Jul १२, २०१६ १२:०१ Asia/Kolkata
  • रविवार - 12 जुलाई

12  जूलाई 1674 में छत्रपति शिवाजी ने ईस्ट इंडिया कंपनी से मैंत्री समझौते पर हस्ताक्षर किये।

12 जूलाई 1489 में दिल्ली के सुल्तान बहलोल खान लोदी की मौत

12  जूलाई 1674 में छत्रपति शिवाजी ने ईस्ट इंडिया कंपनी से मैंत्री समझौते पर हस्ताक्षर किये।

12 जूलाई 1823 में भाप के इंजन से चलने वाला पहला भारतीय जलयान, कोलकता के निकट समुद्र में उतारा गया।

 12 जूलाई 1879 में बुल्गारिया में नेशनल गार्ड्स यूनिट की स्थापना हुई थी

12  जूलाई 1949 में राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ से प्रतिबंध हिंसा से दूरी की शपथ के साथ हटाया गया।

12 जूलाई 1993 में जापान में 7.8 तीव्रता का भूकंप आया था जिसमें 160 लोगों की मौत हो गई

12 जूलाई 2001 में  भारत और बांग्लादेश अगरतल्ला और ढाका के बीच 'मैत्री' बस सेवा प्रारम्भ

 

12 जुलाई सन 711 ईसवी को मुसलमान सेना पति तारिक़ बिन ज़ियाद पहली बार भारी सेना के साथ स्पेन में प्रवाष्ट हुए।विजय के बाद मुसलमान सेना युरोप में फ़्रांस तक आगे बढ़ती चली गई। मोरक्को और स्पेन के बीच स्थित जलडमरु मध्य को पार करके तारिक़ बिन ज़ियाद ने स्पेन में क़दम रखा। यह जलडमरु मध्य एटलांटिक महासागर और भूमध्य सागर के बीच संपर्क मार्ग है। एंडूलशिया को जीतने के बाद जो स्पेन का एक भाग है, मुसलमानों ने 8 शताब्दियों तक इस पर शासन किया। इस दौरान यूरोप में इस्लामी संस्कृति का बड़ा प्रसार हुआ।

 

12 जुलाई सन 1233 ईसवी को मिस्र में इसकंदरिया बंदरगाह को सलीबी सेना की युद्धक नौकाओं ने घेर लिया। उस समय सलीबी युद्ध काल के विख्यात मुस्लिम सेनापति सलाहुद्दीन अय्यूबी इसकंदरिया के शासक थे और शत्रु के आक्रमण के समय वे शहर से बाहर गए हुए थे उनकी वापसी तक मुसलमान सेना ने सलीबी सेनाओं का मुक़ाबला किया और जब सलाहुद्दीन अय्यूबी इस युद्ध में उतरे तो सलीबी सेनाओं की पराजय आरंभ हो गई। सलीबी सेनाओं में हॉलैंड की सेना सबसे आगे थी। उसे भारी क्षति उठानी पड़ी। यहॉ तक कि इसकंदरिया का परिवेष्टन समाप्त कर दिया गया और आक्रमणकारी सेनाओं को पीछे हटना पड़ा।

12 जुलाई सन 1946 ईसवी को अवैध अधिकृत फ़िलिस्तीन के बैतुल मुक़द्दस नगर में स्थित मलिक दाऊद होटल को आतंकवादी ज़ायोनी गुट

एयरगन ने विस्फोट से उड़ा दिया। इस होटल में फ़िलिस्तीनियों का आना जाना बहुत अधिक था इसी प्रकार दूसरे क्षेत्रों से आने वाले अधिकांश यात्री भी इसी होटल में ठहरते थे। इस विस्फोट में दो सौ से अधिक लोग मारे गए। आतंकवादियों ने होटल की भूमिगत मंज़िल में बम रखा था। मारे जाने वालों में पंद्रह यहूदी भी शामिल थे जिससे पता चलता है कि ज़ायोनी अपने वर्चस्ववादी लक्ष्यों की प्राप्ति और फ़िलिस्तीनियों के बीच भय व आतंक का वातावरण उत्पन्न करने के लिए अपने ही सहधर्मियों की जान की भी परवाह नहीं करते।

 

