Jul २४, २०१६ १०:२८ Asia/Kolkata

ईरान की इस्लामी क्रांति के विरोधी गुट एमकेओ का न केवल ईरानी जनता के बीच कोई स्थान नहीं है, बल्कि इस्लामी गणतंत्र ईरान के विरोधियों के बीच भी उनका कोई महत्व नहीं है।

वह हारा हुआ और विनाश की कगार पर खड़ा एक आतंकवादी गुट है। इसलिए आले सऊद द्वारा ऐसे महत्वपूर्णहीन गुट पर निवेश से पता चलता है कि आले सऊद शासन की नीतियां कितनी पिछड़ी हुई और विफल हैं।

 

मुजाहेदीने ख़ल्क़ संगठन या एमकेओ कि जिसे ईरानी जनता मुनाफ़ेक़ीन कहती है, संभवतः केवल ऐसा एक मात्र संगठन है कि जो ख़ुद को आतंकवाद विरोधी बताने वाले फ़्रांस जैसे देश में सरकार के समर्थन से प्रतिवर्ष सम्मेलन का आयोजन करता है।

 

 इस भयानक साल भी 9 जुलाई को पेरिस में इस सम्मेलन का आयोजन हुआ, जिसमें इस संगठन के कुछ बचे-खुचे और किराए के लोगों ने कड़ी सुरक्षा व्यवस्था में भाग लिया। यह ऐसी स्थिति में था कि जब उसी समय एमकेओ से अलग होने वाले उसके सदस्यों ने इस संगठन की अत्याचारपूर्ण एवं आतंकवादी नीतियों के ख़िलाफ़ प्रदर्शन किया। ईरान के विदेश मंत्री मोहम्मद जवाद ज़रीफ़ ने फ़्रांस में आयोजित होने वाले एमकेओ के सम्मेलन को एक वार्षिक राजनीतिक खेल बताते हुए कहा कि यह राजनीतिक खेल, जिसे वे प्रतिवर्ष आयोजित करते हैं, पहली बार आयोजित नहीं हुआ है, बल्कि प्रतिवर्ष विभिन्न देशों से घृणा की राजनीति करने वाले कुछ लोग इसमें भाग लेते हैं और भाषण देते हैं।

 

एमकेओ की 1965 में ईरान के शाह के शासन से मुक़ाबले के लिए स्थापना हुई थी। लेकिन इस कार्य में इसे कोई ख़ास सफलता नहीं मिली। उसके नेताओं को गिरफ़्तार करके जेलों में डाल दिया गया और कुछ को फांसी पर चढ़ा दिया गया। इस दौरान यह संगठन वामपंथी विचारों से प्रभावित हो गया और इस्लामी एवं कम्यूनिस्ट विश्वासों के संगठन में परिवर्तित हो गया।

 

1979 में ईरान की इस्लामी क्रांति की सफलता के बाद एमकेओ ने कुछ क्रांति विरोधी गुटों के साथ मिलकर सत्ता पर क़ब्ज़ा करने का प्रयास किया। जनता और क्रांति के नेताओं ने जब इसका विरोध किया तो उन्होंने बड़े पैमाने पर हत्याओं का सिलसिला शुरू कर दिया। अब तक ईरान के विभिन्न इलाक़ों में एमकेओ के हाथों 17000 अधिकारी और आम नागररिक मौत के घाट उतारे जा चुके हैं। इस आतंकवादी गुट ने इसी प्रकार सद्दाम की सेना के ईरान पर हमले के दौरान, उसके साथ सहयोग किया। इसने न केवल इराक़ी जनता को कुचलने में सद्दाम का साथ दिया, बल्कि ईरानी जनता के जनसंहार में भी सद्दाम की बहुत मदद की। लेकिन जब सद्दाम को उनकी ज़रूरत नहीं रही तो उसने इस गुट के सदस्यों को एक कैम्प में डाल दिया। सद्दाम की मौत के बाद यह अत्याचारी गुट अमरीका और अन्य पश्चिमी देशों की सहायता के बावजूद महत्वपूर्णहीन गुट बन गया और इराक़ी जनता के घेरे में आ गया और उसके अधिकांश सदस्य दूसरे देशों में बिखर गए।  

 

