Feb १८, २०१६ ०९:४० Asia/Kolkata

18 फ़रवरी सन 1834 ईसवी को फ़्रांस के साम्राज्यवादी सैनिकों ने जिन्होंने 1830 से अलजीरिया का अतिग्रहण आरंभ किया था, अमीर अबदुल क़ादिर अलजज़ायरी के हाथों भारी मात खाई इस युद्ध में फ़्रांस के एक तिहाई सैनिक मारे गये और जीवित बचने वालों में आधे बंदी बना लिए गये। फ़्रांसीसियों ने जब यह स्थिति देखी तो तुरंत संधि का प्रस्ताव पेश कर दिया ताकि अपनी शक्ति को दोबारा प्राप्त और सेना को पुन: संगठित कर सकें। अब्दुल क़ादिर अलजज़ायरी ने दो वर्ष बाद तक इस प्रस्ताव को नहीं माना।

18 फ़रवरी सन 1834 ईसवी को फ़्रांस के साम्राज्यवादी सैनिकों ने जिन्होंने 1830 से अलजीरिया का अतिग्रहण आरंभ किया था, अमीर अबदुल क़ादिर अलजज़ायरी के हाथों भारी मात खाई इस युद्ध में फ़्रांस के एक तिहाई सैनिक मारे गये और जीवित बचने वालों में आधे बंदी बना लिए गये। फ़्रांसीसियों ने जब यह स्थिति देखी तो तुरंत संधि का प्रस्ताव पेश कर दिया ताकि अपनी शक्ति को दोबारा प्राप्त और सेना को पुन: संगठित कर सकें। अब्दुल क़ादिर अलजज़ायरी ने दो वर्ष बाद तक इस प्रस्ताव को नहीं माना।

 

18 फ़रवरी सन 1926 ईसवी को फ़्रांस और स्पेन की संयुक्त सेना ने अमीर अब्दुल करीम रैफ़ी के नेतृत्व वाली मोरक्को की सेना के प्रतिरोध को कुचल दिया। स्पेन की सेना के पास अत्यधिक शक्ति होने और इस सेना द्वारा मोरक्को वासियों के जनसंहार के बावजूद रैफ़ी ने 1921 में बड़ी सफलताएं प्राप्त कीं। यहॉ तक कि उन्होंने मोरक्को के कुछ भागों में लोकतांत्रिक शासन लागू कर दिया। यह देखकर स्पेन की सेना भयभीत हो गयी और उसने 1924 के आरंभ में व्यापक आक्रमण आरंभ किया और सन 1926 में अतिक्रमणकारी सेना ने रैफ़ी को पराजित कर दिया।

 

18 फ़रवरी सन 1965 ईसवी को गाम्बिया देश को ब्रिटेन से स्वाधीनता मिली और आज के दिन को इस देश का राष्ट्रीय दिवस घोषित किया गया। गाम्बिया पर, जो अफ़्रीक़ा महाद्वीप में ब्रिटेन का पहला उपनिवेश था सन 1588 में ब्रिटेन का अधिकार आरंभ हुआ। ब्रिटेन ने लगभग 4 शताब्दियों तक इस देश के स्रोतों को लूटा। ब्रिटेन ने द्वितीय विश्व युद्ध में आर्थिक और राजनैतिक दृष्टि से भारी हानि उठाने के करण सन 1963 में गाम्बिया को स्वायत्ता दे दी और सन 1965 में यह देश स्वतंत्र हो गया। गांबिया का क्षेत्रफल 11295 वर्ग किलोमीटर है। यहॉ की जनसंख्या 10 लाख से कुछ अधिक है। यह पश्चिमी अफ़्रीक़ा में स्थित है।

 

18 फ़रवरी सन 1999 ईसवी को इराक़ के वरिष्ठ धर्मगुरू आयतुल्लाह सैयद मोहम्मद सादिक़ सद्र को नजफ़ नगर में शहीद कर दिया गया। इस घटना के बाद इराक़ी जनता ने देश के विभिन्न क्षेत्रों में प्रदर्शन करके सरकार को सादिक़ सद्र की शहादत का जिम्मेदार ठहराया। बग़दाद सरकार के विरोधी गुटों ने भी इससे पहले इस सरकार द्वारा धर्मगुरूओं की हत्या की घटनाओं के दृष्टिगत इस सरकार को आयतुल्ला सद्र की शहादत के लिए दोषी ठहराया। सन 1968 में सत्ता संभालने के बाद बासी सरकार ने इराक़ में बड़ी संख्या में वरिष्ठ धर्मगुरूओं को शहीद करवाया।

 

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29 बहमन सन 1356 हिजरी शम्सी को ईरान के पश्चिमोत्तरी नगर तबरेज़ की जनता ने 19 दैय 1356 हिजरी शम्सी को क़ुम नगर में शहीद होने वालों की याद में तबरेज़ की बड़ी मस्जिदों में जमावड़ा किया। शाह के सुरक्षाकर्मियों के कड़े व्यवहार के चलते यह प्रदर्शन ईरान में जनान्दोलन में परिवर्तित हो गया। शाह के पिटठू अधिकारी यह देख कर दंग रह गये और उन्होंने अपनी अक्षमता को छिपाने के लिए इस आंदोलन को विदेशी शक्तियों के हस्तक्षेप का परिणाम कहना आरंभ कर दिया। तबरेज़ की जनता का प्रदर्शन वास्तव में शाह के अत्याचार और अन्याय के विरुद्ध जनता के कड़े रुख़ का आरंभ था जो बाद में ईरान की मुसलमान जनता के विभिन्न आंदोलनों का स्रोत सिद्ध हुआ।

 

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23 जमादिस्सानी सन 1340 हिजरी क़मरी को ईरान के वरिष्ठ धर्मगुरु आयतुल्ला मुल्ला हबीबुल्ला शरीफ़ काशानी का निधन हुआ। उनका जन्म सन 1262 हिजरी क़मरी में हुआ। उन्होंने बड़ी तेज़ी के साथ ज्ञान प्राप्त किया और 18 वर्ष की आयु में ही वरिष्ठ धर्मगुरु बन गये। धार्मिक मामलों के अतिरिक्त राजनैतिक क्षेत्र में भी वे सक्रिय रहे। उन्होंने कई पुस्तकें लिखीं जिनमे असरारुल आरेफ़ीन नामक पुस्तक उल्लेखनीय है।

23 जमादिस्सानी सन 709 हिजरी क़मरी को प्रसिद्ध मुसलमान धर्मगुरू, विद्वान, पवित्र क़ुरआन के व्याख्याकर्ता और साहित्यकार इब्ने अताउल्लाह का निधन हुआ वह शैख़े कबीर के नाम से प्रसिद्ध थे। वह क़ाहिरा के एक धार्मिक परिवार में जन्मे थे। इब्ने अताउल्लाह ने प्रसिद्ध गुरुओं से शिक्षा प्राप्त की और अपने काल के महत्वपूर्ण विद्वानों में गिने जाने लगे उनके शिष्यों की संख्या बहुत अधिक थी। उनकी महत्वपूर्ण पुस्तकों में अलहुकमुल अताइया और अलमुनाजातुल अताइया का नाम लिया जा सकता है।