12 जुलाई सन् 2006 को ज़ायोनी शासन की सेना ने एक बार फिर लेबनान पर व्यापक आक्रमण कर दिया। इस्लामी प्रतिरोध आंदोलन हिज़्बुल्लाह द्वारा एक प्रतिरक्षात्मक कार्यवाही में दो इस्राईली सैनिकों का पकड़ा जाना, इस आक्रमण का बहाना बना। वास्तव में इस व्यापक आक्रमण से इस्राईल का मूल लक्ष्य यह था कि अमरीका की सहायता से हिज़्बुल्लाह की शक्ति को क्षीण कर दे और इस प्रतिरोध आंदोलन को हथियार ज़मीन पर रखने हेतु बाध्य कर दे ताकि वह ज़ायोनी शासन की अत्याचारी एवं वर्चस्ववादी नीतियों का मुक़ाबला न कर सके। इस्राईल की सेना ने लेबनान के आधारभूत ढांचे और अर्थव्यवस्था को प्रमुखता से लक्ष्य बनाया ताकि इस देश की जनता हिज़्बुल्लाह का समर्थन करना बंद करदे। इस आक्रमण में ज़ायोनी शासन की वायुसेना ने लगभग 10,000 हवाई हमले किये, इस्राईल के इन पाश्विक हमलों में 1000 से भी अधिक लोग मारे गये, परन्तु लेबनान की जनता ने पहले की भांति बढ़चढ़कर हिज़्बुल्लाह का साथ दिया और उसका भरपूर समर्थन किया। दूसरी ओर ज़ायोनी शासन के आधारभूत ढांचे को हिज़्बुल्लाह के मिज़ाइलों ने सफलतापूर्वक लक्ष्य बनाया जिसके कारण इस शासन को अभूतपूर्व हानि उठानी पड़ी और इस्राईल अपने लक्ष्यों को पाने में पूर्णतः विफल हो गया। इस प्रकार ज़ायोनी शासन के सबसे बड़े समर्थक अमरीका को युद्ध बंदी और इस्राईली सेना के पीछे हटने हेतु सुरक्षा परिषद में लाये गये प्रस्ताव पर सहमति जतानी पड़ी।

 

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22 तीर वर्ष 1295 हिजरी शमसी को महान धर्म गुरू आयतुल्लाह सैय्यद मोहम्मद वहीदी शबिस्त्री का एक शिक्षित परिवार में जन्म हुआ। अपने पैत्रिक नगर शबिस्तर में प्रारम्भिक शिक्षा ग्रहण करने के बाद 18 वर्ष की आयु में वे उच्च शिक्षा प्राप्त करने हेतु पवित्र नगर क़ुम चले गये। वाद्शास्त्र एवं क़ुरआन की शिक्षा उन्होंने अपने गुरू आयतुल्लाह शेख़ महदी माज़ेन्द्रानी और मिर्ज़ा मोहम्मद अली शाहबादी से प्राप्त की। उसके बाद वे धर्म शास्त्र की उच्च शिक्षा ग्रहण करने में व्यस्त हो गये और इस तरह वे धर्मशास्त्र की शिका के सर्वोच्च स्थान पर पहुंचे। उन्होंने अनेक मस्जिदों का निर्माण कराया और कई पुस्तकें भी लिखीं। 84 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया। जआयतुल्लाह मोहम्मद वहीदी को क़ुम में हज़रते मासूमा के पवित्र रौज़ के निकट में दफ्न किया गया।

 

22 तीर सन 1370 हिजरी शम्सी को ईरान के विख्यात विचारक अल्लामा सैयद ताहिर सैयदज़ादे हाशेमी का पश्चिमी ईरान के किरमान शाह नगर के निकट एक स्थान पर निधन हुआ।

उन्होंने जीवन भर लेखन, शिक्षण और प्रशिक्षण के मार्ग से इस्लामी मान्यताओं और शिक्षाओं का प्रचार प्रसार किया। वे एक दक्ष लिपिकार भी थे।

उन्हें अरबी फ़ारसी और कुर्दी भाषाओं का पूर्ण ज्ञान प्राप्त था। वे एक अच्छे कवि भी थे। अल्लामा सैयद ताहिर हाशेमी ने बड़ी संख्या में ग़ज़लें और कसीदे अर्थात प्रशांसा में शेर कहे हैं।

 

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20 ज़ीक़ादा सन 370 हिजरी क़मरी को ईरान के विश्व विख्यात व अत्यंत प्रतिभाशाली दार्शनिक व चिकित्सक अबु अली सीना का जन्म हुआ। उन्होंने अपनी तेज़ बुद्धि से बहुत ही कम समय में आरंभिक शिक्षा प्राप्त की और दस वर्ष की आयु में क़ुरआन मजीद को याद कर लिया।

इब्ने सीना ने चिकित्सा विज्ञान, तर्कशास्त्र, दर्शनशास्त्र, गणित और खगोल शास्त्र का व्यापक ज्ञान प्राप्त किया।

तत्कालीन सामानी राजा नूह बिन मन्सूर के असाध्य रोग का उपचार करने के बदले में अबु अली सीना को सरकारी पुस्तकालय तक पहुँचने का अवसर मिला। उन्होंने इस पुस्तकालय से बहुत लाभ उठाया। वे कुछ समय तक मंत्री भी रहे किंतु पुस्तकों का अध्ययन और लेखन जारी रखा। उन्होंने अपनी 58 वर्ष की आयु में अत्यंत महत्वपूर्ण और लाभदायक पुस्तकें लिखीं। सन 428 हिजरी क़मरी में इस महान विद्वान का निधन हो गया। क़ानून और शिफ़ा अबु अली सीना की विश्व प्रसिद्ध किताबें हैं।