निःसंदेह, फ़्रांस द्वारा ऐसे काले करतूतों वाले संगठन के सदस्यों को प्रवेश देने का तार्किक या मानवाधिकारों की दृष्टि से कोई औचित्य नहीं ठहराय जा सकता। लेकिन यह कि इसके लिए आतंकवाद को अच्छे और बुरे के पश्चिम के फ़ार्मूले को आधार बनाया जाए। उनकी दृष्टि से बुरे आतंकवादी गुट वह हैं जो पश्चिमी देशों के हितों को ख़तरे में डालते हैं, यद्यपि वे आतंकवादी गतिविधियां अंजाम न दें। इसमें हमास और हिज़्बुल्लाह जैसे संगठनों को भी शामिल कर लिया गया है कि जो ज़ायोनी शासन के आतंक के मुक़ाबले में अपनी जनता और अपने राष्ट्र की रक्षा करते हैं। लेकिन एमकेओ को कि जिसने ईरानी नागरिकों और अधिकारियों को शहीद किया है और पश्चिमी सरकारों से सहयोग करता है, आतंकवादी गुट नहीं मानते हैं। इसी प्रकार पश्चिमी मानवाधिकारों के अनुसार, सीरियाई जनता पर अत्याचार करने वाले तकफ़ीरी आतंकवादी गुट स्वतंत्रता प्रेमी माने जाते हैं। लेकिन यह कि दाइश जैसे गुट जब कुछ पश्चिमी नागरिकों की हत्या कर देते हैं तो उन्हें आतंकवादी गुटों की सूची में शामिल कर दिया जाता है। वास्तव में पश्चिम का दोहरा और जन विरोधी रूप एमकेओ जैसे आतंकवादी गुटों को आज़ादी से गतिविधियां करने और सम्मेलनों के आयोजन की अनुमति देने से अधिक खुलकर सामने आ जाता है।

 

एमकेओ के इस वर्ष आयोजित होने वाले सम्मेलन में ध्यान योग्य बिंदु ईरान के मुक़ाबले में आले सऊद द्वारा उसका समर्थन करना था। इससे पहले भी सऊदी अरब ईरान विरोधी गुटों की सहायता के परिप्रेक्ष्य में इस संगठन की सहायता करता रहा है, लेकिन इस सम्मेलन में 1977 से 2001 तक सऊदी अरब की ख़ुफ़िया एजेंसी के पूर्व प्रमुख तुर्की अल-फ़ैसल ने भाग लिया और कहा कि आले सऊद और तेहरान विरोधी दोनों ही इस्लामी गणतंत्र ईरान के शासन का पतन चाहते हैं। उन्होंने अपने भाषण में एमकेओ के प्रमुख मसऊद रजवी को मरहूम या स्वर्गीय कहा और इस संगठन के अधिकारियों की इच्छा के वाबजूद उसके मौत की घोषणा कर दी। वर्षों से रजूयी को देखा नहीं गया था और उसके मरने की संभावना अधिक थी। सऊदी अरब के अल-अरबिया और अल-हदस जैसे चैनलों ने इस सम्मेलन को बड़े पैमाने पर कवरेज दिया।

 

आले सऊद और एमकेओ के सहयोग का पर्दाफ़ाश होना कोई आश्चर्य की बात नहीं थी। विभिन्न कारणों से यह दोनों एक दूसरे से सहयोग कर रहे हैं। एमकेओ इस्लामी और जनाधिकारों के नारों के बावजूद, व्यवहारिक रूप से इस्लाम एवं जन विरोधी संगठन है, यही कारण है लोग उसे मुनाफ़ेक़ीन कहते हैं। आले सऊद भी इस्लाम का दिखावा करके और धार्मिक नारे देकर वर्षों से इस्लामी जगत और मुस्लिम विरोधी कार्य कर रहे हैं और इस्लामी जगत में सबसे बड़े पाखंडी माने जाते हैं। इसीलिए क़ुरान की नज़र में यह दोनों विचारधाराओं का जुड़ना एक स्पष्ट बात है। जैसा कि सूरए तौबा की 67वीं आयत में हम पढ़ते हैं, मुनाफ़िक़ पुरुष और मुनाफ़िक़ महिलाएं सब एक ही गुट के हैं। वे बुराई की ओर बुलाते हैं और अच्छाई से रोकते हैं और अपनी मुट्ठी बंद कर लेते हैं, वे ईश्वर को भूल चुके हैं और ईश्वर भी उन्हें भुला चुका है।

निश्चित रूप से मुनाफ़ेक़ीन भ्रष्ट हैं। इस आयत के आधार पर मुनाफ़ेक़ीन का एक दूसरे से सहयोग कोई नई बात नहीं है, जिस प्रकार मोमेनीन की दोस्ती और सहयोग स्पष्ट है, इसलिए कि विश्वासों में दोनों एक समान हैं।

 

