्त्री प्रयास करता है कि जो कुछ वह तर्क या बुद्धि से प्राप्त करता है, उसे भीतरी अनुभव से भी प्राप्त करे। वे केवल तर्क द्वारा प्राप्त दर्शनशास्त्र की शैली को परिणामहीन और आध्यात्मिकता को बिना बुद्धि और तर्क के प्रशिक्षण के पथभ्रष्टता का कारण मानते हैं।

 

 

सरचशमा हाय हिकमते इशराक़ के लेखक समद मुवह्हिद के अनुसार, सोहरवर्दी तीन माध्यमों से ईरान के प्राचीन दर्शनशास्त्र से अवगत हुए। ज़रतुश्तियों से संपर्क के माध्यम से जो उस समय ईरान के क्षेत्रों में फैले हुए थे और उनकी मौखिक शिक्षाओं से लाभ उठाते हुए एक दूसरे से होते हुए उन तक पहुंची या उन पुस्तकों के माध्यम से जिनका अनुवाद पहलवी भाषा से अरबी और फ़ारसी में किया गया और इसी प्रकार ईरान के असली परिज्ञान के माध्यम से।

इन सबके बावजूद सोहरवर्दी ने यूनान के दर्शनशास्त्र की भी अनदेखी नहीं की और सबसे अधिक वह अफ़लातून था Plato प्लेटो और नव अफलातूनवाद से प्रभावित थे और चूंकि उन्होंने अरस्तू या  Aristotle की तर्क की शैली का प्रयोग किया है इस लिए उसे भी उन्होंने प्लेटो और नव अफलातूनवाद की शैली में प्रयोग किया है।

 

डाक्टर सैयद हुसैन नस्र ने अपनी पुस्तक सोहरवर्दी की भूमिका में लिखा कि सोहरवर्दी स्वयं को दो प्राचीन परंपराओं अर्थात यूनानी और ईरानी परंपराओं का वारिस समझते थे और उनके अनुसार, प्लेटो, ज़रतुश्त और ईरान के प्रचीन दर्शनशास्त्री राजा और सुक़रात से पहले के दर्शनशास्त्री,एक वास्तविकता का विवरण करने वाले और एक आध्यात्मिक संदेश के बयान करने वाले थे और सोहरवर्दी स्वयं को उसे  जीवित करने वाला समझते थे।  

 

डाक्टर नस्र ईरान के प्राचीन दर्शनशास्त्र, परिज्ञन और इस्लामी दर्शनशास्त्र के मिश्रण को इशराक़ के दर्शनशास्त्र की महत्वपूर्ण विशेषता मानते हैं। सोहरवर्दी ने अपनी पुस्तकों में जिस विषय पर सबसे अधिक बल दिया है या जिस विषय को सबसे अधिक बयान किया है वे आत्मा का विषय है। सोहरवर्दी ने अन्य दर्शनशास्त्रियों से हटकर आत्मा के विषय पर चर्चा की है अर्थात उनकी दृष्टि में आत्मा, अन्य दर्शनशास्त्रियों की आत्म से भिन्न है। सोहरवर्दी आत्मा या नफ़्स के विषय को प्राकृति के साथ उल्लेख नहीं करते बल्कि इसका उल्लेख वे एकेश्वरवाद को सिद्ध करन के अध्याय में करते हैं।  वे इस  बात की चर्चा करते हैं कि किसी प्रकार इस भौतिक संसार से मनुष्य और उसका शरीर मुक्ति पाता है। उनका दर्शन प्रकाश और अंधकार की वास्तविकताओं पर आधारित है और यही कारण है कि उनके फ़लसफ़े को इशराक़ का नाम दिया गया अर्थात प्रकाशमयी करने वाला।

 

जहां एक ओर इशराक़ का अर्थ है प्रकाश या उजाला वहीं दूसरी ओर इसमें मशरिक़ अर्थात पूरब की भौगोलिक दिशा की ओर संकेत किया गया है चूंकि फ़लसफ़े इशराक़ का एक आधार भौगोलिक परिज्ञान है जिसका अर्थ है पूरब की दुनिया शुद्ध प्रकाश है या ईश्वर के निकट फ़रिश्तों का स्थान है जिसे मिट्टी के बने इंसान नहीं देख सकते। इसी प्रकार फ़लसफ़े इशराक़ में सशर्ण पश्चिम को पूरा अंधकार माना जाना है। सोहरवर्दी चीज़ों की वास्तविकताओं को प्रकाश की संज्ञा देते हैं और उनका कहना है कि प्रकाश की दृष्टि से जो चीज़ कमज़ोर या मज़बूत है, उतनी ही वह भिन्न या अलग है।वह ईश्वर को शुद्ध प्रकाश और पवित्र क़ुरआन को नूरुल अनवार कहते हैं।