Feb १७, २०१६ १०:०२ Asia/Kolkata

20 फ़रवरी सन 1677 ईसवी को फ़्रांस ने हेटी में स्पेन की सेना को पराजित किया और इस क्षेत्र पर फ़्रांसीसी साम्राज्यवाद आरंभ हुआ।

20 फ़रवरी सन 1677 ईसवी को फ़्रांस ने हेटी में स्पेन की सेना को पराजित किया और इस क्षेत्र पर फ़्रांसीसी साम्राज्यवाद आरंभ हुआ। फ़्रांस ने एटलांटिक महासागर में स्थित हैटी को लगभग 130 वर्ष तक अपने अधिकार में रखा किंतु 1804 ईसवी में हेटी में काले दासों के व्यापक आंदोलन के बाद यह देश स्वतंत्र हुआ।

लैटिन अमेरिका में स्वतंत्रता प्राप्त करने वाला यह पहला देश था।

 

20 फ़रवरी सन 1866 ईसवी को मेक्सिको में इस देश के स्वतंत्रता संग्रामियों और फ़्रांस के बीच संघर्ष स्वतंत्रता प्रेमियों की विफलता के साथ समाप्त हुआ जिसके परिणाम स्वरूप ऑस्ट्रिया के राजकुमार मेक्सीमिलियन मेक्सिको के नरेश बन गये। 5 वर्ष तक चलने वाले इस युद्ध में पहले ब्रिटेन और स्पेन भी फ़्रांस के साथ थे किंतु थोड़े ही समय के बाद यह दोनों देश तटस्थ हो गये जिसके बाद फ़्रांस अकेले ही मेक्सिको के पूर्व राष्ट्रपति बेनीटो ख़वारिज़ के नेतृत्व वाली स्वतंत्रताप्रेमी सेना पर आक्रमण करता रहा और स्थाई रुप से उसे सफलता भी मिल गयी। उत्तरी मेक्सिको में फ़्रांस से पराजित होने के बाद भी ख़वारिज़ ने अपनी सेना की सहायता से संघर्ष जारी रखा अंतत:मेक्सिमिलियन का तख्ता पलट दिया और दोबारा राष्ट्रपति बन गये।

 

20 फ़रवरी सन 1928 ईसवी को ब्रिटेन ने जार्डन के साथ होने वाले समझौते के अनुसार इस देश की अधीनता को औपचारिकता दी। प्रथम विश्व युद्ध के बाद जार्डन ब्रिटेन के अधिकार में चला गया था और व्यवहारिक रुप से इस देश के अधीन हो गया। इस समझौते के आधार पर ब्रिटेन को जार्डन के वैधानिक आर्थिक प्रशासनिक और राजनैतिक मामलों का अधिकार प्राप्त हो गया। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद 1946 में यह समझौता निरस्त हो गया और जार्डन स्वाधीन हो गया।

 

20 फ़रवरी सन 1947 ईसवी को ब्रिटेन ने भारत की स्वतंत्रता पर सहमति व्यक्त की। यह देश लगभग 200 वर्ष तक ब्रिटेन के अधिकार में रहा।

भारत को यह स्वतंत्रता महात्मा गांधी के नेतृत्व में भारतीय जनता के वर्षों के कड़े परिश्रम और संघर्ष के फलस्वरुप मिली। भारत पर अपने अधिकार के दौरान ब्रिटेन ने इस देश के प्राकृतिक और दूसरे स्रोतों को जी भर के लूटा और इस देश को भारी जानी और आर्थिक हानी पहुंचाई। अगस्त सन 1947 में भारत ने औपचारिक रुप से स्वतंत्रता प्राप्त की और इसी के साथ यह देश भारत और पाकिस्तान में बॅट गया।

 

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पहली इस्फ़ंद सन 1358 हिजरी शम्सी को ईरान में इस्लामी क्रान्ति के संस्थापक इमाम ख़ुमैनी ने निरीक्षक परिषद के सदस्यों का चयन किया। इस परिषद का दायित्य यह देखना है कि ईरानी संसद द्वारा पारित कोई भी क़ानून इस्लामी नियमों और शिक्षाओं के प्रतिकूल तो नहीं है। इस परिषद में छे वरिष्ठ धर्मगुरू और 6 विधि विशेषज्ञ होते हैं। इस परिषद के सदस्यों का चयन क्रान्ति के वरिष्ठ नेता का दायित्व है वरिष्ठ नेता द्वारा चुने जाने के बाद सदस्यों के नाम को न्यायापालिका अध्यक्ष संसद में पेश करता है जहॉ सांसद इन सदस्यों के चयन के लिए मतदान करते हैं। इस परिषद के दायित्वों में चुनावों पर नज़र रखना भी है।

 

पहली इस्फ़ंद सन 1366 हिजरी शम्सी को ईरान पर इराक़ द्वारा थोपे गये युद्ध के दौरान ईरान का एक यात्री विमान इराक़ी वायु सेना के लड़ाकू विमानों द्वारा दागे गये दो प्रक्षेपास्त्रों का निशाना बन गया। इसमें सवार 40 लोग शहीद हो गए जिनमें कई ईरानी सांसद, इमाम ख़ुमैनी के प्रतिनिधि आदि शामिल थे।

इमाम ख़ुमैनी ने इस घटना पर गहरा दुख प्रकट किया और इराक़ की इस अमानवीय कार्रवाई की आलोचना की।

 

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25 जमादिस्सानी सन 1309 हिजरी क़मरी को प्रतिष्ठित धर्मगुरू आयतुल्लाह मिर्ज़ा हसन शीराज़ी ने तंबाकू और उसके उत्पादों के हराम होने का एतिहासिक फ़तवा देकर ईरान में अंग्रेज़ों की घिनौनी योजनाओं पर पानी फेर दिया। नासिरुद्दीन शाह क़ाजार ने 50 वर्ष की अवधि के लिए ईरान में तंबाकू की खेती, सिगरेट आदि जैसे तंबाकू के उत्पादों की पैदावार और उसके व्यापार का लाइसेंस एक ब्रिटिश कंपनी को दे दिया जिसके बाद ईरानियों को तंबाकू की खेती और कारोबार से वंचित कर दिया गया। यह समझौता ईरान पर अंग्रेज़ों के आर्थिक नियंत्रण के समान था। इसी लिए ईरानी जनता ने धर्मगुरुओं के नेतृत्व में इस के विरुद्ध आवाज़ उठायी। तंबाकू आंदोलन के दौरान विभिन्न नगरों में बड़े स्तर पर प्रदर्शन हुए जिन्हें कुचलने के लिए सुरक्षा बलों ने गोलियां चलायीं। अंततः उस काल के सबसे बड़े धार्मिक नेता आयतुल्लाह मिर्ज़ा हसन शीराज़ी ने एक पंक्ति का फ़तवा जारी किया जिसमें तंबाकू और उससे बनने वाले उत्पादों को हराम घोषित कर दिया गया था। यह फ़तवा इतना प्रभावी सिद्ध हुआ कि ईरान में ब्रिटिश कंपनी का काम ठप हो गया और नासेरुद्दीन शाह को विवश होकर यह समझौता रद्द करना पड़ा।