एमकेओ और सऊदी अरब का लक्ष्य एक ही है और वह है ईरान की इस्लामी सरकार का पतन। ईरान में इस्लामी क्रांति की सफलता के बाद, अत्याचारी एवं तानाशाही आले सऊद शासन को ऐसी क्रांतिकारी एवं लोकतंत्र व्यवस्था से सामना हुआ जो शुद्ध इस्लाम की संदेश वाहक है। ऐसी स्थिति में आले सऊद इस्लामी जगत के नेतृत्व का दावा नहीं कर सकते थे। यही कारण है कि उन्होंने ईरान के साथ दुश्मनी आरम्भ कर दी। लेकिन कुछ महीने पहले से सऊदी अरब ने खुलकर ईरान के दुश्मनों को हर प्रकार की सुविधाएं उपलब्ध कराना आरभ कर दिया है, उन्हीं में से एक एमकेओ का खुलकर समर्थन है।

 

एमकेओ और सऊदी अरब के बीच एक दूसरी समानता भी पायी जाती है। दोनों ही अपने उद्देश्यों तक पहुंचने के लिए हत्याओं का सहारा लेते हैं। एमकेओ अब तक ईरान और इराक़ में हज़ारों आम नागरिकों को मौत के घाट उतार चुका है और ईरान के कई अधिकारियों की भी हत्या कर चुका है। दूसरी ओर, अधिकांश आतंकवादी गुटों को या आले सऊद ने जन्म दिया है या इस परिवार ने उनका वित्तीय समर्थन किया है। दाइश, अलक़ायदा, तालिबान, नुस्रा फ़्रंट और बोको हराम जैसे आतंकवादी गुट आले सऊद की संतान माने जाते हैं और उनके वहाबी शासन की सेवा में लगे हुए हैं।

 

आले सऊद और एमकेओ दोनों ही इस्लाम का दम भरते हैं, लेकिन उनके विचार भ्रष्ट हैं। सऊदी अरब पर वहाबियत का वर्चस्व है। यह एक रूढ़ीवादी और हिंसक सम्प्रदाय है, जिसने अब तक इस्लामी जगत को बहुत नुक़सान पहुंचाया है। एमकेओ कि जिसने इस्लाम और कम्यूनिज़्म के मिश्रित विचारों को स्वीकार किया है, अब तक अपने भ्रष्ट विचारों में काफ़ी बदलाव कर चुका है, जिनका इस्लाम और क़ुरान से कोई लेना देना नहीं है। हास्यास्पद बात यह है कि वहाबियत और एमकेओ के विचारों में कोई समानता नहीं है और यह पूर्ण रूप से एक दूसरे के विरोधी हैं और व्यवहारिक रूप से भी यह आतंकवादी गुट ईरान में एक सेक्यूलर सरकार के गठन का सपना देखता है, जबकि आले सऊद तथाकथित इस्लामी शासन का समर्थन करते हैं।

 

एमकेओ और आले सऊद के बीच एक दूसरा समान बिंदु भ्रष्टाचार है। इन दोनों की भ्रष्टाचार और यौन शोषण की रिपोर्टें मीडिया में आती रही हैं, जिससे दोनों के अनुयाईयों के निकट इनकी वैधता पर सवालिया निशान लग गया है।

 

इसके बावजूद, एमकेओ जैसे बदमान और घृणित आतंकवादी गुट पर आले सऊद के निवेश से इस अत्याचारी परिवार की कमज़ोरी और अक्षमता का पता चलता है। इस संगठन के सदस्यों की औसत उम्र 50 वर्ष से अधिक है और वर्षों तक परिणामहीन कार्यवाहियों और गतिविधियों के बाद मानसिक रूप से यह बीमार हो चुके हैं।

 

एमकेओ का न केवल ईरानी जनता में बल्कि ईरान के विरोधियों के बीच भी कोई स्थान नहीं है। यह हारा हुआ, मुरझाया हुआ और मौत की कगार पर पहुंचने वाला एक संगठन है। इसलिए आले सऊद द्वारा इस महत्वहीन गुट पर निवेश से उनकी अपरिपक्वता का पता चलता है।

 

निःसंदेह एमकेओ ने अपना वजूद बाक़ी रखने के लिए ईरान के दुश्मन सद्दाम, अमरीका, ज़ायोनी शासन और पश्चिमी देशों की सरकारों की बहुत सेवा की है। हालांकि देशद्रोही आतंकवादी गुटों के साथ गठजोड़ से किसी सरकार या परिवार को कोई लाभ नहीं पहुंच सकता और उनका भविष्य उज्जवल नहीं हो सकता। जैसा कि ईरान के विदेश मंत्री जवाद ज़रीफ़ ने पेरिस सम्मेलन की ओर संकेत करते हुए कहा है कि ऐसे लोगों की उपस्थिति से जिन्होंने अल-क़ायदा और तालिबान को अस्तित्व प्रदान किया है और इलाक़े में आले सऊद की लज्जाजनक गतिविधियों में भूमिका अदा की है, उन लोगों की अपरिपक्वता और अक्षमता का पता चलता है, जो सद्दाम की भांति आतंकवादी गुटों से जुड़ गए हैं।